पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमुल कांग्रेस पार्टी ने असम विधानसभा चुनाव के लिए 17 उम्मीदवारों की सूची जारी करके कांग्रेस विरोधी एक नई राजनीति शुरु कर दी है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस पार्टी से असम या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए किसी भी प्रकार का बातचीत करने की कोशिश नहीं किया। तृणमूल कांग्रेस लम्बे समय से कांग्रेस पार्टी के खिलाफ मजबूत विरोध की राजनीति कर रही हैं। यद्यपि तृणमूल कांग्रेस इंडि गठबंधन का हिस्सा भी है। मगर तृणमूल कांग्रेस भाजपा के विरोध के कारण ही इंडि गठबंधन का हिस्सा हैं। इंडि गठबंधन केवल भाजपा विरोधी दलों का समूह है, क्योंकि इन दलों के बीच आपस में कोई भी एकता नहीं है सिवाय की भाजपा का विरोध के।
कांग्रेस को कमजोर करना चाहती हैं ममता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस पार्टी के खिलाफ असम में उम्मीदवार उतरना कोई नई राजनीति नहीं है। ममता बनर्जी खुद चाहती हैं कि कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में कमजोर किया जा सके। ममता बनर्जी के कारण ही कांग्रेस का पश्चिम बंगाल विधानसभा में वर्तमान में एक भी विधायक नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने 2023 में मुर्शिदाबाद जिले की सागरदिघी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को चुनाव हराकर विधानसभा में एक सीट जीतने में सफलता मिली थी। मगर ममता बनर्जी ने बिना देर किये कांग्रेस पार्टी के इकलौते विधायक बायरन बिस्वास को अपनी पार्टी में शामिल करवा लिया और कांग्रेस पार्टी को विधानसभा में फिर से शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया था। ममता बनर्जी को भय सता रहा था कि अगर कांग्रेस पार्टी राज्य में मजबूत हो गई तो मुस्लिम वोट बैंक खिसकने सकता है। अतएव उन्होंने बिना देरी किये बायरन बिस्वास को पार्टी में शामिल करवा लिया। सागरदिघी मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा सीट है और इस सीट पर 64 फीसद मुस्लिम मतदाता हैं।
ममता बनर्जी कांग्रेस पार्टी को अन्य राज्यों में भी कमजोर करना चाहती हैं। 2025 के दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी को किनारे करके आम आदमी पार्टी को समर्थन किया था। इतना ही नहीं, बल्कि ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव को प्रभावित करके उनसे भी आप को समर्थन करवाया था। आप के दिल्ली चुनाव में हारने पर कांग्रेस पार्टी इस कारण भी खुश थी, कि ममता बनर्जी के समर्थन के बावजूद भी आप हारी, अतएव यह ममता बनर्जी की भी हार हैं।
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कांग्रेस की एकला चलो नीति
कांग्रेस पार्टी भी ममता बनर्जी के मंशा को भांप गई थी और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पूर्व ही कांग्रेस पार्टी ने ना वाम दलों से और ना ही ममता बनर्जी से किसी भी प्रकार का चुनावी समझौता का प्रयास किया। बल्कि कांग्रेस ने सबसे पहले घोषणा की कि वो पश्चिम बंगाल के सभी 294 सीटों पर अपने बदौलत ही चुनाव लड़ेगी। ऐसी पार्टी जिसका विधानसभा में एक भी सदस्य नहीं हो उसके द्वारा किसी भी दल के साथ समझौता करने के प्रयास के बदले एकला चलो की नीति चुनाव जीतने के बदले कुछ अन्य मंशा को दर्शाता है। कांग्रेस पार्टी भी बायरन बिस्वास और दिल्ली विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के द्वारा दिए गए धोखा का बदला लेना चाहती है। जानकारों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल में ऐसे उम्मीदवारों का नाम घोषित करेगी, जिससे कि ममता बनर्जी को चुनावी नुकसान हो जैसा ममता असम में कांग्रेस पार्टी को देना चाहती हैं।
इंडि गठबंधन के नेृतृत्व की लड़ाई
ममता बनर्जी और कांग्रेस पार्टी में इंडि गठबंधन के नेतृत्व की भी लड़ाई हैं। अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल सहित कई नेतागण यह चाहते हैं कि इंडि गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी के हाथों में सौंपा जाए। अतएव कांग्रेस पार्टी के निशाने पर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ही रहेंगी।

















