प्रकृति के विराट कैनवास पर मनुष्य केवल एक रंग है, पूरी तस्वीर नहीं। फिर भी हमने स्वयं को सृष्टि का स्वामी मानकर उन रंगों को मिटाना शुरू कर दिया है, जिनके बिना धरती जीवनहीन हो जाएगी। 3 मार्च को मनाया जाने वाला ‘विश्व वन्यजीव दिवस’ केवल पशु-पक्षियों की गिनती करने का दिन नहीं है बल्कि आत्मनिरीक्षण का वह क्षण है, जहां हमें यह समझना होगा कि यदि जंगलों में बाघ की दहाड़ मौन हो गई, यदि आकाश में गिद्धों के पंख फड़फड़ाना बंद हो गए, यदि घास के मैदानों में सोन चिड़िया का कलरव सदा के लिए खो गया या हमारे वनों की औषधीय सुगंध लुप्त हो गई तो मानव सभ्यता का अस्तित्व भी संकट के भंवर में होगा। विश्व वन्यजीव दिवस हमें याद दिलाता है कि जैव विविधता केवल वन्यजीवों का समूह नहीं है बल्कि मानव स्वास्थ्य, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है।
भारत के वन्यजीव हमारी संस्कृति और आयुर्वेद की आत्मा
भारत की मिट्टी में तो जैव विविधता का अद्भुत वैभव समाया है। भारत की वन्यजीव संपदा केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, यह हमारी संस्कृति और आयुर्वेद की आत्मा है। हिमालय की गोद से लेकर पश्चिमी घाट की हरित घाटियों तक, थार के विस्तृत मरुस्थल से लेकर सुंदरबन के मैंग्रोव तक, हर भू-भाग में जीवन का अनूठा स्वर गूंजता है। किंतु आधुनिक विकास की अंधी दौड़, अनियंत्रित शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और अवैध शिकार ने इस स्वर को कराह में बदल दिया है। आज बंगाल टाइगर से लेकर लाल सिर वाले गिद्ध तक, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड से लेकर कश्मीरी हंगुल हिरन तक, अनेक प्रजातियां अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं।
जब हम बाघ की बात करते हैं तो हम केवल एक वन्यजीव की नहीं, ‘इकोसिस्टम’ के रक्षक की बात कर रहे होते हैं। बंगाल टाइगर, जो भारत का गौरव है, आज अवैध शिकार और सिकुड़ते आवासों के कारण संकटग्रस्त श्रेणी में है। 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के साथ जो संकल्प लिया गया था, उसने 2022 तक बाघों की संख्या को 3682 तक पहुंचाकर एक उम्मीद तो जगाई है लेकिन यह सुरक्षा का अंतिम बिंदु नहीं है। बाघ का जंगल में होना इस बात का प्रमाण है कि वह जंगल स्वस्थ है। यदि बाघ लुप्त होता है तो पूरा वन क्षेत्र बिखर जाएगा, जिससे वे औषधीय पौधे भी समाप्त हो जाएंगे, जो बाघों द्वारा संरक्षित घने जंगलों में उगते हैं। यह एक अटूट कड़ी है, जहां शीर्ष शिकारी और सूक्ष्म वनस्पतियां एक-दूसरे के पूरक हैं।
संकट में एक सींग वाला गैंडा
संकटग्रस्त प्रजातियों में एक महत्वपूर्ण प्रजाति है एक सींग वाला गैंडा। कभी यह प्रजाति पाकिस्तान और म्यांमार तक पाई जाती थी लेकिन अब यह केवल भारत और नेपाल में ही सीमित रह गई है। गैंडे धरती के प्राचीनतम वन्य जीवों में से एक हैं, जो अपने आकार, मोटी त्वचा और विशिष्ट सींगों के कारण लाखों वर्षों से अस्तित्व में हैं। एक सींग वाला गैंडा मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है, जो तीन एशियाई गैंडों की प्रजातियों में सबसे बड़ा है। केवल असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में ही इनकी 70 प्रतिशत से अधिक आबादी निवास करती है। गैंडे मुख्य रूप से अपने अनोखे सींग के कारण शिकारियों के निशाने पर रहते हैं क्योंकि इनके सींगों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत अधिक मांग है। इसके अलावा घटते आवास क्षेत्र तथा बाढ़ और जलवायु परिवर्तन भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहे हैं।
हालांकि वन विभाग और स्थानीय समुदायों के प्रयासों से गैंडों की आबादी को संरक्षित किया गया है। 1980 के दशक में इनकी संख्या भारत में करीब 1500 थी, जो संरक्षण के प्रयासों के चलते 2023 की गणना के अनुसार बढ़कर 4014 हो गई। गैंडों की रक्षा के लिए ‘इंडियन राइनो विजन 2020’ योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत इनकी संख्या को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया।
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संकट में सोन चिड़िया
‘सोन चिड़िया’ के नाम से विख्यात राजस्थान का राजकीय पक्षी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) भी भारत का सबसे संकटग्रस्त पक्षी माना जाता है। यह शर्मीला पक्षी सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है, जो विशेष रूप से घास के मैदानों में पाया जाता है और चरागाह पारिस्थितिकी का प्रतिनिधित्व करता है। ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ अधिकांशतः राजस्थान व गुजरात में पाए जाते हैं। इसके अलावा यह पक्षी महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाता है। घास के मैदान की यह प्रमुख प्रजाति चरागाह पारिस्थितिकी का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी संख्या में गिरावट का सबसे बड़ा कारण बिजली की ट्रांसमिशन लाइनों से टकराव है, जिससे हर साल कई ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ मारे जाते हैं। इसके अलावा अवैध शिकार और घास के मैदानों की कमी भी इसकी संख्या में गिरावट का बड़ा कारण है। इनकी संख्या 150 से भी कम रह गई है, जिससे यह दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक बन गया है। भारत में इनकी सर्वाधिक संख्या राजस्थान के ‘डेजर्ट नेशनल पार्क’ में पाई जाती है। इनके संरक्षण के लिए भारत में ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण योजना’ चलाई जा रही है।
