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बुंदेलखंड के लोक मानस में श्रीराम

बुंदेलखंड के लोक-साहित्य और जन-जीवन में राम का चरित्र एक विशाल वटवृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें इतिहास, लोकगीतों, उत्सवों और संस्कारों तक फैली हुई हैं। महाकवि विष्णुदास ने जिस रामकथा का बीजारोपण किया, वह ओरछा के 'राजा राम' के रूप में फली-फूली और लोकगीतों के माध्यम से जन-जन की आत्मा में खिल उठी।

Written byडॉ. पवनपुत्र बादलडॉ. पवनपुत्र बादल
Feb 24, 2026, 02:11 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

बुंदेलखंड के लोक-साहित्य और जन-जीवन में राम का चरित्र एक विशाल वटवृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें इतिहास, लोकगीतों, उत्सवों और संस्कारों में फैली हुई हैं। महाकवि विष्णुदास ने जिस रामकथा का बीजारोपण किया, वह ओरछा के ‘राजा राम’ के रूप में फली-फूली और लोकगीतों के माध्यम से जन-जन की आत्मा में खिल उठी।

बुंदेलखंड की यह धरा, जो विंध्य की उपत्यकाओं और बेतवा, केन तथा धसान नदियों के जल से सिंचित है, भारतीय चेतना के उस अनूठे रूप का प्रतिनिधित्व करती है जहां ‘देवत्व’ और ‘मनुष्यत्व’ एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। बुंदेलखंड के लोक-जीवन में राम का चरित्र किसी मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं है। वे यहां खेतों की मेड़ों पर चलते हैं, चौपालों की बातचीत में शामिल होते हैं और घर के आँगन में गाए जाने वाले गीतों में भाग लेते हैं।

अकादमिक दृष्टि से देखें तो बुंदेलखंड रामकाव्य की उद्गम स्थली रहा है। चाहे महर्षि वाल्मीकि का चित्रकूट हो, गोस्वामी तुलसीदास का राजापुर हो, या केशवदास की ओरछा, बुंदेलखंड की ऐतिहासिक एवं ख्यातिलब्ध भूभाग ने रामकथा को न केवल शब्द दिए, बल्कि उसे एक ‘लोक-व्यवहार’ में बदल दिया। यहां के लोग श्रीराम को आदर्श राजा के साथ-साथ अपने घर के सदस्य-भांजा, दामाद या सखा के रूप में देखते हैं। यही आत्मीयता बुंदेली लोक-साहित्य की वह धुरी है जिस पर सारी रामकथा घूमती है।

इस आंचलिक संस्कृति में राम महज़ एक पौराणिक नायक नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन-संघर्ष में साथ देने वाले सहचर हैं। जब गर्मी की दोपहर में किसान अपने खेत में पसीना बहाता है, तो उसे याद आता है कि श्रीराम ने भी चित्रकूट की कठोर धरती पर नंगे पांव चलकर यही कष्ट सहे थे। यह सजीव अनुभूति, यह हृदय से हृदय का जुड़ाव यही तो बुंदेलखंड की रामकथा की विशिष्टता है। यहां शास्त्र और लोक का भेद मिट जाता है और राम हर घर की देहरी पर खड़े दिखते हैं।

महाकवि विष्णुदास का योगदान

हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों में अक्सर यह भ्रांति दिखती है कि उत्तर भारत में रामकथा का व्यापक प्रचार ‘रामचरितमानस’ के बाद हुआ। लेकिन ऐतिहासिक और साहित्यिक शोध यह तथ्य स्थापित करते हैं कि बुंदेलखंड ने गोस्वामी तुलसीदास से बहुत पहले ही रामकथा को अपनी भाषा में ढाल लिया था। ग्वालियर नरेश डूंगरेंद्र सिंह के राजकवि महाकवि विष्णुदास ने सन् 1442 ई. (संवत् 1500 के आसपास) में ‘रामायण कथा’ की रचना की थी। यह कालखंड गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ‘रामचरितमानस’ (संवत् 1631) के लेखन से लगभग 132 वर्ष पहले का है।

