नवग्रहों की साक्षी बनेंगी काशी की परम्पराएं : महाशिवरात्रि पर 11 काष्ठों पर विराजेंगे बाबा
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नवग्रहों की साक्षी बनेंगी काशी की परम्पराएं : महाशिवरात्रि पर 11 काष्ठों पर विराजेंगे बाबा

महाशिवरात्रि पर काशी में अनूठी परंपरा, नवग्रहों से जुड़ी 11 पवित्र लकड़ियों के काष्ठपट्ट पर विराजेंगे बाबा विश्वनाथ।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Feb 10, 2026, 07:37 pm IST
in उत्तर प्रदेश

वाराणसी (हि.स.) । देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परम्पराओं, आस्था और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर काशीपुराधिश्वर भगवान विश्वनाथ नवग्रहों के प्रतीक नौ प्रकार की पवित्र लकड़ियों सहित कुल 11 लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठपट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।

महाशिवरात्रि से पूर्व शुक्रवार को होने वाले हल्दी और सगुन के लोकाचार में भी इसी विशेष काष्ठपट्ट का उपयोग किया जाएगा। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के टेढ़ीनीम स्थित आवास पर इन आयोजनों की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। काशी की परम्परानुसार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाओं को विधि-विधानपूर्वक काष्ठपट्ट पर विराजमान कर मांगलिक अनुष्ठान सम्पन्न कराए जाएंगे।

मंगलवार को यह जानकारी महंत वाचस्पती तिवारी ने दी। उन्होंने बताया कि काशी की परम्परा में बाबा विश्वनाथ के प्रत्येक लोकाचार में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा सम्बंध छिपा है। इसी भाव के साथ इस वर्ष विशेष काष्ठपट्ट का निर्माण नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है।

नवग्रहों के अनुरूप सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश (ढाक), मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है। इसके साथ ही अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के पावन काष्ठों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है।

देशभर के शिवभक्तों की श्रद्धा से सजी काष्ठपट्ट

वाचस्पती तिवारी ने बताया इस विशेष काष्ठपट्ट के निर्माण में केवल काशी ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों की आस्था भी जुड़ी है। उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से इन पवित्र लकड़ियों को एकत्र किया गया। शिवभक्तों ने श्रद्धा भाव से इन लकड़ियों को महंत आवास तक पहुंचाया, जिसके बाद पारम्परिक विधि से काष्ठपट्ट का निर्माण कराया गया। महंत आवास पर काष्ठपट्ट को धार्मिक मर्यादाओं और लोकाचार के अनुरूप अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसमें किसी प्रकार की आधुनिक सजावट के बजाय शास्त्रीय परम्पराओं और काशी की लोक संस्कृति का विशेष ध्यान रखा गया है।

हल्दी-सगुन से महाशिवरात्रि तक चलेगा उत्सव

काशी में महाशिवरात्रि का उत्सव कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठानों की श्रृंखला है। शुक्रवार को हल्दी और सगुन के साथ मांगलिक आयोजनों का शुभारम्भ होगा। इसके बाद महाशिवरात्रि के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का विशेष श्रृंगार, पूजन और लोकाचार सम्पन्न किया जाएगा।

मान्यता है कि इन अनुष्ठानों के माध्यम से काशीपुराधिश्वर अपने भक्तों के जीवन से कष्ट हरते हैं और सुख, समृद्धि तथा मंगलकामनाओं का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। नवग्रहों से जुड़ी लकड़ियों से बने काष्ठपट्ट पर बाबा का विराजमान होना इस विश्वास को और अधिक दृढ़ करता है।

काशी की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप

शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया काशी की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि उन लोक परम्पराओं से है, जो पीढ़ियों से जीवित चली आ रही हैं। महाशिवरात्रि पर 11 पावन काष्ठों से बने विशेष काष्ठपट्ट पर बाबा विश्वनाथ का विराजमान होना उसी परम्परा का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति, देवता और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।

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