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होम विज्ञान और तकनीक

विरासत का संरक्षण, भविष्य का पथ

नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक विविधता पर विशेष बल दिया गया। मणिपुर की पांच दिवसीय होली, अरुणाचल एवं मणिपुर की प्राचीन पांडुलिपियां तथा रुक्मिणी-कृष्ण परंपरा जैसे सांस्कृतिक तत्वों को भारतीय एकता का आधार बताया गया

Written byMahak SinghMahak Singh — edited by Mahak Singh
Apr 21, 2026, 04:11 pm IST
in विज्ञान और तकनीक, शिक्षा, दिल्ली
कार्यक्रम में श्री चौना मीन और उनकी पत्नी श्रीमती नांग सती मीन को 'ब्रह्मपुत्र सम्मान' अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्ण। साथ में हैं दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरणजीत सिंह संधू और 'जनजातीय गुरुकुल' के संस्थापक तथा प्रेरक श्री तरुण विजय (पूर्व संपादक पाञ्चजन्य)

कार्यक्रम में श्री चौना मीन और उनकी पत्नी श्रीमती नांग सती मीन को 'ब्रह्मपुत्र सम्मान' अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्ण। साथ में हैं दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरणजीत सिंह संधू और 'जनजातीय गुरुकुल' के संस्थापक तथा प्रेरक श्री तरुण विजय (पूर्व संपादक पाञ्चजन्य)

गत 13 और 14 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में जनजातीय समाज के समग्र विकास, उसकी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से उसके सशक्तिकरण पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस दो दिवसीय आयोजन का विषय था- ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन : भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण।’

यह सम्मेलन जनजातीय समाज की परंपरागत ज्ञान-व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान, भाषाई विविधता तथा आधुनिक विकास मॉडल के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक सशक्त मंच सिद्ध हुआ। इसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों, सैन्य अधिकारियों, शिक्षाविदों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इसका आयोजन आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल, देहरादून की रजत जयंती के अवसर पर हुआ।

सम्मेलन का उद्घाटन भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने जनजातीय समाज की विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत के लगभग 1.4 लाख जनजातीय गांवों में देश की लगभग 9 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इन समुदायों के पास पीढ़ियों से संचित अत्यंत समृद्ध पारंपरिक ज्ञान है, जो जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने आगे कहा कि यदि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को इस पारंपरिक ज्ञान, भाषा और संस्कृति के साथ समन्वित किया जाए, तो यह समग्र सामाजिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने जनजातीय समाज को केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और पर्यावरणीय धरोहर बताते हुए इसके संरक्षण को राष्ट्रीय कर्तव्य बताया।

उपराष्ट्रपति ने उत्तर-पूर्व भारत के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस क्षेत्र में हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं- पुल, विमानतल, राजमार्ग, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग संस्थान- स्थापित किए गए हैं, जिससे क्षेत्र का व्यापक रूपांतरण हुआ है। उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्व को ‘अष्ट लक्ष्मी’ के रूप में देखा गया है और यह क्षेत्र महिला नेतृत्व तथा विकासशील ऊर्जा का प्रतीक बनकर उभर रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस क्षेत्र की सीमाएं कई देशों-बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार, थाईलैंड और चीन से जुड़ी हैं, जिससे इसकी रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने आईटी आईटीआई दून संस्कृति स्कूल (जनजातीय गुरुकुल) की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना करते हुए कहा कि यह विद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि भारत की जनजातीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है।

