विश्व में सभी ज्ञान आधारित क्षेत्रों में अप्रवासी भारतीय हिंदुओं का सुदीर्घ काल से वर्चस्व बना हुआ है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी के निष्कर्षों ने वैश्विक बौद्धिक जगत में नया विमर्श स्थापित किया है। शोध के आंकड़े स्पष्ट रूप से उद्घोष कर रहे हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में निवास करने वाला हिंदू समुदाय वहां का सर्वाधिक शिक्षित और प्रबुद्ध धार्मिक समूह है। हिंदू मेधा की यह श्रेष्ठता मात्र एक संयोग नहीं, बल्कि उस शाश्वत प्रवाह का प्रमाण है जो सहस्राब्दियों से ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय‘ के संकल्प के साथ प्रवाहित हो रहा है। संपूर्ण विश्व को हिंसा एवं पर्यावरण विनाश जैसी विषमताओं से मुक्त कर हिंदुत्व का विचार ही नई विश्व व्यवस्था स्थापित करेगा।
विश्व गुरु का उत्तराधिकार
भले ही पश्चिमी समाजशास्त्री इस सफलता का विश्लेषण आर्थिक व आप्रवासन की दृष्टि से कर रहे हों, किंतु इसका वास्तविक कारण भारत की उस प्राचीन ज्ञान-पिपासा में निहित है, जो हिंदुओं की विश्वगुरु परंपरा की साकार अभिव्यक्ति है। भारत में शिक्षा कभी केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं रही, बल्कि यह आत्मानुभूति और आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरक रही है। प्राचीन भारत में विद्या को अमृत माना गया है-‘विद्यया अमृतमश्नुते।’
जब विश्व का एक बड़ा भाग सभ्यताओं के शैशव काल में, लगभग संज्ञाहीन पाषाण-युगीन अवस्था में था, तब भारत नालंदा, तक्षशिला और वल्लभी जैसे अनेक महान विश्वविद्यालयों से समृद्ध था। ये केवल ईंट-पत्थरों के भवन नहीं थे, बल्कि ज्ञान के ऐसे केंद्र थे, जहां प्रज्ञा और मेधा का अदम्य प्रवाह विद्यमान था। आज प्यू रिसर्च सेंटर के 70 प्रतिशत वाले आधुनिक आंकड़े वास्तव में उसी प्राचीन मेधा-परंपरा का वैश्विक विस्तार हैं, जो डिजिटल और तकनीकी युग में भी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रही है।

भारत की प्राचीन मेधा केवल आध्यात्म और दर्शन तक सीमित नहीं थी, बल्कि धातु-विज्ञान, रसायन, चिकित्सा, शल्य-चिकित्सा, नौवहन, विमान-शास्त्र और खगोल-विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में भी विश्व का नेतृत्व कर रही थी। जब विश्व लौह-निर्माण सहित धातु-विज्ञान की कला से अपरिचित था, तब भारत के महान रसायनशास्त्री नागार्जुन अपने ग्रंथ रस-रत्नाकर के माध्यम से धातुओं के शुद्धिकरण तथा पारद के अद्भुत प्रयोगों का वर्णन कर रहे थे। दिल्ली में महरौली स्थित लौह-स्तंभ, जो शताब्दियों से खुले आकाश के नीचे बिना जंग लगे खड़ा है, भारत की उन्नत धातुकर्म परंपरा का जीवंत प्रमाण है। आधुनिक खगोल-विज्ञान जिन तथ्यों की खोज आज कर रहा है, उन्हें आर्यभट, वराहमिहिर और भास्कर II ने सदियों पहले ही गणितीय सूत्रों में अभिव्यक्त कर दिया था। सूर्य सिद्धांत में वर्णित ग्रहों की गति तथा पृथ्वी की परिधि के सटीक आकलन सिद्ध करते हैं कि भारतीय मेधा का विस्तार केवल पृथ्वी तक ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के ओर-छोर तक था।
आक्रमण पूर्व का स्वर्णिम भारत
मुगल और ब्रिटिश आक्रांताओं के आगमन से पूर्व भारत तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से विश्व का अग्रणी राष्ट्र था। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के अनुसार, ईसा की पहली शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक विश्व की कुल जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25 से 33 प्रतिशत के बीच रही। यह समृद्धि उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक ज्ञान के बिना संभव नहीं थी। दक्षिण भारत में तंजौर स्थित बृहदेश्वर मंदिर हो या एलोरा का कैलाश मंदिर-ये स्थापत्य आज भी आधुनिक इंजीनियरों के लिए आश्चर्य का विषय हैं। बिना किसी आधुनिक क्रेन के लगभग 80 टन वजनी पत्थर को मंदिर के शिखर पर स्थापित करना और एक ही विशाल पर्वत को ऊपर से नीचे काटकर भव्य मंदिर का निर्माण करना भारत की उत्कृष्ट सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुकला का अद्भुत प्रमाण है।
भारत के मलमल और सूती वस्त्रों की मांग पूरे विश्व में थी। भारतीय जहाज-निर्माण की तकनीक इतनी उन्नत थी कि अनेक बार भारतीय जहाज ब्रिटिश जहाजों की तुलना में अधिक विशाल और टिकाऊ सिद्ध होते थे। आक्रांताओं के आगमन से पूर्व भारत में जल-संरक्षण की अत्यंत विकसित प्रणालियां विद्यमान थीं। चोल काल का कल्लनई बांध इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो लगभग दो हजार वर्ष बाद भी कार्यरत है। यह स्पष्ट करता है कि भारत एक प्रौद्योगिकी-प्रधान और वैज्ञानिक दृष्टि से विकसित सभ्यता थी।
संस्कृत : जन-संवाद की भाषा
भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक सशक्त स्तंभ हमारी भाषाई परंपरा भी रही है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि प्राचीन भारत में संस्कृत केवल कुछ विद्वानों तक सीमित भाषा नहीं थी, बल्कि यह जन-सामान्य के संवाद का भी महत्त्वपूर्ण माध्यम थी। आक्रांताओं के आगमन से पूर्व भारत के अनेक क्षेत्रों में किसान, शिल्पी और गृहिणियां भी सहज रूप से संस्कृत में बातचीत करती थीं। संस्कृत की व्याकरणिक सटीकता ने भारतीय मस्तिष्क को तार्किक और विश्लेषणात्मक बनाया। यही कारण है कि आज गणित, कोडिंग और विज्ञान के जटिल क्षेत्रों में भारतीय मूल के लोग उल्लेखनीय नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं।

नारी शक्ति : प्रबुद्ध समाज की आधारशिला
प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निहितार्थ हिंदू परिवारों में शिक्षा के प्रति गहरी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता भी है। भारतीय परंपरा में स्त्री को कभी ज्ञान से वंचित नहीं रखा गया। लोपामुद्रा, गार्गी वाचक्नवी और मैत्रेयी जैसी विदुषियां प्रमाण हैं कि हमारी ज्ञान-परंपरा में मेधा का कोई लिंग-भेद नहीं था। प्राचीन भारत में माताएं ही प्रथम आचार्य होती थीं। जब यूरोप अंधकार युग से गुजर रहा था, तब भारत की विदुषी स्त्रियां दर्शन और न्याय पर शास्त्रार्थ कर रही थीं। आज अमेरिका में हिंदू महिलाओं की शैक्षिक उपलब्धियां उसी गौरवशाली परंपरा का आधुनिक प्रतिबिंब हैं।
भारत की इसी ज्ञान-शक्ति से भयभीत होकर विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले हमारी बौद्धिक जड़ों पर प्रहार किया। बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालयों को जलाया जाना मानव इतिहास की सबसे बड़ी बौद्धिक त्रासदियों में गिना जाता है। बाद में मैकाले ने भारतीय शिक्षा-पद्धति को जड़ से उखाड़ने का षड्यंत्र रचा, जिसका उद्देश्य भारतीयों में अपनी परंपराओं के प्रति हीनता-बोध उत्पन्न करना था। किंतु प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़े सिद्ध करते हैं कि सदियों के दमन और मैकाले के मानसिक दासता के प्रयासों के बावजूद हिंदू मेधा को परास्त नहीं किया जा सका।
आज भारत विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है, जहां लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश भारत के लिए वह ब्रह्मास्त्र सिद्ध हो सकता है, जो उसे पुनः विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित कर सकता है। अमेरिका में हिंदुओं की शैक्षिक और व्यावसायिक सफलता यह संकेत है कि जब भारतीय मेधा को उपयुक्त अवसर और वातावरण मिलता है, तो वह असाधारण उपलब्धियां प्राप्त करती है। इस युवा शक्ति को और अधिक निखारने तथा उसकी क्षमता को राष्ट्रनिर्माण में प्रभावी रूप से नियोजित करने के लिए हमें कुछ क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा।
प्यू रिसर्च की रिपोर्ट केवल किसी विदेशी संस्था का प्रमाणपत्र नहीं है, बल्कि हमारे लिए आत्म-साक्षात्कार का एक महत्त्वपूर्ण क्षण है। यह संकेत देती है कि यदि हिंदू समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिकता को अपनाता है, तो उसे वैश्विक नेतृत्व से कोई नहीं रोक सकता। 21वीं सदी ज्ञान की सदी है और इस वैश्विक ज्ञान-प्रतिस्पर्धा में भारत का पुनरुत्थान लगभग अवश्यंभावी प्रतीत होता है। आज अमेरिका में हिंदुओं की उल्लेखनीय उपस्थिति और सफलता इस तथ्य का संकेत है कि ‘विश्वगुरु’ का गौरव पुनः अपनी प्रदीप्ति की प्रतीक्षा कर रहा है।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी ही प्रवृत्ति केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक महाद्वीपों में भी दिखाई देती है। अफ्रीका और यूरोप में भी शिक्षित हिंदुओं का अनुपात उल्लेखनीय है। आज भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, जैसे-योग, आयुर्वेद, प्राचीन धातुकर्म और अन्य पारंपरिक विधाओं पर वैश्विक स्तर पर व्यापक शोध हो रहे हैं। समकालीन औद्योगिक और तकनीकी परिदृश्य में भी भारत तेजी से उभर रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनेक वैश्विक क्षमता केंद्र भारत में स्थापित हो रहे हैं। चौथी औद्योगिक क्रांति के दौर में अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारत में निरंतर अनुसंधान और नवाचार हो रहे हैं। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र में भारत पहले से ही विश्व का एक प्रमुख आउटसोर्सिंग केंद्र है।
आज भारत विश्व की तीव्र गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित है और निकट भविष्य में इसके और भी ऊपर आने की संभावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय ज्ञान-परंपरा और शिक्षा-संस्कारों की यह दीर्घ परंपरा ही वह शक्ति है, जो भारत को पुनः वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर कर सकती है। वैदिक संकल्पना ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’, अर्थात् समस्त विश्व को श्रेष्ठता और सद्गुणों की ओर अग्रसर करना-आज भी उसी प्रकार प्रेरक है और भविष्य की दिशा भी निर्धारित करती है।

















