लोकतंत्र का मतलब सिर्फ सरकार चुनना नहीं होता, बल्कि इसमें जनता की भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी होती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ करोड़ों लोग वोट देकर अपनी सरकार चुनते हैं। लेकिन यह भी सच है कि आज भी बहुत से पढ़े-लिखे और योग्य लोग मतदान नहीं करते। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मतदान को सभी के लिए अनिवार्य बनाने जैसे उपायों पर सोच-विचार किया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र और मजबूत बन सके।
मतदान अनिवार्य और नोटा पर पुनर्विचार की जरूरत- सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि मतदान को अनिवार्य बनाने का मतलब लोगों पर दबाव डालना नहीं है। इसका उद्देश्य यह है कि अधिक से अधिक लोग चुनाव प्रक्रिया से जुड़ें और अपने मत का सही इस्तेमाल करें। इससे लोग देश के भविष्य को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभा सकेंगे। अदालत ने ‘नोटा’ यानी “इनमें से कोई नहीं” विकल्प पर भी सवाल उठाए हैं, क्योंकि पिछले कई वर्षों में बहुत कम लोगों ने इसका उपयोग किया है। नोटा विकल्प इसलिए लाया गया था ताकि अगर किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद न हो, तो वह अपनी नाराजगी दिखा सके। सोचा गया था कि इससे राजनीतिक दल अच्छे और ईमानदार उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे। लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला, क्योंकि नोटा का असर चुनाव के नतीजों पर बहुत कम पड़ता है।
नोटा को उम्मीदवार बनाने पर बहस- इसी कारण एक जनहित याचिका में मांग की गई कि जहाँ सिर्फ एक ही उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा हो, वहाँ नोटा को भी एक उम्मीदवार की तरह माना जाए। इससे यह पता चल सकेगा कि जनता सच में उस उम्मीदवार को चाहती है या नहीं। यह विचार लोकतंत्र को ज्यादा पारदर्शी और जिम्मेदार बना सकता है। हालाँकि सरकार और कुछ कानूनी जानकारों ने इस सुझाव का विरोध किया है। उनका कहना है कि मतदान मौलिक अधिकार नहीं है और कानून में बदलाव करना संसद का काम है। साथ ही, नोटा कोई व्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे उम्मीदवार नहीं माना जा सकता।
अनिवार्य मतदान से मजबूत लोकतंत्र- सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे और संपन्न लोग अक्सर वोट देने नहीं जाते, जबकि गाँवों में लोग बड़े उत्साह से मतदान करते हैं। यह सोचने की बात है, क्योंकि शिक्षित वर्ग से ज्यादा जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। अगर मतदान को नागरिक कर्तव्य माना जाए, तो लोग ज्यादा जिम्मेदारी से वोट देंगे। इससे चुनाव ज्यादा सही और निष्पक्ष होंगे तथा सरकार को मजबूत जनसमर्थन मिलेगा। साथ ही, नोटा व्यवस्था में सुधार से राजनीति में अच्छे और ईमानदार नेताओं के आने का रास्ता भी खुलेगा।

















