31 मार्च 2026 : खत्म हो जाएगा नक्सलवाद! जानिए ‘लाल गलियारे’ के अंत की कहानी
October 20, 2026
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31 मार्च 2026 : खत्म हो जाएगा नक्सलवाद! जानिए ‘लाल गलियारे’ के अंत की कहानी

भारत में माओवादी हिंसा के खिलाफ निर्णायक लड़ाई अपने अंतिम दौर में है। अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा है। आत्मसमर्पण, सुरक्षा कार्रवाई और विकास मॉडल ने लाल गलियारे की जड़ें कमजोर कर दी हैं।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Shivam Dixit
Mar 7, 2026, 08:00 pm IST
inभारत, विश्लेषण

31 मार्च, 2026 का दिन निकट है, यह कोई व्यापारिक या किसी व्यवसाय से जुड़ी तारीख नहीं बल्कि ऐसे पाप के आखिरी हिसाब किताब की तारीख है जिसने अब तक देश में हजारों निर्दोष लोगों की जानें लीं और देश के बहुत बड़े हिस्से को विकास से वंचित कर उसे पिछड़े क्षेत्रों में शामिल कर दिया। केंद्र सरकार ने 31 मार्च, 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की तारीख तय की है। देश में माओवादी आतंकवाद के विरुद्ध लंबे समय से चल रही लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। देश लाल गलियारे में लगने वाले ‘लाल सलाम’ के नारे को आखिरी सलाम कहने की तैयारी कर ली है। कई दशकों तक जिस लाल गलियारे को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता रहा, वह अब अपनी अंतिम साँस लेता दिखाई दे रहा है। मयह कहने में कोई संकोच नहीं कि आने वाले दिनों में यह लाल कॉरिडोर बीते समय की कहानी बनकर रह जाएगा।

शीर्ष माओवादी नेता देवूजी का आत्मसमर्पण

इस विश्वास का आधार हालिया घटनाक्रम हैं। कुछ दिन पहले शीर्ष माओवादी नेता और प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के वरिष्ठ सदस्य, 62 वर्षीय थिप्परी तिरुपति उर्फ देवूजी ने अपने तीन उच्च विश्वस्थ साथियों सहित तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। यह केवल एक व्यक्ति द्वारा हथियार छोडऩा नहीं, बल्कि एक पूरी वैचारिक धारा के दरकते किले का संकेत है। देवूजी का यह कदम माओवादी कट्टरपंथी धड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि हिंसक वामपंथी राजनीति के समर्थकों के लिए भी बड़ा झटका है। देवूजी द्वारा भविष्य में संविधान और कानूनी ढाँचे के भीतर रहकर कार्य करने का इरादा जताना शीर्ष नेतृत्व में आ रहे आंतरिक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का प्रमाण है। माओवाद, जो लंबे समय तक संविधान और लोकतंत्र को बुर्जुआ ढाँचा कहकर खारिज करता रहा और समस्याओं का समाधान बंदूक की गोली से खोजने का प्रयास करता रहा, आज अपने ही झूठे सिद्धांत से पीछे हट रहा है।

लाल कॉरिडोर की हिंसक हकीकत

माओवादी संगठनों ने हमेशा दावा किया कि वे जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। परंतु जमीनी हकीकत यह रही कि उनकी हिंसक रणनीति ने इन क्षेत्रों को विकास से वंचित किया। अनेक स्कूल जलाए गए, सडक़ों और बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया और दो पीढय़िों को अशिक्षित रहने के लिए मजबूर किया गया। लाल कॉरिडोर का नारा दरअसल एक मनोवैज्ञानिक घेरा था, जिसने भय, अस्थिरता और हिंसा को आदिवासी इलाकों की नियति बना दिया। इस विचारधारा ने न तो आर्थिक समृद्धि दी और न ही सामाजिक न्याय, केवल विनाश दिया।

देवूजी और उनके साथियों की भूमिका

देवूजी, सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी, सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के प्रमुख और पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के मुख्य रणनीतिकार रहे हैं। पुलिस के दावों के अनुसार कई बड़े हमलों के मास्टरमाइंड और ढाई सौ से अधिक सुरक्षा कर्मियों और नागरिकों की हत्या के पीछे उसका हाथ था। उसका यह कदम विद्रोही आंदोलन के लिए दशकों में आया सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।

22 फरवरी 2026 को बड़े नेताओं का आत्मसमर्पण

22 फरवरी 2026 को देवूजी के साथ आत्मसमर्पण करने वालों में केंद्रीय समिति सदस्य मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम, तेलंगाना राज्य समिति के सचिव बडे चोका राव उर्फ दामोदर और राज्य समिति सदस्य नूने नरसिम्हा रेड्डी उर्फ गंगना जैसे अहम चेहरे शामिल थे। ये सभी दशकों तक फरार रहे और लाखों रुपये के इनामी थे। इनके आत्मसमर्पण ने माओवादी संगठन की आंतरिक संरचना को हिला कर रख दिया है।