शोध की दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि 14वीं-15वीं शताब्दी में ही बुंदेलखंड का समाज संस्कृत के जटिल ज्ञान को लोकभाषा में उतारने के लिए तत्पर था। विष्णुदास ने राम के चरित्र को जिस लोक-रंजनकारी रूप में प्रस्तुत किया, उसने बाद के कवियों ईसुरी और गंगाधर व्यास के लिए आधार तैयार किया।

विष्णुदास की यह रचना केवल एक काव्यिक अनुवाद नहीं थी; यह एक सांस्कृतिक आंदोलन का सूत्रपात था। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के संस्कृत श्लोकों को बुंदेली और ब्रज के मिश्रित स्वरूप में पिरोकर एक ऐसी भाषा गढ़ी जो जनसामान्य के हृदय को स्पर्श कर सके। इस प्रयास में एक गहरा लोकतांत्रिक दर्शन निहित था। साहित्यिक परंपरा में इसे ‘भाषा-भक्ति आंदोलन’ का अग्रदूत माना जा सकता है, जो बाद में कबीर और तुलसी के माध्यम से अपने चरम पर पहुंचा । इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो बुंदेलखंड न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से भी रामकथा का केंद्र-बिंदु रहा है, एक ऐसी प्रयोगशाला जहां संस्कृत का दिव्य काव्य लोकभाषा की मिट्टी में रोपा गया और जन-जन के जीवन में पल्लवित हुआ।

काल-संयोग एवं ‘राजा राम’ की परिकल्पना

बुंदेलखंड के लोक-इतिहास में संवत् 1631 एक अनोखा काल-बिंदु है जहां साहित्य और राजसत्ता का अद्भुत मिलन होता है। यह एक विलक्षण संयोग है कि जिस वर्ष, जिस माह और जिस नक्षत्र में अयोध्या में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की पहली पंक्ति लिखी, ठीक उसी समय ओरछा की महारानी गणेश कुंवरि अयोध्या से रामलला के विग्रह को लेकर ओरछा में प्रवेश कर रही थीं। लोक-मान्यता के अनुसार, श्रीराम ने ओरछा आने के लिए तीन मांगे रखी थीं-पहली, मैं पुष्य नक्षत्र में ही चलूगा; दूसरी, जहां बैठ जाऊंगा वहां से नहीं उठूंगा; और तीसरी, मैं वहां ‘भगवान’ नहीं, ‘राजा’ के रूप में रहूंगा।

यही कारण है कि ओरछा विश्व का एकमात्र स्थान है जहां राम को ‘राजा’ माना जाता है। यहां सूर्योदय और सूर्यास्त पर उन्हें पुलिस द्वारा ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दी जाती है। लोक-मानस राम को मंदिर में नहीं, ‘महल’ में विराजित देखता है। समाजशास्त्रीय एवं राजनीतिक दृष्टि से यह बुंदेलखंडी जनमानस के उस भाव का प्रतीक है जो एक न्यायप्रिय और आदर्श शासक की कामना करती है। इसी क्रम में जब ओरछा के राजा मधुकर शाह अपनी सत्ता श्रीराम को सौंप दिया, तो वह ‘प्रजा-रंजन’ व जनकल्याण के सर्वोच्च आदर्श की स्थापना का प्रयास माना गया।

बुंदेली लोक-गीतों में राम

बुंदेलखंडी लोक-साहित्य,विशेषकर गीतों में राम का जो रूप मिलता है, वह ‘शास्त्रों’ के राम से भिन्न है-ये ‘लोक’ के राम हैं। राम की दिव्यता मानवीय संबंधों की मिठास में घुली हुई है। जन्म से मृत्यु तक, जीवन के हर संस्कार में राम किसी न किसी रूप में मौजूद हैं।

सोहर और पालना गीत: बाल राम का वात्सल्य

जब बुंदेलखंड के किसी घर में बेटा पैदा होता है, तो वह सामान्य शिशु नहीं, बल्कि ‘राम’ का प्रतिरूप माना जाता है। ‘सोहर’ गीतों में कौशल्या और दशरथ का प्रसंग ज़रूर आता है। इन गीतों में स्त्रियां अपनी प्रसव पीड़ा और मातृत्व के आनंद को राम के जन्म से जोड़ती हैं। क्योंकि राम ‘ब्रह्म’ नहीं, खिलौनों से खेलने वाले बालक हैं।

