आज जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियाँ सामने हैं, तब वनों का संरक्षण मानव सभ्यता के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुका है। 21 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व वानिकी दिवस केवल वृक्षों के महत्व को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें यह समझने का भी अवसर देता है कि प्रकृति और विकास का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का है।भारत की प्राचीन परंपरा ने सदैव प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना है। अथर्ववेद का उद्घोष- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”- आज भी हमें यही स्मरण कराता है कि पृथ्वी के साथ हमारा रिश्ता उपभोग का नहीं, बल्कि संरक्षण और सहअस्तित्व का है।
वन, पृथ्वी में सबसे प्राचीन प्राकृतिक आवास हैं। पृथ्वी में ऑक्सीजन चक्र, कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र और जल चक्र को बनाए रखने में वनों का प्रत्यक्ष योगदान है। मिट्टी में उर्वरता, वायु में आर्द्रता, भूमिगत जल का उच्च स्तर, बाढ़ से मृदा संरक्षण, तापमान नियंत्रण और ध्वनि तथा वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी वनों की प्रत्यक्ष भूमिका है। इमारती और जलाऊ लड़कियां, कागज उद्योग, औषधीय जड़ी-बूटियां तथा विभिन्न प्रकार के जीव जंतु और पशु-पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास, वनों की देन है। वनों के बिना प्राकृतिक पर्यावरण और मनुष्य का जीवन संभव नहीं है। आज हम इस मोड़ पर आ चुके हैं जहां से विकास और विनाश के मार्ग आपस में जुड़ गए हैं। वन केवल हरियाली का प्रतीक ही नहीं , बल्कि वैश्विक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला भी हैं। विश्व आर्थिक मंच के अनुसार दुनिया की लगभग 44 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति की सेवाओं पर निर्भर है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में वानिकी और उससे जुड़े उत्पादों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष योगदान महत्वपूर्ण है। सागवान, साल और शीशम जैसी इमारती लकड़ी के साथ-साथ तेंदूपत्ता, बाँस, गोंद, लाख, शहद, महुआ, चिरौंजी और औषधीय पौधे जैसे गौण वन उत्पाद लाखों ग्रामीण और वनवासियों की आजीविका का आधार हैं। इस दृष्टि से वन केवल पर्यावरणीय संपदा ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा भी हैं। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वानिकी एवं लकड़ी क्षेत्र का प्रत्यक्ष योगदान लगभग 1.3 से 1.5% आँका गया है।
पश्चिमी देशों का मॉडल और भारत का संतुलित दृष्टिकोण
औद्योगिक क्रांति के दौर में कई पश्चिमी देशों ने तीव्र आर्थिक विकास के लिए अपने विशाल प्राकृतिक वनों, और उपनिवेशों के प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की तेज़ गति के कारण बड़े क्षेत्रफल के वन नष्ट हुए। इससे आर्थिक समृद्धि तो बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही जलवायु संकट, जैव विविधता का ह्रास और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएँ भी बढ़ीं। आज विकसित देश आधुनिक तकनीकों और वन संरक्षण उपाय के माध्यम से सतत विकास के लिए प्रयासरत हैं।
भारत ने इस अनुभव से सीख लेते हुए एक संतुलित विकास मॉडल अपनाने का प्रयास किया है। यहाँ विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं माना गया, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई गई है। आज भारत में वृक्षारोपण अभियान, सामुदायिक वन प्रबंधन और हरित ऊर्जा जैसे प्रयास यह संकेत देते हैं कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ संभव हैं।
2014 के बाद वन संरक्षण और नए संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार
पिछले एक दशक में भारत ने वन संरक्षण और जैव विविधता के संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत की वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार वर्ष 2013 से अब तक वन और वृक्ष आवरण में कुल मिलाकर 4.83 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वन क्षेत्र के मामले में अब भारत का स्थान विश्व में 9वें स्थान है जबकि वार्षिक शुद्ध वन वृद्धि में विश्व स्तर पर भारत का स्थान तीसरे नंबर पर है। यह माननीय नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व में वन संरक्षण की दिशा में एक सशक्त और प्रभावशाली कदम दिखता है। हाल के वर्षों में रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व (राजस्थान), गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व (छत्तीसगढ़) और रानीपुर टाइगर रिजर्व (उत्तर प्रदेश) जैसे नए संरक्षित क्षेत्रों की घोषणा की गई है। इसके अतिरिक्त भारत में संरक्षित क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ा है और देश में अब 107 राष्ट्रीय उद्यान, 570 से अधिक वन्यजीव अभयारण्य और 58 टाइगर रिजर्व हैं।