बसवराजू के मारे जाने के बाद कमजोर पड़ा नक्सलवाद

पिछले डेढ़ वर्ष में छत्तीसगढ़ में 450 से अधिक माओवादियों के मारे जाने, सैकड़ों की गिरफ्तारी और कई के आत्मसमर्पण के दावे किए गए। मई 2025 में छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ के दौरान सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी, सैन्य योजना और पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराए जाने से नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में ऐतिहासिक कदम की चर्चा शुरू हुई। उस पर डेढ़ करोड़ का इनाम था और वह गुरिल्ला रणनीतियों को आधुनिक रूप देने में केंद्रीय चेहरा माना जाता था।

देवूजी का आत्मसमर्पण और बढ़ता दबाव

देवूजी ने बसवराजू के बाद नेतृत्व संभाला था। देवूजी जैसे उच्च स्तर के नेता का आत्मसमर्पण असाधारण है और यह दर्शाता है कि वरिष्ठ नेतृत्व बस्तर, अबूझमाड़ और सीमावर्ती जंगल क्षेत्रों में चल रही संयुक्त कार्रवाइयों ने माओवादी कैडर की भर्ती, आपूर्ति और हथियार प्रबंधन की क्षमता पर गहरा प्रभाव डाला है। करेगुट्टा पहाडिय़ों में चली मुहिम के बाद देवूजी का आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि गुरिल्ला युद्ध की जमीन अब सिमट रही है। शीर्ष माओवादी नेताओं पर जो दबाव बना है, वह कोई सहज प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे सरकार की कठोर मेहनत और रणनीति काम कर रही है। सरकार जानती है कि यदि कोई कानून और व्यवस्था को हाथ में लेता है तो संविधान और आम नागरिकों की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।

सरकार की दोहरी रणनीति: सख्ती और पुनर्वास

भारत सरकार और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति का केंद्रीय उद्देश्य रक्तपात नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्था की पूर्ण बहाली था। अक्टूबर 2025 में गृह मंत्री द्वारा 31 मार्च 2026 तक माओवाद के पूर्ण खात्मे का लिया गया संकल्प केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं था, बल्कि यह राज्य की दृढ़ इच्छाशक्ति का स्पष्ट प्रदर्शन था। इसके साथ ही उन्होंने आत्मसमर्पण नीति को केंद्र में रखते हुए एक संतुलित दोहरी रणनीति अपनाई—एक ओर सख्त सुरक्षा कार्रवाई और दूसरी ओर आत्मसमर्पण तथा सम्मानजनक पुनर्वास का मार्ग।

सीजफायर की संभावना को किया गया खारिज

यह उनकी राजनीतिक दृढ़ता का प्रमाण था कि माओवादियों के साथ वार्ता या सीजफायर की संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया। संदेश बिल्कुल साफ था—यदि हथियार छोड़ोगे तो सुरक्षा, सम्मान और पुनर्वास मिलेगा; यदि गोली चलाओगे तो कानून अपना जवाब देगा। इस अल्टीमेटम ने माओवादी संगठनों के भीतर गहरी उथल-पुथल पैदा की। हथियारबंद संघर्ष की वकालत करने वाले धड़ों के भीतर भी वैचारिक दरारें सामने आईं। कुछ वरिष्ठ नेताओं, जिनमें वरिष्ठ पोलित ब्यूरो सदस्य मलोजुला वेणु गोपाल राव उर्फ सोनू जैसे नेताओं द्वारा अक्टूबर में शांति की वकालत करते हुए आत्मसमर्पण का मार्ग चुनना इस बात का संकेत था कि जमीनी वास्तविकता बदल रही थी।

नक्सलवाद विरोधी राष्ट्रीय नीति और विकास

नक्सलवाद और माओवाद के विनाशकारी ढाँचे को जड़ से उखाडऩे के लिए केंद्र सरकार ने नक्सलवाद विरोधी राष्ट्रीय नीति के तहत विस्तृत रोडमैप तैयार किया। यह केवल सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित नहीं था; इसमें आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों को भी शामिल किया गया। पुनर्वास नीति को आकर्षक और व्यवहारिक बनाया गया ताकि हथियार छोडऩे वालों को मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिल सके।

प्रभावित राज्यों को मिला केंद्र का सहयोग

झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओडिशा और बिहार जैसे प्रभावित राज्यों को केंद्र की ओर से पूर्ण सहयोग और लचीलापन दिया गया। सुरक्षा नीति को विकास के एजेंडे से जोड़ा गया। सशक्त कार्रवाई के माध्यम से माओवादी नेटवर्क को तोड़ा गया, उनकी फंडिंग चैनलों पर प्रहार किया गया और संचार तंत्र को कमजोर किया गया। इसके साथ-साथ आत्मसमर्पण नीति ने हथियारबंद विद्रोह की रीढ़ को धीरे-धीरे ढीला कर दिया।

