स्थापना दिवस पाञ्चजन्य के 79 साल : एक ही लक्ष्य-हिन्दू एकता
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पाञ्चजन्य के 79 साल : एक ही लक्ष्य-हिन्दू एकता

‘सामाजिक समरसता’ के सत्र में आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर ने अपने विचार रखें। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश -

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2026, 03:40 pm IST
inदिल्ली, पाञ्चजन्य इवेंट
आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर

आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर

हिन्दू समाज को जोड़ने के लिए 1164 दिन से मैं यात्रा कर रहा हूं। इस यात्रा में मैंने किसी से कोई दाल, आटा, चीनी चावल या पैसा नहीं मांगा। मैंने समाज से मांगा कि आप जातियों में न बंटकर हिन्दू एकता की भिक्षा दे दीजिए। अंतत: इस यात्रा का परिणाम है कि करीब एक करोड़ 15 लाख लोग अब तक इस यात्रा संकल्प के साथ किसी न किसी प्रकार जुड़े हैं और जो भिक्षा के रूप में मैंने उनसे मांगा उन्होंने हिन्दू एकता के संकल्प के रूप में मुझे दिया है। यह यात्रा अब तक छह राज्यों में हो चुकी है।

मैं इस मंच के माध्यम से कहना चाहता हूं कि जातियों में बंटा समाज बहुत कमजोर होता है। कोई भी स्वार्थी जाति का फायदा दिखाकर पूरे तानेबाने को तोड़ने में सफल हो जाएगा लेकिन अगर हम सब हिन्दू रूप में एक रहेंगे तो कोई कितना भी ताकतवर हो वह भी हमें तोड़ नहीं पाएगा। यह यात्रा हिन्दू समाज को मजबूत करने की है। यह यात्रा सभी सनातनी पुष्पगुच्छों को एकसूत्र में पिरोने की है। हिन्दुत्व की परिभाषा को चरितार्थ करने की है।

यह यात्रा गांव-गांव के लोगों को छूने की है। और उनसे कहती है कि अब जातियों में बंटने का नहीं, बल्कि संगठित होने का समय है। वर्तमान में एकता ही ताकत है। और इसी भाव को चरितार्थ करना मेरे जैसे संन्यासी का कर्तव्य है। आज बहुत सी ताकतें हम हिन्दुओं को आपस में बांटने, जातियों की आड़ लेकर तोड़ने के प्रयास में लगी हुई हैं। लेकिन हमें न बंटना है और न ही टूटना है। क्योंकि आज भारत किसी भी तरह के विभाजन को झेलने की स्थिति में नहीं है। पूर्वकाल में हुआ देश का विभाजन आज भी पीड़ा देता है। स्वार्थी तत्वों ने अपने स्वार्थ साधकर हमारे देश को टुकड़ों में बांट दिया। लेकिन अब हम न तो समाज के रूप में और न ही क्षेत्र के रूप में बंटने वाले हैं। अब जरूरत है एक होकर अपने बल को बढ़ाने की।

मुझे याद आता है जब मेरी पहली यात्रा उत्तर प्रदेश के देबवंद से शुरू हुई तो महज सिर्फ साठ लोग थे, लेकिन जब यही यात्रा चार मीनार हैदराबाद में पहुंची तो 35,000 लोग इसमें शामिल हुए। और फिर यह यात्रा देश के अनेक कोनों में जा रही है और यात्रा में शामिल होने वाले हिन्दू लगातार हमारे साथ चले आ रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आप अकेले कभी नहीं हैं।

जब आप नि:स्वार्थ भाव से समाजकार्य में जुटते हैं तो यही समाज आपके साथ हो लेता है। आप ध्यान दीजिए कि किसी मुस्लिम के घर में जन्मा बच्चा मुस्लिम होता है, ईसाई घर में जन्मा बच्चा ईसाई होता है, लेकिन हिन्दू के घर के जन्मा बच्चा यादव, ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया, जाट, गुर्जर होता है। लेकिन क्या बाहर के लोग हमें इसी पहचान से जानते हैं! नहीं। वह सिर्फ और सिर्फ हमें हिन्दू मानते हैं। इसलिए हमें सब कुछ भूलकर हिन्दू और सनातनी पहचान बनाए रखनी है।

जब अमेरिका की खुफिया विभाग की प्रमुख तुलसी गबार्ड दुनिया के सामने खड़ी होकर कहती हैं- मुझे गर्व है हिन्दू होने पर तो वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहते हुए ऋ षि सुनक अक्षरधाम दर्शन करने के बाद अपने को हिन्दू मानते हैं और स्वामी विवेकानंद जी पूरी दुनिया के सामने ओजपूर्ण वाणी में कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। स्पष्ट है कि दुनिया के सामने हमारी पहचान सिर्फ और सिर्फ हिन्दू ही है।

इसलिए हम सभी को यह प्रयास करना है कि किसी भी स्तर पर समाज को बंटने नहीं देना है, क्योंकि यही हमारी थाती है और यही हमारी पहचान। हम सभी को यह जान लेना चाहिए कि हमारा और कोई देश नहीं है। जो भी है भारत है। और भारत के रहने वालों की एक ही पहचान है और वह सिर्फ हिन्दू की है। हमारे सामने चुनौतियां आएंगी। पर सनातनियों को संगठित होकर रहना है। चुनौतियां आएंगी, पर डिगना नहीं है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषMAIN. FEAUREDभिक्षासनातनी पुष्पगुच्छसंगठितनि:स्वार्थ भावथातीविभाजनहिन्दू एकता
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