बुंदेलखंड की संस्कृति में विवाह-गीतों का विशेष महत्व है। मिथिला और बुंदेलखंड के सांस्कृतिक संबंधों में एक अदृश्य डोर है, इसलिए राम को प्रायः‘दामाद’ के रूप में भी देखा जाता है। विवाह के समय गाई जाने वाली ‘गारी’ (मीठी गालियां) इसका सबूत हैं। स्त्रियां राम को लक्ष्य करके हंसी-मज़ाक करती हैं, जो किसी देवता के साथ संभव नहीं-केवल किसी अपने रिश्तेदार के साथ ही संभव है। यह अनादर नहीं, बल्कि ‘सख्य भाव’ और ‘वात्सल्य’ की चरम सीमा है।

वनवासी राम: बुंदेली संघर्ष के प्रतीक

चित्रकूट और उसके आसपास के इलाकों में राम के ‘वनवासी’ रूप की प्रतिष्ठा ‘राजा राम’ से भी ज़्यादा है। बुंदेलखंड भौगोलिक रूप से दुष्कर क्षेत्र है जहां पथरीली ज़मीन, पानी की कमी, बीहड़ के कारण जनजीवन सामान्य नहीं है । श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास और उनका संघर्ष बुंदेलखंड के किसान और मज़दूर के जीवन-संघर्ष का मानो एक दर्पण है। लोकगीतों में राम के नंगे पैर चलने, कंद-मूल खाने और ज़मीन पर सोने का जो वर्णन है, वह लोगों के विश्वास एवं साहस बढ़ाता है. उन्हें लगता है कि जब स्वयं भगवान ने यह कष्ट सहे, तो उनका संघर्ष फलीभूत होगा एवं अंत में सब ठीक होगा।

कृषि-संस्कृति और ऋतु-गीतों में राम

बुंदेलखंड मूलतः कृषि-प्रधान अंचल है और यहां की खेती-किसानी की संस्कृति में राम गहराई से बसे हुए हैं। अक्षय तृतीया (अक्ती) के दिन जब किसान पहली बार खेत में बीज डालता है, तो वह ‘राम का नाम’ लेकर ही शुरुआत करता है। लोक-विश्वास है कि राम का नाम लेने से अन्न में ‘बरकत’ होती है। एक कहावत मशहूर है-‘राम की चिरैया, राम का खेत, खा लो चिरैया भर-भर पेट।’ यह उक्ति प्रकृति और इंसान के सह-अस्तित्व का उदार दर्शन पेश करती है, जिसके केंद्र में राम हैं।

वसंत ऋतु में जब रबी की फसल कटने वाली होती है, तब ‘फाग’और ‘लमटेरा’ गाए जाते हैं। फाग में कृष्ण और राधा का प्राधान्य होता है, लेकिन बुंदेलखंड में ‘राम की फाग’ भी उतनी ही लोकप्रिय है। ईसुरी की फागों में भी राम का स्मरण लोक-जीवन की सच्चाइयों के साथ गुंथा मिलता है।

सामाजिक मूल्य एवं नैतिक प्रतिमान

बुंदेलखंड के लोक-साहित्य में राम केवल मनोरंजन या भक्ति के विषय नहीं, अपितु एक ‘नैतिक मानदंड’ हैं। बुंदेलखंड वीरों की भूमि रही है। आल्हा-ऊदल से लेकर छत्रसाल तक, यहां की वीरता के मूल में ‘वचन-पालन’ का संस्कार है, जो सीधे राम के चरित्र से लिया गया है। ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’, यह आदर्श बुंदेली ‘आन’ की नींव है।

स्त्रियों का सम्मान-रामकथा में सीता का त्याग और उनका वनवास बुंदेली लोक-मन को द्रवित करता है। लोकगीतों में सीता के प्रति गहरी सहानुभूति दिखती है। कई गीतों में स्त्रियां राम को उलाहना देती हैं कि उन्होंने सीता को वन क्यों भेजा। यह ‘लोक-न्याय’ की वह दृष्टि है जो भगवान से भी सवाल करने का साहस रखती है।