वृक्षारोपण के क्षेत्र में भी व्यापक अभियान चलाए गए हैं। “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के अंतर्गत 5 जून 2024 से 2025 तक 262.4 करोड़ पौधे लगाए गए, ग्रीन इंडिया मिशन और विभिन्न राज्यों के जन-भागीदारी आधारित वृक्षारोपण कार्यक्रमों के माध्यम से भी करोड़ों पौधे लगाए गए हैं। इन अभियानों ने पर्यावरण संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर जन-आंदोलन का रूप दिया है। मोदी सरकार की यह बड़ी उपलब्धि रही है कि यदि विकास के नाम पर पेड़ काटना पड़ा है तो प्रत्येक पेड़ के बदले सैकड़ो पौधे लगाने का संकल्प भी सरकार ने पूरा किया है। इसका परिणाम यह हुआ कि विकास की बड़ी योजनाओं के सतत क्रियान्वयन के बावजूद वन क्षेत्र और वृक्ष आवरण लगातार बढ़ रहा है।
आधुनिक नगर और वन संरक्षण को साथ-साथ चलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 2025 में “नगर वन योजना” की घोषणा की है जिसके अंतर्गत 75 परियोजनाओं को मंजूरी भी दे दी गई है। हमारा इंदौर शहर इस तरह की परियोजनाओं के लिए पहले से ही तैयार रहा है। यहां निवासियों और प्रशासन की सहभागिता ने पूरे विश्व के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया है।
इंदौर : जन भागीदारी से हरित विकास का उदाहरण
स्वच्छता के क्षेत्र में देश में अग्रणी स्थान प्राप्त करने वाला इंदौर अब हरित शहरीकरण के क्षेत्र में भी नई मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। 14 जुलाई 2024 को इंदौर की रेवती रेंज में नगर निगम, “आशा” (गैर सरकारी संगठन) और लगभग 35000 नगर वासियों ने एक ही दिन में 12.4 लाख पौधे लगाकर एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्थापित किया गया।
यह केवल एक पर्यावरणीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हजारों इंदौरवासियों की सामूहिक जिम्मेदारी का उदाहरण था। आमजन ने यहां केवल पौधे नहीं लगाए बल्कि उनकी सुरक्षा और वृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से अपना सहयोग भी देते रहे। यही कारण है कि यहां लगाए गए सभी पौधे न केवल सुरक्षित हैं बल्कि तेजी से सघन वन में परिवर्तित हो रहे हैं। इंदौर ने यह सिद्ध किया कि जब समाज और शासन मिलकर कार्य करते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण एक जन-आंदोलन बन सकता है।
इंदौर से एक नई शुरुआत : शहरों के बीच छोटे-छोटे जंगल
आज शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है और शहरों में हरित क्षेत्र लगातार घट रहे हैं। इस चुनौती का समाधान खोजने के लिए इंदौर में शहरों के भीतर छोटे-छोटे सघन वन क्षेत्र को मियाबाक तकनीक (सीमित क्षेत्र में सघन वन के निर्माण लिए अपनाई जाने वाली तकनीक) से विकसित करने की पहल की जा रही है।
इन “मिनी फॉरेस्ट” या “अर्बन फॉरेस्ट” को छोटे-छोटे भूखंडों में विकसित किया जा रहा है, जहाँ स्थानीय प्रजातियों के घने वृक्ष लगाए जाते हैं। इससे शहरों में तापमान कम होता है, वायु गुणवत्ता सुधरती है और पक्षियों व छोटे जीवों के लिए प्राकृतिक आवास भी बनता है। यह मॉडल आने वाले समय में अन्य शहरों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
भविष्य की दिशा : हरित शहर और सतत विकास
भविष्य की विकास रणनीति में हरित शहरों का निर्माण, वनों का संरक्षण और सतत विकास को केंद्र में रखना होगा। शहरी नियोजन में हरित पट्टियों, अर्बन फॉरेस्ट और जल स्रोतों के संरक्षण को अनिवार्य तत्व बनाना आवश्यक है।
इसके साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वनवासियों की आजीविका की सुरक्षा और जैव विविधता के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। यदि आज हम अपने जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हैं, तो यह केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी विरासत भी होगी।
विश्व वानिकी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सहअस्तित्व है। भारत आज जिस हरित विकास मॉडल की ओर बढ़ रहा है, वह न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक प्रेरणादायी उदाहरण भी बन सकता है। यदि समाज और शासन मिलकर वनों के संरक्षण का संकल्प लें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत केवल एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि एक सशक्त हरित महाशक्ति के रूप में भी विश्व के सामने खड़ा होगा।

















