जम्मू-कश्मीर संकल्प दिवस– POJK को वापस लेने का अटूट संकल्प
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जम्मू-कश्मीर संकल्प दिवस– POJK को वापस लेने का अटूट संकल्प

22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से पारित संकल्प में POJK (पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर) को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया। जानिए POJK, गिलगित-बाल्टिस्तान और अक्साईचिन के इतिहास, क्षेत्रफल और वर्तमान स्थिति।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Feb 22, 2026, 12:18 pm IST
inविश्लेषण
Jammu Kashmir pojk

प्रतीकात्मक तस्वीर

दिवंगत कविहृदय पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी अमर रचना ‘स्वतंत्रता दिवस की पुकार’ के अंतिम चरण में लिखा था- ‘जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें’। वाजपेयी जी न केवल स्वतंत्रा पूर्व देश की हुई टूटफूट की ओर देश का ध्यान दिलवाया बल्कि उन्हें इस बात का भी दु:ख था कि विलगाव का यह सिलसिला स्वतंत्रता पश्चात भी जारी रही। इसी पीड़ा के शमन के लिए भारतीय संसद ने 22 फरवरी, 1994 को एकमत से संकल्प पारित किया कि जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा शेष भारत से पृथक करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक साधनों से विरोध किया जाएगा।

भारत की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध हर तरह के षड्यंत्रों का प्रतिरोध करने की इच्छा शक्ति और क्षमता भारत में है। भारत की संसद मांग करती है कि पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू कश्मीर के सभी क्षेत्र खाली कर देने चाहिए, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने हथिया लिया गया है और यह संकल्प करती है कि भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के किसी भी प्रयास का डट कर मुकाबला किया जाएगा। आज उसी संकल्प का स्मृति दिवस है।

वैसे 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के पश्चात जम्मू कश्मीर को लेकर इस संकल्प के प्रति राजनीतिक व वैचारिक स्पष्टता दिखाई पड़ती है। वर्तमान सरकार के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदाधिकारी पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू और कश्मीर व लद्दाख को लेकर अपना वक्तव्य दे चुके हैं। लेकिन सबसे आधिकारिक वक्तव्य गृहमंत्री अमित शाह ने 6 अगस्त, 2019 को संसद में दिया था। शाह के शब्दों में जब मैं जम्मू और कश्मीर के विषय में बात करता हूँ तो इसमें पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू और कश्मीर व अक्साईचिन शामिल है। इस क्षेत्र के लिए हम जीवन देने के लिए तैयार हैं।’

POK से POJK तक

सामान्य भाषा में जिसे कुछ समय पहले तक पाक अधिकृत कश्मीर अथवा POK के नाम से पुकारते थे, अब केन्द्र सरकार ने इसे पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (POJK) के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया है। नये राज्य गठन के अनुसार, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर का संबोधन भी असंगत हो गया क्योंकि नई अधिसूचना में गिलगित और बाल्टिस्तान का क्षेत्र लद्दाख का हिस्सा है इसलिये आधिकारिक रूप से इसका संबंध जम्मू कश्मीर से समाप्त हो गया है। अत: इस भू-भाग को अब पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर कहना ठीक नहीं है।

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आजादी के बाद हमने क्या-क्या खोया

जम्मू कश्मीर व लद्दाख के अधिक्रांत क्षेत्र- भारत में अधिमिलन के समय जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमीटर था और जम्मू-कश्मीर रियासत के चार प्रमुख क्षेत्र थे- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख व गिलगित। वर्तमान समय में जम्मू-कश्मीर व लद्दाख क्षेत्र की लगभग 54.4 प्रतिशत भूमि (1 लाख 21 हजार वर्ग किमी) चीन और पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण में है।

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी सेना ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। 26 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में अधिमिलन के बाद भारतीय सेना राज्य में पहुंची और श्रीनगर घाटी का अधिकांश हिस्सा इन आक्रमणकारियों से खाली कराने में सफल रही। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ऐतिहासिक गलती करते हुए यह मामले संयुक्त राष्ट्र में ले गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार, लागू युद्ध विराम के बाद भारतीय सेना का आगे बढ़ना रुक गया और जम्मू कश्मीर रियासत के अंतर्गत आने वाले जम्मू का मीरपुर और पुंछ तथा कश्मीर का मुजफ्फराबाद क्षेत्र पाकिस्तान के अवैध कब्जे में रह गया और आज तक बना हुआ है। पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रफल 13,297 किमी है।

जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के पश्चिम में स्थित इस भू-भाग की उत्तरी सीमाऐं गिलगित बाल्टिस्तान से तथा दक्षिण व पश्चिम में पश्चिमी पाकिस्तान तथा $खैबर-पख्तूनखवा से लगती हैं। इस भाग में जम्मू और कश्मीर क्षेत्र का मीरपुर, मुजफ्फराबाद शामिल है। पाकिस्तान का अवैध कब्जा इस भाग पर है। ऐतिहासिक रूप से मीरपुर जम्मू संभाग और मुजफ्फराबाद कश्मीर संभाग का हिस्सा है। मीरपुर, मुजफ्फराबाद क्षेत्र में बहुमूल्य धातुएं व पत्थर पाये जाते हैं। यहाँ का संगमरमर विश्व-प्रसिद्ध है।

