केरल विधानसभा चुनाव 2026: कांग्रेस की IUML पर बढ़ती निर्भरता, विवाद और भविष्य
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केरल विधानसभा चुनाव 2026: कांग्रेस की IUML पर बढ़ती निर्भरता, विवाद और भविष्य

केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस की IUML पर निर्भरता बढ़ रही है। जिन्ना की मुस्लिम लीग से जुड़े इतिहास, विवादास्पद बयान और गांधी परिवार की वायनाड रणनीति पर विस्तृत विश्लेषण। यूडीएफ की सीट मांगें और राजनीतिक प्रभाव।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Feb 24, 2026, 10:09 am IST
inविश्लेषण, केरल
Congress IUML Alliance in Kerala

प्रतीकात्मक तस्वीर

आगामी केरल विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार विपक्ष में रही कांग्रेस अपने गठबंधन ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (यूडीएफ) के बैनर तले चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है। राज्य में कांग्रेस-नीत यूडीएफ गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) है। आईयूएमएल और कांग्रेस 1979 से इस गठबंधन के सहयोगी हैं। इससे पूर्व भी ये दोनों दल केरल में समय-समय पर एक-दूसरे का सहयोग करते रहे हैं। यह देश के सबसे पुराने राजनीतिक गठबंधनों में से एक है।

जिन्ना की मुस्लिम लीग से लिंक

आईयूएमएल का इतिहास विवादों से जुड़ा रहा है और इसका उद्गम मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग से माना जाता है। IUML की कार्यशैली को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। इसके बावजूद गंगा-जमुनी तहज़ीब और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की दुहाई देने वाली कांग्रेस पार्टी आईयूएमएल के साथ गठबंधन बनाए हुए है। 2019 के बाद आईयूएमएल का महत्व न केवल कांग्रेस पार्टी के लिए, बल्कि गांधी परिवार के लिए भी बढ़ गया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ा। वायनाड सीट का चयन आईयूएमएल के प्रभाव और वहां के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया गया माना जाता है। वायनाड लोकसभा क्षेत्र में लगभग एक-तिहाई मुस्लिम मतदाता हैं, जिन पर आईयूएमएल का प्रभाव माना जाता है। 2024 में राहुल गांधी ने वायनाड और रायबरेली दोनों सीटों से जीत दर्ज की। वायनाड सीट छोड़ने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा वहां से चुनाव लड़ना गांधी परिवार की आईयूएमएल पर बढ़ती राजनीतिक निर्भरता के रूप में देखा जा रहा है।

उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष होने वाले केरल विधानसभा चुनाव में आईयूएमएल, यूडीएफ के भीतर अधिक सीटों की मांग कर सकती है। इसके दो कारण बताए जाते हैं-पहला, गांधी परिवार की आईयूएमएल पर राजनीतिक निर्भरता; और दूसरा, केरल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का लगातार गिरता प्रदर्शन। केरल में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सीट संख्या घटती गई है। अब आईयूएमएल सहित यूडीएफ के अन्य घटक दल कांग्रेस पर कम सीटों पर चुनाव लड़ने का दबाव बना रहे हैं।

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IUML विधायक ने भगत और सुभाषचंद्र बोस की तुलना हमास से की थी

यदि आईयूएमएल की राजनीति पर दृष्टि डालें तो कई प्रसंग विवादित रहे हैं। 26 अक्टूबर 2023 को कोझिकोड में आईयूएमएल के केरल प्रदेश अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने अपने भाषण में भारत सरकार पर इज़रायल का समर्थन करने का आरोप लगाया और कहा कि जो भी इज़रायल के साथ खड़ा है, वह आतंकवाद का समर्थन कर रहा है। उनके इस बयान को लेकर व्यापक विवाद हुआ। उसी रैली में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता और विधायक एम. के. मुन्नेर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और शहीद भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना हमास आतंकियों से करने के आरोप लगे थे। हालांकि इन आरोपों को लेकर विभिन्न व्याख्याएं सामने आईं। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी ने आईयूएमएल के विरुद्ध कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

लोकतंत्र की आड़ में कट्टरता का बीज बो रही IUML

जुलाई 2023 में मुस्लिम लीग की युवा शाखा की कासरगोड में आयोजित एक रैली में कथित रूप से भड़काऊ नारे लगाए जाने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। यूडीएफ सरकार के दौरान इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के शिक्षा मंत्री पी. के. अब्दुर रब ने अपने आधिकारिक आवास का नाम ‘गंगा’ से बदलकर ‘ग्रेस’ कर दिया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने सहशिक्षा को लेकर भी बयान दिया था कि लड़के और लड़कियों को अलग-अलग बैठाया जाना चाहिए। 2015 में मुस्लिम लीग ने अपने मंत्रालय से जुड़े कुछ कार्यक्रमों में दीप प्रज्वलन से परहेज़ किया था, यह कहते हुए कि यह इस्लामिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। फरवरी 2013 में पार्टी के एक नेता द्वारा केरल विश्वविद्यालय के सिंडिकेट में मुस्लिम सदस्यों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग किए जाने पर भी विवाद खड़ा हुआ था। आलोचकों ने इसे सांप्रदायिक आधार पर शिक्षा नीति को प्रभावित करने का प्रयास बताया।