इस सांस्कृतिक परिदृश्य में राम का आदर्श केवल पुरुषों के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए प्रासंगिक बनता है। बुंदेली लोक-कथाओं में भरत का त्याग, लक्ष्मण की निष्ठा और हनुमान की सेवा-भावना, ये सभी गुण दैनिक जीवन के आचरण में ढल जाते हैं। जब कोई किसान अपने पड़ोसी की फसल में हाथ बंटाता है, तो वह लक्ष्मण की भ्रातृ-प्रेम की परंपरा को जीवित रखता है। जब कोई मां अपनी बेटी को शिक्षा देती है, तो वह सीता के ज्ञान और साहस को आगे बढ़ाती है। इस प्रकार, बुंदेलखंड में रामकथा एक जीवंत नीति-शास्त्र का रूप धारण कर लेती है, न कि कोई जड़ धार्मिक ग्रंथ। राम की मर्यादा कठोर नियम नहीं, बल्कि लचीला और मानवीय आदर्श है जो समय और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को पुनर्परिभाषित करता रहता है। यही कारण है कि सदियों बाद भी यह लोक-परंपरा अपनी प्रासंगिकता नहीं खोती।

लोक-नाट्य: रामलीला की मौखिक परंपरा

बुंदेलखंड में रामलीला केवल मंचन नहीं, एक ‘अनुष्ठान’ है। रामलीलाओं में ‘संवाद’ की प्रधानता होती है। ये संवाद पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद किए जाते हैं। पन्ना, अजयगढ़ और ओरछा की रामलीलाओं में अभिनय से ज़्यादा ‘भाव’ और ‘शब्द’ पर ज़ोर दिया जाता है। यह मौखिक परंपरा ही वह माध्यम है जिससे निरक्षर ग्रामीण भी रामकथा के गूढ़ दार्शनिक तत्वों को आत्मसात कर लेता है।

बुंदेली भाषा और साहित्य में राम

बुंदेली भाषा और साहित्य में राम की उपस्थिति इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता और लोकधर्म की सजीव अभिव्यक्ति है। बुंदेली भाषा ने रामकथा को अपनी भाषिक संरचना और लोकसंवेदना के अनुरूप आत्मसात किया है। इस भाषा में राम केवल धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि नैतिक आदर्श और लोकसंस्कृति के स्थायी प्रतीक बन जाते हैं।

बुंदेली साहित्य में रामकथा का प्रसार मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से हुआ। लोककवि, कथावाचक और संत परंपरा ने रामकथा को जनसामान्य तक पहुंचाया। इन काव्य और कथात्मक रूपों में शास्त्रीय अनुशासन से अधिक भावनात्मक प्रवाह और सामाजिक संदर्भों को महत्व दिया गया। परिणामस्वरूप रामकथा बुंदेली भाषा में अधिक सहज, आत्मीय और जीवनोपयोगी बन गई।
बुंदेली भाषा और साहित्य में राम की उपस्थिति केवल भक्तिकालीन प्रभाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक, सतत और बहुस्तरीय साहित्यिक परंपरा का साक्ष्य है। बुंदेलखण्ड में रामकथा ने संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और लोकभाषाओं के माध्यम से निरंतर नए-नए रूप ग्रहण किए। यही कारण है कि रामकाव्य केवल अनुकरण नहीं, बल्कि सृजनात्मक पुनर्रचना का क्षेत्र बन गया।

इस परंपरा का आदि स्रोत महर्षि वाल्मीकि की रामायण है, जिसने राम को धर्म और मर्यादा के आदर्श के रूप में स्थापित किया। संस्कृत नाट्य परंपरा में भवभूति का उत्तररामचरित राम के करुण, मानवीय और अंतर्द्वंद्व से ग्रस्त स्वरूप को प्रस्तुत करता है, जिसका प्रभाव आगे चलकर बुंदेली लोकसंवेदना में दिखाई देता है। यह दर्शाता है कि बुंदेलखण्ड की रामदृष्टि केवल वीर और विजयी राम तक सीमित नहीं, बल्कि करुण और संवेदनशील राम को भी आत्मसात करती है।