पाकिस्तान अधिक्रांत लद्दाख क्षेत्र

गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का उत्तर-पश्चिम सीमान्त इलाका है। इसके उत्तर में अफगानिस्तान का वाखन गलियारा, पश्चिम में पाकिस्तान का खैबर- पखतूनखवा, तथा पूर्व में चीन का शिनजियांग प्रांत हैं। हिंदुकुश, काराकोरम व पामीर के मध्य स्थित यह क्षेत्र पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान की सीमा को स्पर्श करता है। पाकिस्तान के कब्जे से पहले यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था स्कर्दू की वजीरे-वजारत और गिलगित एजेंसी के पास थी। पाकिस्तानी आक्रमण के समय यहां महाराजा की सेनाएं लम्बे समय तक संघर्ष करती रहीं किन्तु सहायता न पहुंच पाने के कारण अंतत: उन्हें हथियार डालने पड़े। गिलगित में मेजर ब्राउन की संदिग्ध भूमिका के चलते पाकिस्तान को वहाँ नियंत्रण पाने का अवसर मिला किन्तु स्कर्दू में रियासती सेना 14 अगस्त 1948 तक संघर्षरत थी। चीन द्वारा निर्मित 1300 किमी लम्बा काराकोरम राजमार्ग यहाँ से गुजरता है। हुंजा के निकट स्थित खुंजरब दर्रे को पार कर यह राजमार्ग ताशकुरगान नामक स्थान पर गिलगित-बाल्टिस्तान में प्रवेश करता है। नगर, गिलगित, चिलास, होता हुआ तथा सिंधु, गिलगित और हुंजा नदियों को पार करते हुए नंगा पर्वत के निकट से गुजर कर यह पाकिस्तान में प्रवेश करता है। राकापोशी, माशरब्रूम, नंगा पर्वत तथा गॉडविन ऑस्टिन जैसे ऊंचे पर्वत शिखर यहाँ स्थित हैं।

यह मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया में प्रभुत्व रखा जा सकता है। 1970 में पाकिस्तान ने गिलगित एजेंसी, लद्दाख वजारत का बाल्टिस्तान, हुन्जा तथा नगर नामक क्षेत्रों का विलय कर उत्तरी क्षेत्र (शुमाली इलाके जात) नामक यह प्रशासनिक इकाई बनाई। पाकिस्तान का दावा है कि यह क्षेत्र विवादित कश्मीर से अलग है जबकि यूरोपीय संघ भी इसे भारत के जम्मू कश्मीर के वृहत क्षेत्र का ही हिस्सा मानता है। पाक अधिकृत लद्दाख का कुल क्षेत्रफल लगभग 67,791 वर्ग किमी है। इसके साथ में जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के मीरपुर मुजफ्फराबाद व श्रीनगर संभाग से जुड़ा हुआ है। विश्व के तीन बड़े ग्लेशियरों सहित सात हजार से ज्यादा ग्लेशियर व 3044 से ज्यादा झीलें-इसी क्षेत्र में है, जो समस्त विश्व में स्वच्छ जल के सबसे बड़े स्रोत हैं। पाकिस्तान के पेयजल की आपूर्ति यहाँ से ही होती है।

चीन अधिक्रांत लद्दाख

जम्मू-कश्मीर राज्य का विस्तार तिब्बत की सीमा तक था। यद्यपि उस समय लद्दाख को भी कुछ लोग लिटिल तिब्बत कहते थे और जम्मू-कश्मीर के महाराजा भी अपनी पदवी में तिब्बत आदि देशाधिपति शब्द जोड़ते थे, किन्तु मोटे तौर पर इसमें अक्साईचिन और कैलाश-मानसरोवर का क्षेत्र था जो ऐतिहासिक रूप से हजारों वर्षों से राजनैतिक ही नहीं, सांस्कृतिक रूप से भारत का हिस्सा था। चीन के साथ भारत के संबंध 1962 तक कथित रूप से सौहार्द्रपूर्ण थे इसलिये उस सीमा पर सेना तैनात करने का विचार भी भारतीय नेतृत्व को नहीं आया। किन्तु चीन कुटिलता से एक ओर ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगाता रहा, दूसरी ओर उसकी सेना मैकमहोन रेखा पार कर भारत में प्रवेश कर चुकी थी। 1958 में उसने तिब्बत के गरतोक से शिनजियांग तक सडक़ का निर्माण कर लिया जो अक्साईचिन से गुजरती थी। भारत दोनों देशों की मित्रता से अभिभूत था और उसे सडक़ के निर्माण का पता वर्षो बाद 1962 में चला जब कुछ जवान ट्रैकिंग के लिये इस क्षेत्र में गये।

इसे भी पढ़ें: 22 फरवरी-कश्मीर संकल्प दिवस : जहां हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है… और सारा का सारा है