आकाश का स्वच्छताकर्मी लड़ रहा अस्तित्व की जंग
इसी कड़ी में ‘लाल सिर वाला गिद्ध’ या ‘राज गिद्ध’, जिसे कभी हम आकाश का स्वच्छता कर्मी कहते थे, आज खुद लुप्तप्राय प्रजातियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है। पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या 90 प्रतिशत तक घट गई है। 1990 के दशक में लाखों की संख्या में दिखने वाले ये पक्षी पशु चिकित्सा में प्रयुक्त ‘डाइक्लोफिनेक’ दवा के जहरीले प्रभाव के कारण 99 प्रतिशत तक समाप्त हो गए। खाद्य स्रोतों की कमी, जंगलों की कटाई और आवास की हानि भी इनकी संख्या निरंतर घटते जाने का प्रमुख कारण बनी है। इसे आईयूसीएन की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल किया गया है। गिद्धों का विनाश केवल एक पक्षी का लुप्त होना नहीं है बल्कि पारिस्थितिक तंत्र की सफाई व्यवस्था का ध्वस्त होना है। गिद्धों की अनुपस्थिति से संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ता है, जो अंततः मानव स्वास्थ्य पर प्रहार करता है। यह इस बात का उदाहरण है कि प्रकृति के एक भी अंग के बीमार होने पर पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है।
कश्मीरी हंगुल हिरन
कश्मीर का ‘रेड डियर’ कहा जाने वाला ‘कश्मीरी हंगुल हिरन’ जम्मू-कश्मीर का राज्य पशु है, जो भारत में पाए जाने वाले सबसे दुर्लभ हिरनों में से एक है। पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे यह लुप्तप्राय स्थिति में पहुंच गया है। 2009 तक श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र में स्थित दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में इनकी कुल संख्या 234 थी, जो 2015 में घटकर मात्र 186 रह गई। हालांकि, हाल के वर्षों में संरक्षण प्रयासों के कारण इनकी संख्या 2023 की गणना के अनुसार बढ़कर 275 हो गई है। खाल और सींगों के लिए किए गए अवैध शिकार के कारण इस प्रजाति को गंभीर नुकसान पहुंचा है। अवैध शिकार और जंगलों की कटाई, प्राकृतिक आवास की हानि और जलवायु परिवर्तन इनके अस्तित्व पर मंडराते खतरे के मुख्य कारण हैं।
लायन टेल्ड मकाक
एक अन्य संकटग्रस्त प्रजाति है लायन-टेल्ड मकाक, जो विशेष रूप से कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के घने वर्षा वनों में पाई जाती है। शेर जैसी मुंह की बनावट और शर्मीले स्वभाव वाली यह प्राचीन स्थानिक प्रजाति मुख्य रूप से फलभक्षी होती है और एकांत में रहना पसंद करती है। लायन-टेल्ड मकाक केवल कुछ सदस्यों के समूहों में रहते हैं। सबसे छोटी मकाक प्रजाति के बंदर का वजन 2 से 10 किलोग्राम के बीच होता है और इसकी पूंछ की लंबाई करीब 25 सेंटीमीटर होती है। इसकी पूंछ के अंत में काले गुच्छे होते हैं, जो नर मकाक में अधिक स्पष्ट होते हैं। इनके आवास के विनाश और शिकार के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। इनकी संख्या 2500 से भी कम हो चुकी है और ये आईयूसीएन की रेड डेटा लिस्ट में ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी में हैं। भारत में पश्चिमी घाट के जंगलों में इसे संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इनके अलावा भी एशियाई हाथी, स्नो लेपर्ड, गंगा डॉल्फिन, काले गिद्ध, मार्बल्ड कैट इत्यादि भारत में कई अन्य संकटग्रस्त प्रजातियां हैं, जिन पर जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार और प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने के कारण खतरा लगातार मंडरा रहा है। हालांकि अब इन संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने के लिए सरकार तथा विभिन्न संगठनों द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलें की जा रही हैं। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ के अलावा, ‘इंटीग्रेटेड डवलपमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ हैबिटेट स्कीम’ के तहत संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बाघों और हाथियों की सुरक्षा के लिए विशेष कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं, जिससे वे बिना किसी बाधा के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जा सकें। गिद्धों की घटती संख्या को ध्यान में रखते हुए ‘वल्चर सेफ जोन’ बनाए जा रहे हैं।
संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए और अधिक ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते इन वन्यजीवों को बचाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो न केवल जैव विविधता को नुकसान होगा बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन भी बिगड़ सकता है। प्रकृति के पास हमारी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन हैं किंतु हमारे लालच के लिए नहीं। बाघ से गिद्ध तक, गैंडे से डॉल्फिन तक और हिमालयी जड़ी-बूटियों से चंदन तक, सभी एक ही जीवन सूत्र से जुड़े हैं। यदि एक भी कड़ी टूटती है तो पूरी श्रृंखला बिखर जाती है। हमें आधुनिक विकास और प्राकृतिक विरासत के बीच एक ऐसा संतुलन बनाना होगा, जहां समृद्धि भी बचे और प्रकृति की सांस भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार तथा ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)

