कांग्रेस कर रही IUML की कट्टरता का बचाव

इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि वर्तमान आईयूएमएल का संबंध पाकिस्तान निर्माण में भूमिका निभाने वाली जिन्ना की मुस्लिम लीग से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हालांकि इतिहास पर दृष्टि डालें तो 1940 के दशक की शुरुआत में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग को सशक्त बनाने का अभियान चलाया, तब दक्षिण भारत में भी उन्हें उल्लेखनीय समर्थन मिला था। आज़ादी से पहले वर्तमान केरल क्षेत्र मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। 1945-46 के संविधान सभा और प्रांतीय विधानसभा चुनावों में मद्रास प्रेसीडेंसी में मुसलमानों के लिए 28 सीटें आरक्षित थीं। इन सभी सीटों पर मुस्लिम लीग ने जीत दर्ज की थी। संविधान सभा के लिए भी मद्रास प्रेसीडेंसी से मुस्लिम लीग के तीनों उम्मीदवार विजयी हुए थे।

ये चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि मुस्लिम लीग की जड़ें दक्षिण भारत, विशेषकर केरल क्षेत्र में, कितनी मजबूत थीं। संविधान सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी से मुस्लिम लीग के जिन तीन सदस्यों का चुनाव हुआ, उनमें बी. पॉकर साहिब बहादुर और एम. मोहम्मद इस्माइल प्रमुख थे। दोनों का संबंध वर्तमान केरल क्षेत्र से था। विभाजन के बाद ये नेता पाकिस्तान नहीं गए, बल्कि भारत में रहकर राजनीति करते रहे। 10 मार्च 1948 को चेन्नई के राजाजी हॉल में मुस्लिम लीग से जुड़े उन नेताओं की बैठक हुई जो पाकिस्तान नहीं गए थे। इसी बैठक में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के पुनर्गठन का निर्णय लिया गया। एम. मोहम्मद इस्माइल इसके पहले अध्यक्ष चुने गए और उन्हें ‘कायदे मिल्लत’ की उपाधि दी गई। दक्षिण भारत से चुने गए अधिकांश मुस्लिम लीग विधायक भारत में ही रहे।

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मुस्लिम लीग ने ही की थी मोपलिस्तान की मांग

विभाजन से पूर्व ‘मोपलिस्तान’ की मांग का भी उल्लेख मिलता है। 18 जून 1947 को मुस्लिम लीग के मुखपत्र ‘डॉन’ में एम. मोहम्मद इस्माइल द्वारा इस संदर्भ में विचार व्यक्त किए गए थे। उन्होंने मालाबार क्षेत्र की जनसंख्या संरचना का हवाला देते हुए तर्क प्रस्तुत किया था। हालांकि यह मांग व्यावहारिक रूप नहीं ले सकी और स्वतंत्र भारत में इस दिशा में कोई राजनीतिक पहल नहीं हुई। आईयूएमएल के गठन के बाद एम. मोहम्मद इस्माइल एक बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार केरल के मंजेरी लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। पी. बी. पॉकर साहिब भी मंजेरी और मलप्पुरम से लोकसभा पहुंचे। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने समय-समय पर कांग्रेस और वाम दलों के साथ राजनीतिक समझौते किए, हालांकि जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी से दूरी बनाए रखी।

1960 में केरल विधानसभा के अध्यक्ष पद पर के. एम. सेठी का चयन हुआ, जो मुस्लिम लीग से जुड़े थे। जवाहरलाल नेहरू के जीवनकाल में ही मुस्लिम लीग से जुड़े कई नेता स्वतंत्र भारत की राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली पदों पर पहुंचे।

इंदिरा गांधी के कांग्रेस अध्यक्षीय कार्यकाल में 1979 में कांग्रेस के समर्थन से सी. एच. मोहम्मद कोया केरल के मुख्यमंत्री बने। मोहम्मद कोया का कार्यकाल अल्पकालिक रहा, लेकिन यह राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना थी। 30 नवंबर 1979 को ‘इंडिया टुडे’ को दिए साक्षात्कार में मोहम्मद कोया ने कहा था कि अल्पसंख्यकों के संगठन और बहुसंख्यकों के संगठन की प्रकृति अलग होती है। उनके अनुसार अल्पसंख्यक अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए संगठित होते हैं, जबकि बहुसंख्यक समुदाय को ऐसे संगठन की आवश्यकता नहीं होती। उनके इस वक्तव्य पर भी व्यापक बहस हुई थी।

IUML कांग्रेस का संबंध चुनावी गणित से है परे

इस प्रकार केरल की राजनीति में कांग्रेस और आईयूएमएल का संबंध केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और वैचारिक आयाम भी है। एक ओर कांग्रेस स्वयं को धर्मनिरपेक्ष राजनीति का प्रतिनिधि बताती है, वहीं दूसरी ओर आईयूएमएल के साथ उसका स्थायी गठबंधन राजनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जाता है। आगामी विधानसभा चुनाव यह स्पष्ट करेंगे कि यह गठबंधन भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ता है और केरल की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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