इजरायल-ईरान तनाव: क्या संकट की इस घड़ी में 'विश्व मित्र' भारत बनेगा दुनिया का नया मध्यस्थ?
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इजरायल-ईरान तनाव: क्या संकट की इस घड़ी में ‘विश्व मित्र’ भारत बनेगा दुनिया का नया मध्यस्थ?

पश्चिम एशिया में इज़रायल-ईरान-अमेरिका टकराव की गहराई समझें: ईरान की आंतरिक उथल-पुथल, परमाणु संकट और मोदी की इज़राइल यात्रा में भारत की संतुलित कूटनीति। रणनीतिक स्वायत्तता का विश्लेषण।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Mar 2, 2026, 11:38 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Iran Israel tension

पश्चिम एशिया में इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच उभरता टकराव केवल पारंपरिक युद्ध की कहानी नहीं है। इसे महज़ “इज़रायल बनाम ईरान” के रूप में देखना विश्लेषणात्मक सरलीकरण होगा। इस संघर्ष के पीछे वैचारिक टकराव, क्षेत्रीय वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा, परमाणु संतुलन की चिंता और सबसे महत्वपूर्ण—ईरान की आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल—सभी कारक सक्रिय हैं।

यदि इसे केवल पश्चिमी शक्तियों द्वारा ईरान के विरुद्ध युद्ध कहा जाए, तो यह वास्तविकता का अधूरा चित्र होगा। असली दरार ईरान की सत्ता संरचना और उसके समाज के बीच मौजूद है।

मोदी की इज़रायल यात्रा: आतंकवाद पर स्पष्ट संदेश

ऐसे संवेदनशील समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़रायल के साथ आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता व्यक्त कर एक स्पष्ट कूटनीतिक संकेत दिया। अक्टूबर में त्योहारों के दौरान हमास द्वारा किए गए हमलों में निर्दोष नागरिकों की हत्या का उल्लेख करते हुए भारत ने सिद्धांत आधारित रुख अपनाया—आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता। महत्वपूर्ण बात यह रही कि भारत ने सीधे ईरानी सरकार को दोषी नहीं ठहराया। यह भाषा-चयन कूटनीतिक परिपक्वता का संकेत है। नई दिल्ली भली-भांति जानती है कि ईरान की जनता और वहां की कट्टरपंथी सत्ता-व्यवस्था को एक ही तराजू में तौलना न तो नैतिक रूप से उचित है और न ही रणनीतिक रूप से लाभकारी।

इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान को माकूल जबाव: अफगान तालिबान ने नूर खान एयरबेस समेत कई सैन्य ठिकानों पर किया हमला

ईरान का आंतरिक द्वंद्व: जनता बनाम सत्ता संरचना

1979 की इस्लामी क्रांति, जिसका नेतृत्व अयातुल्लाह खामेनेई ने किया और जिसने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाया, उसके बाद से ईरान में सर्वोच्च नेता की केंद्रीकृत सत्ता स्थापित हुई। वर्तमान में अली खामेनेई के पास अंतिम निर्णय की शक्ति है—विशेषकर सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में।

इस्लामिक रिवोल्युशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) केवल सैन्य बल नहीं, बल्कि वैचारिक संरक्षक के रूप में कार्य करता है। यह नियमित सेना (आर्तेश) से अलग समानांतर शक्ति केंद्र है। वर्षों से इसने असहमति को कठोरता से दबाया है। फिर भी, ईरानी समाज में बदलाव की आकांक्षा स्पष्ट दिखती रही है। अनेक बार हुए जनआंदोलनों ने संकेत दिया है कि युवा पीढ़ी अधिक खुली और आधुनिक व्यवस्था चाहती है। राष्ट्रपति मसूद पजेशकियन को अपेक्षाकृत उदार चेहरा माना जाता है, किंतु उनकी शक्ति संरचनात्मक सीमाओं से बंधी हुई है। वास्तविक नियंत्रण अब भी सर्वोच्च नेता और उनके प्रति निष्ठावान संस्थानों के पास है। भारत की संतुलित भाषा इस अंतर को पहचानती है—कट्टर नीतियों का विरोध, पर जनता से दूरी नहीं।

