पादरियों की एंट्री पर रोक वाले बोर्ड हटाने से इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की खारिज
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पादरियों की एंट्री पर रोक वाले बोर्ड हटाने से इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की खारिज

छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में लगाए गए उन होर्डिंग्स को लेकर विवाद था, जिनमें पादरियों और कथित रूप से धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक की बात कही गई थी।

Written byMahak SinghMahak Singh
Feb 18, 2026, 11:20 am IST
inछत्तीसगढ़
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में लगाए गए उन होर्डिंग्स को लेकर विवाद था, जिनमें पादरियों और कथित रूप से धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक की बात कही गई थी। सोमवार को शीर्ष अदालत ने इस संबंध में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी व्यापक बहस को जन्म देता है।

इससे पहले, अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन होर्डिंग्स को हटाने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ऐसे बोर्ड संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं और इससे अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा था कि यदि ऐसे कदमों का उद्देश्य लालच, धोखाधड़ी या जबरदस्ती के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकना है, तो इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

धर्मांतरण विरोधी होर्डिंग्स पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने दलील दी कि देश के कई हिस्सों में पादरियों और ईसाई समुदाय के लोगों पर हमलों की घटनाएं सामने आई हैं और इस तरह के होर्डिंग्स ऐसे हमलों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म प्रचार और धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के मूल अधिकारों में शामिल हैं, जिन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट में दायर याचिका का दायरा सीमित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई नई अर्जी में कई नए तथ्य और दस्तावेज जोड़े गए हैं, जो मूल विवाद से भटकाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं को परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए पेसा कानून के तहत निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है और इन होर्डिंग्स का उद्देश्य केवल अवैध और जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाना है, न कि किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना।

हाई कोर्ट ने ग्राम सभाओं के फैसले को बताया वैध

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला स्थित कई ग्राम पंचायतों ने अपने-अपने गांवों में ऐसे बोर्ड लगाए थे, जिनमें बाहरी प्रचारकों के प्रवेश पर प्रतिबंध की बात कही गई थी। इन पंचायतों का कहना था कि उनके क्षेत्र में आदिवासी समुदाय की परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से चली आ रही हैं, जिन्हें बाहरी हस्तक्षेप से खतरा हो सकता है। ग्राम सभाओं ने दावा किया कि कुछ मामलों में लालच, आर्थिक सहायता या अन्य प्रलोभनों के माध्यम से लोगों का धर्मांतरण कराया गया, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन जब इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच के माध्यम से किया जाता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। अदालत ने कहा कि सामूहिक या प्रेरित धर्मांतरण की घटनाएं न केवल सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करती हैं, बल्कि स्वदेशी और आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को भी चुनौती देती हैं। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने ग्राम सभाओं के निर्णय को वैध ठहराया।

Topics: Chhattisgarh villagesपादरियों की एंट्री बैनसुप्रीम कोर्टChhattishgarh newshoardings prohibiting entry of pastors
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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