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लड़ाई बड़ी है, लड़ाई कड़ी है

आज दुनिया तेजी से बदल रही है। पुराने शक्ति समीकरण कमजोर पड़ रहे हैं और नए संबंध बन रहे हैं। ऐसे समय में किसी भी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाए।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Mar 14, 2026, 07:16 pm IST
inविश्व, सम्पादकीय

पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की चिंता का कारण बन गया है। यह केवल दो देशों का टकराव नहीं है, बल्कि राजनीति, ऊर्जा बाजार और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ संकट है। इसी कारण आज यह प्रश्न हर जगह उठ रहा है कि यह संघर्ष कब रुकेगा और इसकी सीमा कहां तक जाएगी? इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए ईरान की राजनीतिक और सामरिक संरचना को समझना भी आवश्यक है, क्योंकि इस क्षेत्र के किसी भी बड़े संघर्ष में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ईरान की सत्ता को बाहर से बदल देना आसान नहीं माना जाता। इसके पीछे केवल वर्तमान परिस्थिति नहीं, बल्कि पिछले लगभग सत्तर वर्ष का अनुभव भी जुड़ा हुआ है। सबसे पहले उसके भूगोल को देखना चाहिए। ईरान का बड़ा भाग पर्वतीय है। पश्चिम में जगरोस पर्वतमाला और उत्तर में एल्बुर्ज पर्वत श्रृंखला प्राकृतिक रक्षा कवच की तरह खड़ी हैं। इन क्षेत्रों की संकरी घाटियां और कठिन मार्ग किसी भी बाहरी सेना के लिए तेजी से आगे बढ़ना कठिन बना देते हैं। इतिहास में यह कई बार देखा गया है कि ऐसे भूभाग वाले देशों में बाहरी हस्तक्षेप अक्सर लंबे युद्ध में बदल जाता है।

दूसरा कारण उसकी ऐतिहासिक राष्ट्रीय चेतना है। ईरान केवल एक आधुनिक राज्य नहीं, बल्कि बहुत पुरानी सभ्यता का उत्तराधिकारी है। फारसी पहचान की निरंतरता वहां के समाज में गहराई से मौजूद है। जब भी बाहरी दबाव या हस्तक्षेप होता है तो समाज में राष्ट्रीय एकजुटता बढ़ जाती है। इसका उदाहरण ईरान-इराक युद्ध में देखा गया। आठ वर्ष तक चले इस युद्ध में भारी जनहानि हुई, फिर भी वहां की शासन व्यवस्था नहीं गिरी।

तीसरा कारण उसकी बहुस्तरीय सैन्य व्यवस्था है। वहां केवल पारंपरिक सेना ही नहीं है, बल्कि क्रांतिकारी रक्षक बल और बसीज जैसे जनआधारित अर्धसैनिक संगठन भी मौजूद हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि पारंपरिक सेना कमजोर भी हो जाए तो भी जनयुद्ध और छापामार युद्ध की क्षमता बनी रहती है। इसके साथ ही ईरान ने पिछले कई दशकों में अपने प्रभाव का एक क्षेत्रीय जाल भी बनाया है। लेबनान, इराक, सीरिया और यमन जैसे क्षेत्रों में उसके सहयोगी समूह सक्रिय हैं। इस कारण किसी भी युद्ध की स्थिति में संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है और युद्ध की लागत बहुत बढ़ सकती है।

ऊर्जा और व्यापार मार्ग भी इस पूरे समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग और तेल आपूर्ति पर ईरान का भौगोलिक प्रभाव है। दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा भाग इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां तनाव बढ़ता है तो उसका असर सीधे विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यही कारण है कि कई शक्तियां ईरान के साथ सीधे युद्ध के जोखिम को बहुत सावधानी से देखती हैं।

वैश्विक समीकरण और संतुलित गुटनिरपेक्ष भारत पश्चिम एशिया की यही जटिल स्थिति विश्व राजनीति को भी प्रभावित कर रही है। ऐसे समय में हर देश को बहुत सोच-समझकर अपनी नीति तय करनी पड़ती है। भारत के सामने भी यही चुनौती है। देश के भीतर कुछ आवाजें यह कहती हैं कि भारत को किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा हो जाना चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, बल्कि दूरगामी राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है।

भारत की विदेश नीति का आधार संतुलन और व्यावहारिक दृष्टि है। भारत फिलिस्तीन के अधिकारों की बात भी करता है और साथ ही इस्राएल के साथ अपने रणनीतिक संबंध भी बनाए रखता है। यही संतुलन उसकी वास्तविक शक्ति है। यही वह दृष्टिकोण है जिसे आज की परिस्थितियों में वास्तविक और व्यावहारिक गुटनिरपेक्षता कहा जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत निष्क्रिय होकर किनारे बैठा है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह किसी शक्ति समूह का हिस्सा बने बिना अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय ले रहा है।

भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा इसी संतुलन का परिणाम है। खाड़ी देशों से लेकर पश्चिमी देशों तक, भारत को आज एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। कई विश्लेषक मानते हैं कि भारत जैसे देश संवाद और समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि उनके संबंध विभिन्न पक्षों से बने हुए हैं।

आज दुनिया तेजी से बदल रही है। पुराने शक्ति समीकरण कमजोर पड़ रहे हैं और नए संबंध बन रहे हैं। ऐसे समय में किसी भी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाए। भारत ने इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसलिए पश्चिम एशिया की इस बड़ी और कठिन लड़ाई के बीच भी भारत की नीति शांति, संवाद और संतुलन पर आधारित दिखाई देती है। यही दृष्टिकोण आने वाले समय में उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बन सकता है।

X@hiteshshankar
Topics: पश्चिम एशिया संकटवैश्विक शक्ति संतुलनऊर्जा बाजारभारत-इजरायल संबंधईरान की सैन्य शक्तियुद्ध और अर्थव्यवस्थातेल आपूर्तिभारत-फिलिस्तीन नीतिwest asia crisisपाञ्चजन्य विशेष
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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