लोकभाषा में रामकथा की स्थापना का प्रथम महत्त्वपूर्ण प्रमाण ग्वालियर के कवि विष्णुदास की रामायण कथा (1442 ई.) है, जो बुंदेली-मिश्रित ब्रज भाषा में रचित है। यह ग्रंथ इस तथ्य को पुष्ट करता है कि तुलसीदास से पूर्व ही बुंदेलखण्ड में रामकथा लोकभाषा के माध्यम से जनसामान्य तक पहुंच चुकी थी। विष्णुदास के साथ कवि कन्हरदास की स्फुट रचनाएं भी इसी लोककाव्य परंपरा की कड़ियां हैं, राम लोकनायक के रूप में उभरते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस ने इस परंपरा को अखिल भारतीय लोकमान्यता प्रदान की। यद्यपि भाषा अवधी है, किंतु तुलसी की सांस्कृतिक भूमि बुन्देलखण्ड से गहराई से जुड़ी रही। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप बुंदेली भाषा में पदावली रामायण जैसे ग्रंथों की रचना हुई, जिन्हें ‘बुंदेलखंडी तुलसीदास’ परंपरा के अंतर्गत देखा जाता है। यह रामकथा की लोकात्मक स्वीकृति और भाषिक आत्मसात का श्रेष्ठ उदाहरण है।

रीतिकालीन बुंदेली साहित्य में भी रामकथा का विस्तार दिखाई देता है। कवि केशवदास की रामचंद्रिका राम के सौंदर्य, मर्यादा और आदर्श का काव्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करती है। कवयित्री प्रेमसखी का रामचंद्र नख-शिख वर्णन इस परंपरा में स्त्री काव्य-दृष्टि का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, राम सौंदर्य और भक्तिभाव के केंद्र में हैं। वृषभान कुंवर की श्री रामचंद्र माधुर्य लीलामृत सार राम के माधुर्य और रसात्मक स्वरूप को उद्घाटित करती है।

लोकनाट्य और यज्ञीय परंपरा में कवि मोहनदास मिश्र का रामाश्वमेध तथा चिरगांव (झाँसी) के मुंशी अजमेरी द्वारा रचित श्री रामचरित नाटक और बाल रामायण उल्लेखनीय हैं। ये ग्रंथ रामकथा को रामलीला शैली में प्रस्तुत कर लोकमंच और साहित्य के बीच सेतु का कार्य करते हैं।

आधुनिक काल में बुंदेली साहित्यकारों ने राम को राष्ट्रीय, सामाजिक और नैतिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया। मैथिलीशरण गुप्त की साकेत (चिरगांव, झाँसी से संबद्ध) रामकथा की मानवीय और दार्शनिक पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती है। श्रीनिवास शुक्ल (कुछ बोलो राम), रघुवर प्रसाद खरे (मर्यादा पुरुषोत्तम राम), गोविंददास ‘विनीत’, डॉ. परमलाल गुप्त (महानायक श्री राम), तथा डॉ. रामनारायण शर्मा का बुन्देली उपन्यास जय राष्ट्र- ये सभी रचनाएँ राम को समकालीन सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ती हैं। भैयालाल व्यास का रघुवंशम् इस परंपरा को शास्त्रीय-आधुनिक संवाद की दिशा में ले जाता है।

इस प्रकार बुंदेली भाषा और साहित्य में रामकथा की परंपरा इतनी व्यापक है कि केवल रचनाकारों के नामोल्लेख मात्र से ही अनेक ग्रंथों की संरचना संभव है। यह परंपरा बुंदेलखण्ड को रामकाव्य का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका सृजनशील केंद्र सिद्ध करती है।

Topics: देवत्व और मनुष्यत्वमहाकवि विष्णुदासरामायण कथाकाल-संयोगलोक संस्कृतिभाषा-भक्ति आंदोलनवनवासी रामसोहर और पालनापाञ्चजन्य विशेषवात्सल्य भावलोक साहित्यलोक-मानसराजा रामजन-जीवन
डॉ. पवनपुत्र बादल
डॉ. पवनपुत्र बादल
अखिल भारतीय महामंत्री, अ. भा. सा. प. [Read more]
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