दिल्ली दंगे 2020: एक सुनियोजित साजिश और 6 साल बाद भी अधर में लटका न्याय
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दिल्ली दंगे 2020: एक सुनियोजित साजिश और 6 साल बाद भी अधर में लटका न्याय

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों ने शहर को हिलाकर रख दिया था। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, जिसमें दो पुलिसकर्मी- हेड कांस्टेबल रतन लाल और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा- शामिल थे

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Feb 23, 2026, 06:18 pm IST
in भारत, दिल्ली
दिल्ली दंगा 2020

दिल्ली दंगा 2020

23 फरवरी 2026 को दिल्ली दंगों की छठी बरसी होगी। यह दिन न केवल इतिहास की एक कड़वी याद है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की लंबी उलझन और अधूरेपन की सच्चाई भी दर्शाता है। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों ने शहर को हिलाकर रख दिया था। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, जिसमें दो पुलिसकर्मी- हेड कांस्टेबल रतन लाल और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा- शामिल थे। सैकड़ों लोग घायल हुए, और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ-हजारों करोड़ रुपये की अनुमानित क्षति। दिल्ली पुलिस ने इन घटनाओं के संबंध में 758 एफआईआर दर्ज कीं, जिनमें से कई मामलों में जांच और मुकदमे अभी भी चल रहे हैं या अधूरे हैं।

ये दंगे Citizenship Amendment Act (CAA) विरोध के दौरान हुए। दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहे थे, लेकिन 23 से 25 फरवरी 2020 तक हिंसा फैली, जिसमें भीड़ ने घरों, दुकानों, मंदिरों और वाहनों को निशाना बनाया। रिपोर्ट्स में इसे सुनियोजित बताया गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि दंगे वाले दिन समुदाय विशेष के लोगों ने समय से पहले ही अपने बच्चे स्कूल से निकाल लिए। जैसे उन्हें पहले से सूचना थी कि उत्तर पूर्व दिल्ली में कुछ अनहोनी होने वाली है।

यह सब इसलिए किया गया ताकि ट्रंप की भारत यात्रा के समय भारत की छवि खराब हो। दिल्ली पुलिस की चार्जशीटों के अनुसार- ये दंगे सहज नहीं थे, बल्कि पूर्व नियोजित थे। पुलिस को इस बात को साबित करने के लिए अनगिनत साक्ष्य मिले। इसमें सीसीटीवी कैमरे तोड़ना, हथियार जमा करना, पत्थर और तेजाब जैसे सामान इकट्ठा करना, और नफरत भरे भाषण शामिल थे। व्हाट्सएप मैसेज और चैट्स जैसे सबूतों में ‘तेजाब रखें, पत्थर जमा करें’ जैसे निर्देश मिले, जो साजिश की गहराई दिखाते हैं। पुलिस ने उन चैट्स की संवेदनशीलता को समझते हुए, अब तक सार्वजनिक नहीं किया है।

प्रमुख आरोपी और साजिश

दिल्ली पुलिस के अनुसर जेल में बंद कई वामपंथी इको सिस्टम के चर्चित चेहरों को मुख्य साजिशकर्ता बताया है। इनमें उमर खालिद, शरजील इमाम, और ताहिर हुसैन जैसे नाम शामिल हैं, जो आज भी जेल में हैं। पुलिस का आरोप है कि ये लोग सीएए विरोध के नाम पर सड़कों पर ब्लॉकेज (चक्का जाम) करवाकर हिंसा भड़काने में शामिल थे। हिंसा की साजिश में संगठनों जैसे पीएफआई (PFI), जेसीसी, पिंजरा तोड़, और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्यों को भी शामिल पाया गया। यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत कई आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है, जिसमें आतंकवादी गतिविधियां, साजिश, और देश की संप्रभुता के खिलाफ कार्य शामिल हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट और सत्र न्यायालयों ने कई फैसलों में पूर्व नियोजित साजिश की पुष्टि की है। उदाहरण के लिए, उकसावे वाले भाषणों पर यूएपीए के प्रावधान लागू किए गए। हालांकि, कई मामलों में पुलिस की लापरवाही भी सामने आई। उनकी लापरवाही की वजह से चार्जशीट ठीक तरीके से तैयार नहीं हुआ। जिसका लाभ 80% से अधिक आरोपियों ने उठाया। इस लापरवाही की वजह से फैसले में आरोपी बरी हुए। कुछ मामलों में गवाहों के मुकर जाने या सबूतों की कमी मुख्य कारण रहे। न्याय मिलने देरी होने से गवाह भी पीड़ितों की कतार में ही खड़ा होता है। न्याय की इस प्रक्रिया में देरी आरोपी, पीड़ित और गवाह तीनों के लिए ही यातना बन जाती है।