परमाणु प्रश्न और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा

क्षेत्रीय अस्थिरता के केंद्र में ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा है। इज़राइल इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। खाड़ी देशों, विशेषकर सउदी अरेबिया, के लिए यह शक्ति संतुलन का प्रश्न है। सऊदी अरब पहले ही संकेत दे चुका है कि यदि ईरान परमाणु शक्ति बनता है, तो वह भी वैसी ही दिशा में कदम बढ़ा सकता है। इस प्रतिस्पर्धा में वैचारिक संघर्ष से अधिक भू-राजनीतिक समीकरण प्रभावी हैं। परंतु व्यापक सैन्य टकराव वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर सकता है—जो भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए गंभीर चुनौती होगी।

भारत की संतुलन नीति: सिद्धांत और व्यावहारिकता

भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र है—रणनीतिक स्वायत्तता। एक ओर इज़राइल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग मजबूत है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध भी कायम हैं। ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भारत को संतुलित रुख अपनाने के लिए प्रेरित करती है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भी यही दृष्टिकोण दिखा। भारत ने व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप दोनों से संवाद बनाए रखा। अमेरिका की नीति में समय-समय पर दिखी संयमित प्रतिक्रिया और नाटो सहयोगियों के दबाव के बावजूद प्रत्यक्ष सैन्य विस्तार से परहेज़, वैश्विक शक्ति-संतुलन की जटिलता को दर्शाता है। भारत की निरंतर कूटनीतिक सक्रियता ने संवाद के विकल्प खुले रखने में योगदान दिया।

चीन कारक: पृष्ठभूमि की वास्तविकता

भारत की यह संतुलन नीति चीन से अलग नहीं है। चीन की विस्तारवादी प्रवृत्ति और उसका पाकिस्तान के साथ रणनीतिक गठजोड़ भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौती है। ऐसे में किसी एक ध्रुव के साथ पूर्ण संरेखण भारत की रणनीतिक लचीलेपन को सीमित कर सकता है। आर्थिक स्तर पर भी चीन एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। अतः प्रतिस्पर्धा और परस्पर निर्भरता दोनों साथ-साथ चलती हैं। भारत की कूटनीति इसी यथार्थवादी संतुलन पर आधारित है।

इसे भी पढ़ें: ईरान Vs इजरायल-अमेरिका युद्ध: भारत का क्या है स्टैंड? PM मोदी ने UAE के राष्ट्रपति से क्या कहा?

संभावित मध्यस्थ की भूमिका

भविष्य में यदि ईरान और इज़राइल के बीच तनाव कम करने के प्रयास होते हैं, तो भारत की स्वीकार्यता एक संभावित मध्यस्थ के रूप में उभर सकती है। भारत न तो हस्तक्षेपवादी छवि रखता है और न ही संप्रदायगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। यही उसकी ताकत है।

संतुलन ही शक्ति है

इज़रायल के साथ आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता, ईरान की जनता के प्रति संवेदनशीलता, और वैश्विक शक्तियों के साथ संवाद—ये सभी मिलकर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को परिभाषित करते हैं। आज की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलन केवल विकल्प नहीं, बल्कि शक्ति का नया स्वरूप है। भारत इसी संतुलन को साधते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और वैश्विक स्थिरता दोनों में योगदान देने की कोशिश कर रहा है।

Topics: Israel Iran Conflictइज़रायल ईरान टकरावभारत इज़रायल संबंधमोदी इज़रायल यात्राईरान आंतरिक उथल-पुथलभारत रणनीतिक स्वायत्ततामोदी हमास आतंकवाद विरोधModi Israel visitIran internal turmoilIndia strategic autonomyIndia-Israel RelationsModi Hamas counter terrorism
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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