20 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना काराकोरम पास और पैंगोंग झील के निकट स्थित चौकियों से भारतीय क्षेत्र में तेजी से घुसी। भारत इसके लिये न मानसिक रूप से तैयार था और न सामरिक रूप से। उन्होंने अक्साईचिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और दैमचोक तथा पैंगोंग में अपने मोर्चे बना कर बैठ गये। उसने इसे पश्चिमी तिब्बत का भाग घोषित करते हुए शिजांग प्रांत कहना प्रारंभ कर दिया। तिब्बत ऑटोनॉमस रीजन की राजधानी ल्हासा यहां से पर्याप्त दूरी पर है और सडक़ मार्ग समतल और अच्छा होने बावजूद यहाँ से ल्हासा तक पहुंचने में 11 दिन से अधिक का समय लगता है। चीन जिसे पूर्व में वास्तविक नियंत्रण रेखा स्वीकार कर चुका है, उसे भी बदलने की निरंतर कोशिश करता रहता है। हाल ही में गलवन नदी की घाटी में हुए हिंसक संघर्ष, जिसमें 20 भारतीय जवानों का बलिदान हुआ, उसके इसी प्रयास का परिणाम है। ऐसी घटनाएं वह पहले भी करता रहा है जिसके फलस्वरूप अनेक स्थानों पर उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ कर अपनी चौकियां और सड़क बना ली हैं।

चीन के अवैध नियंत्रण में है 42,735 वर्ग भूमि

चीन के अवैध नियंत्रण में 42,735 वर्ग किमी की भूमि है जिसमें अक्साईचिन, मिनसर, शक्सगाम तथा रक्सम का क्षेत्र सम्मिलित हैं। दरअसल 1952 के समय से चीन की मंशा इस भू-भाग को लेकर खराब होने लगी थी। और उसने गुपचुप तरीके से ल्ह्यासा-सिनजियांग मार्ग को जोड़ने के लिए इस भू भाग पर सड़क बनाना शुरू किया, जिससे तत्कालीन नेहरू सरकार बेखबर रही थी। अंतत: चीन की अतिक्रमणकारी कोशिशों का नतीजा 1962 में भारत-चीन युद्ध के रूप में देखने को मिला। भारतीय सेना के साहसिक जवाब के बावजूद नेहरू सरकार की गलत रणनीतियों के चलते लद्दाख क्षेत्र की लगभग 37 हजार वर्ग किमी भूमि पर अवैध नियंत्रण कर लिया।

शक्सगाम घाटी

1963 में पाकिस्तान ने अधिक्रांत गिलगित-बाल्टिस्तान का 5180 वर्ग किमी भू-भाग साइनो-पाक एग्रीमेंट के तहत चीन के दे दिया था। चीन के अवैध नियंत्रण में आज कुल क्षेत्रफल 42,735 वर्ग किलोमीटर है। भूराजनीतिक दृष्टि से ये क्षेत्र जिसमें ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट और मिंसर भी शामिल है, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, यहाँ से कई जीवनदायी बड़ी नदियों निकलती हैं। जैसे गलवान नदी, चिपचैप नदी और काराकाश नदी निकलती हैं। लेकिन इनमें काराकाश नदी सबसे बड़ी नदी है जोकि उत्तर की ओर जाती है। जम्मू-कश्मीर के भारत में अधिमिलन के बाद 1947-48 में पाकिस्तानी आक्रमण के दौरान यह इलाका उसके कब्जे में चला गया और युद्ध विराम के बाद उसके नियंत्रण में ही रह गया। 1962 में चीन ने आक्रमण कर अक्साईचिन का 37,555 वर्ग किमी क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिया। 1963 में पाकिस्तान ने चीन के इसी तर्क को आधार बनाकर शक्सगाम घाटी और उसके आस-पास के क्षेत्र एक समझौते के अन्तर्गत चीन को सौंप दिये। हालाँकि पाकिस्तान के सैन्य शासक रहे अयूब खाँ ने बाद में उल्लेख किया कि यह मजबूरी का समझौता था और चीन समझौते से पहले ही शक्सगाम घाटी पर अधिकार कर चुका था।

महाभारत में भीष्म पितामह कहा था कि ‘देश की सीमाएं माता के वस्त्र के समान होती हैं, हमें अपनी सीमाओं की उतनी की तत्परायणता से रक्षा करनी चाहिए जितनी कि माता के सम्मान की रक्षा करने में तत्परता दिखाते हैें। आज जम्मू-कश्मीर संकल्प दिवस देश के युवाओं के पुरुषार्थ को ललकारता हुआ कहता है कि बढ़ाओ हाथ और ले लो अपनी वह पुण्यभूमि जो दुश्मनों ने कब्जा रखी है।

Topics: Pakistan Occupied Jammu KashmirGilgit-BaltistanJammu Kashmir Unityपाकिस्‍तान अधिक्रांत जम्मू कश्‍मीरजम्मू कश्मीर संकल्प दिवसPOJK संकल्प दिवस22 फरवरी 1994 संसद संकल्पअक्साईचिनजम्मू कश्मीर एकताJammu Kashmir Resolution DayPOJKPOJK Resolution Dayगिलगित बाल्टिस्तान22 February 1994 Parliament ResolutionAksai Chin
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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