जमानत याचिकाओं का हाल और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जनवरी (2026) में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि ये दोनों ‘बड़ी साजिश’ के मुख्य वास्तुकार हैं और अन्य आरोपियों से ‘qualitatively different footing’ पर हैं। उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया सबूत मजबूत हैं, इसलिए यूएपीए के तहत जमानत नहीं मिल सकती। हालांकि, कोर्ट ने पांच अन्य आरोपियों-गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान, और शादाब अहमद-को जमानत दे दी, क्योंकि उनकी भूमिका कम केंद्रीय थी और लंबी हिरासत को ध्यान में रखा गया। कोर्ट ने ट्रायल को तेज करने के निर्देश दिए, लेकिन ट्रायल अभी भी शुरू नहीं हुआ है या बहुत धीमी गति से चल रहा है।

कई आरोपी पांच-छह साल से बिना ट्रायल के जेल में हैं, जो यूएपीए की कठोरता को दर्शाता है। बात देश की है, और देश के खिलाफ साजिश से जुड़ी है। देश बांटने और दंगा का षडयंत्र रचने वालों के लिए दिल्ली वालों में कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन न्याय में हो रही देरी भी पीड़ित परिवारों के लिए अन्याय बन रही है ।

पीड़ितों को मुआवजा: अधूरा वादा

दंगों के पीड़ितों को न्याय और मुआवजा अभी भी नहीं मिला है। North East Delhi Riots Claims Commission (NEDRCC) ने दावों की जांच की, जहां कुल 153 करोड़ रुपये के दावे आए थे, लेकिन केवल 21 करोड़ रुपये मंजूर हुए, और उनमें से भी अधिकांश सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के लिए थे। व्यक्तिगत पीड़ितों को बहुत कम या कुछ नहीं मिला। 2025 तक की रिपोर्ट्स में कहा गया कि पांच साल बाद भी “virtually no compensation” दिया गया। कई विधवाओं और परिवारों की स्थिति दयनीय है—घर जल गए, रोजगार छिन गया, और चिंता अब स्थायी साथी बन गई है। कुछ परिवारों को तत्काल एक्स-ग्रेशिया मदद मिली, लेकिन पूर्ण मुआवजा नहीं।

छह साल बाद न्याय की चुनौतियां

छह साल बीत चुके हैं, लेकिन ट्रायल की धीमी गति, UAPA के तहत लंबी हिरासत, और कुछ मामलों में पुलिस जांच की कमियां न्याय को अधर में लटकाए हुए हैं। पीड़ितों के परिवार न्याय की मांग करते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए साजिशकर्ताओं को सजा और पीड़ितों को त्वरित न्याय व मुआवजा जरूरी है। अन्यथा, इतिहास दोहराने का खतरा बना रहता है। दिल्ली जैसे शहर में ऐसी घटनाएं समाज की एकता को कमजोर करती हैं, और समय रहते न्याय न मिलना विश्वास की कमी पैदा करता है।

ये भी पढ़ें – दिल्ली दंगे के आरोपियों ने देश की सत्ता पलटने की रची थी साजिश, सुप्रीम कोर्ट में बोली दिल्ली पुलिस

Topics: ताहिर हुसैन चार्जशीटहेड कांस्टेबल रतन लालअंकित शर्मा आईबी अधिकारीशरजील इमामसीएए-एनआरसी विरोधउमर खालिदडोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रापाञ्चजन्य विशेषदिल्ली दंगे 2020दिल्ली दंगों की छठी बरसीउत्तर पूर्वी दिल्ली हिंसादिल्ली दंगे साजिशयूएपीए कानून
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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