विकास के जरिए जीता गया लोगों का विश्वास

लोगों का विश्वास जीतना इस लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति और आदिवासी मान्यताओं को सुरक्षित रखते हुए विकास का मॉडल अपनाया गया। नक्सलवाद विरोधी राष्ट्रीय नीति के अंतर्गत सुरक्षा के साथ विकास को जोड़ा गया। पिछले दशक में छत्तीसगढ़ सहित कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर बुनियादी ढाँचे का विस्तार किया गया। आवास योजनाएँ, सडक़ों का जाल, बिजली, पानी, रसोई गैस और मोबाइल कनेक्टिविटी—इन सबने मिलकर उस खालीपन को भरा जिसका लाभ माओवादी आंदोलन उठाता था। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तथा रोजगार योजनाओं ने नई पीढ़ी को बंदूक की जगह किताब और कौशल की ओर मोड़ा है।

बस्तर में विकास और नई उम्मीद

बस्तर जैसे क्षेत्र, जो कभी केवल गोलीबारी और घात लगाकर किए गए हमलों के लिए जाने जाते थे, आज विकास परियोजनाओं की चर्चा में हैं। आदिवासियों से उचित मूल्य पर फसल खरीद, सिंचाई योजनाओं का विस्तार और पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहन—ये सब उस मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा थे जिसमें राज्य ने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि विकास ही वास्तविक विकल्प है।

युवा आदिवासी लड़कियों के पुनर्वास पर जोर

विशेष रूप से माओवादी आंदोलन में फँसी युवा आदिवासी लड़कियों के पुनर्वास को प्राथमिकता दी गई। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगारमुखी योजनाओं के माध्यम से उन्हें नया जीवन देने का प्रयास किया गया। आज स्थिति यह है कि कई परिवार अपने बच्चों को हथियार छोडक़र घर लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई

दूसरी ओर, निर्धारित समय सीमा में माओवाद का पूर्ण उन्मूलन करने के संकल्प पर अमल करते हुए सुरक्षा बलों ने जंगलों और पहाडय़िों में गहन खोज अभियान चलाए। स्थानीय लोगों का सहयोग इसमें निर्णायक सिद्ध हुआ। यह केवल सैन्य कार्रवाई नहीं थी; यह राज्य और समाज की साझा लड़ाई थी।

माओवादी हिंसा का दर्द और पीड़ित परिवार

कांग्रेस शासन के दौरान शहरी नक्सलियों का एक पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद था जो माओवादी हिंसा को वैचारिक आवरण पहनाकर उसकी निंदा को कमजोर करता रहा। माओवादी आतंक के पीड़ितों की कहानियाँ कभी मुख्यधारा की बहस का हिस्सा नहीं बन सकीं। हजारों परिवार, जिनके सदस्यों ने अपने हाथ, पैर या आँखें खो दीं, अक्सर अदृश्य रहे। पिछले पाँच दशकों में माओवादी आतंक ने हजारों जानें लीं—सुरक्षा कर्मी, ग्रामीण, आदिवासी भाई-बहन—कईयों का बलिदान इस काले अध्याय का साक्षी है।

लाल गलियारे से लोकतंत्र की ओर

एक समय था जब देश का एक-तिहाई हिस्सा नक्सलवाद के प्रभाव में था। संविधान कागज़ों पर था, पर लाल गलियारे में उसकी उपस्थिति महसूस नहीं होती थी। निर्वाचित सरकारों की वैधता को चुनौती दी जाती थी। शाम के बाद घर से बाहर निकलना भय का कारण बन जाता था।

लोकतंत्र ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग

आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। माओवाद की विचारधारा को लोगों ने नकार दिया है। संदेश स्पष्ट है—भारत में सत्ता बंदूक की गोली से नहीं, वोट की ताकत से तय होती है। लोकतंत्र ही वह मंच है जहाँ वास्तविक परिवर्तन संभव है। माओवाद कभी भी विकास का प्रतीक नहीं हो सकता; यह हिंसा और तानाशाही की सोच का प्रतीक है। आज लाल गलियारे की कहानी अपने अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही है। जो क्षेत्र कभी हिंसा से परिभाषित होते थे, वे अब विकास और आशा से पहचाने जा रहे हैं। लाल सूरज के डूबने की यह उपमा केवल प्रतीक नहीं—यह एक अंत की घोषणा है। इसीलिए इस साल 31 मार्च केवल एक तारीख नहीं होगी बल्कि दुनिया में घोषणा होगी कि भारत अपने यहां किसी तरह का आतंकवाद बर्दाश्त करने वाला नहीं है।

Topics: CPI Maoistअमित शाहRed corridorLeft wing extremismInternal Security IndiaBastar Naxalism
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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