उन्होंने कहा कि इसके अगले 25 वर्ष और भी अधिक कीर्तिमान स्थापित करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनजातीय समाज भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर का मूल स्वरूप है और उसकी भाषा, संस्कृति एवं आस्था की रक्षा हम सभी का सामूहिक दायित्व है। इस संदर्भ में जनरल (सेनि) राजीव घई ने स्पष्ट कहा कि उत्तर-पूर्व में भाषा और संस्कृति की रक्षा केवल सांस्कृतिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल आधार है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह-प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी ने कहा कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों में विकसित एक जीवंत, मूल्यनिष्ठ और संतुलनकारी परंपरा है, जिसका मूल उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज इस परंपरा का सशक्त उदाहरण है और उन्होंने यह महत्वपूर्ण विचार रखा कि ‘हमें जनजातीय क्षेत्रों में सिखाने नहीं, बल्कि उनसे सीखने के लिए जाना चाहिए।’ उन्होंने जनजातीय नवाचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ क्षेत्रों में चूहों को पकड़ने के लिए 14 प्रकार के पारंपरिक जाल विकसित किए गए हैं, जो उनके अनुभव-आधारित ज्ञान का प्रमाण हैं।भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव श्री सुनील देवधर ने पूर्वोत्तर भारत में सांस्कृतिक चुनौतियों और संरक्षण के प्रयासों का उल्लेख करते हुए रानी गाइदिन्ल्यू, बिरसा मुंडा, यू कियांग नोंगबा तथा थोगन संगमा जैसे जनजातीय नायकों को स्मरण किया। उन्होंने खासी आंदोलन को सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का उदाहरण बताया। रिवॉच, अरुणाचल प्रदेश के कार्यकारी निदेशक श्री विजय स्वामी ने कहा कि जनजातीय समाज को पिछड़ा मानना एक भ्रांत धारणा है। उन्होंने कहा कि उनकी संस्कृति वैज्ञानिक और व्यवस्थित, जीवन-दर्शन पर आधारित है तथा उसका आधुनिक दस्तावेजीकरण आवश्यक है। उन्होंने डिजिटल डेटा बैंक और वर्चुअल म्यूजियम को इस दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

आईआईटी, मुंबई के प्रो. गणेश रामकृष्णन ने जनजातीय भाषाओं के संरक्षण हेतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित परियोजना की घोषणा की। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के माध्यम से जनजातीय भाषाओं का डिजिटल रूपांतरण, अनुवाद तथा देवनागरी लिपि में संरक्षण किया जाएगा। श्री तरुण विजय ने अपने अभिभाषण में कहा कि अब यह कहना उचित नहीं कि उत्तर-पूर्व को राष्ट्रीय मुख्यधारा में जोड़ा जाए, बल्कि शेष भारत को उत्तर-पूर्व की सांस्कृतिक मुख्यधारा में सम्मिलित होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर-पूर्व के महापुरुषों और परंपराओं को शेष भारत की शिक्षा व्यवस्था में समाहित किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि देश में सर्वाधिक सुंदर और समृद्ध सांस्कृतिक उत्सव उत्तर-पूर्व में होते हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान मिलनी चाहिए। केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्यमंत्री श्री दुर्गादास उइके, लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि) नितिन कोहली, शिक्षा सचिव डॉ. विनीत जोशी, वैज्ञानिक डॉ. विजय कुमार सारस्वत, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सचिन चतुर्वेदी, नॉर्थ ईस्ट हिल यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. प्रभा शंकर शुक्ला सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री चौना मीन एवं उनकी धर्मपत्नी को ‘ब्रह्मपुत्र गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

इस आयोजन में केंद्रीय विज्ञान और तकनीकी राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और उत्तर पूर्वांचल विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुख्य भूमिका रही। इस अवसर पर दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरणजीत सिंह संधू, अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री चौना मीन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर, एनईसीटीएआर के महानिदेशक, नीति आयोग के सदस्य, नालंदा विश्वविद्यालय, नॉर्थ ईस्ट हिल यूनिवर्सिटी सहित अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं वरिष्ठ विद्वान उपस्थित रहे।

Topics: भारत मंडपमचौना मीनपाञ्चजन्य विशेषप्रदीप जोशीसी.पी. राधाकृष्णनजैव विविधता संरक्षणFETUREDविरासत का संरक्षणजनजातीय सशक्तिकरणआईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूलतरुण विजयजनजातीय गुरुकुलराष्ट्रीय सुरक्षाब्रह्मपुत्र सम्मान
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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