इस वर्ष राष्ट्रपति ने 131 पद्म पुरस्कारों की स्वीकृति दी है, जिनमें 2 युगल पुरस्कार (युगल पुरस्कार को एक ही माना जाता है) शामिल हैं। पांच विभूतियों को पद्म विभूषण, 13 को पद्म भूषण और 113 को पद्म श्री सम्मान देने का निर्णय लिया गया है। सम्मान प्राप्त करने वालों में 19 महिलाएं भी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें पांच ऐसी विभूतियां हैं जो अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। ये हैं-तेची गुविन, नरेशचंद्र देव बर्मा, बुधरी ताती, डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले। अपने इन कार्यकर्ताओं के सम्मान पर वनवासी कल्याण आश्रम के संगठन मंत्री अतुल जोग कहते हैं, “एक ही वर्ष में कल्याण आश्रम के पांच कार्यकर्ताओं को पद्श्री से सम्मानित करना पूरे संगठन के लिए गर्व की बात है। पूरा वनवासी समाज खुश है।”

राष्ट्रीय सम्मान मिलने की घोषणा के बाद बुधरी ताती बहुत भावुक हैं। कहती हैं, “वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में करीब 45 वर्ष से एक साधारण कार्यकर्ता के नाते समाज के बीच कार्य कर रही हूं, लेकिन कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन पद्मश्री जैसा सम्मान मुझे मिलेगा। यह केवल मेरा सम्मान नहीं है, बल्कि उन सभी कार्यकर्ताओं का है, जो एक लक्ष्य लेकर दिन-रात नि:स्वार्थ सेवा कार्य कर रहे हैं।”
2008 से बुधरी ताती हीरानार, दंतेवाड़ा में ‘मां संखिनी महिला उत्थाेन केंद्र’ चला रही हैं। इस केंद्र के माध्यम से लड़कियों के लिए एक छात्रावास चलता है और गांव-गांव में जागृति शिविर लगाए जाते हैं। इनके माध्यम से महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, नशा-मुक्ति, स्वरोजगार आदि के लिए प्रेरित किया जाता है। वे कहती हैं, “महिलाओं के उत्थान के बिना न तो भारत आगे बढ़ सकता है और न ही कोई परिवार सशक्त हो सकता है।”
2000 से कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता के नाते समाज सेवा करने वाले तेची गुविन को इस सम्मान की सूचना उस समय मिली जब वे सुंदरवन, पश्चिम बंगाल में प्रवास कर रहे थे। 25 जनवरी को नई दिल्ली से गए एक फोन के माध्यम से पता चला कि उन्हें पद्मश्री सम्मान मिलने जा रहा है। वे कहते हैं, “मुझ जैसे एक साधारण कार्यकर्ता को इतना बड़ा सम्मान मिले, यह तो किसी चमत्कार से कम नहीं है।’’
तेची गुविन वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष और अरुणाचल प्रांत के अध्यक्ष हैं। इसके साथ ही वे ‘निशि हेरिटेज फेथ एंड कल्चरल सोसायटी’ के मार्गदर्शक हैं। वे अरुणाचल प्रदेश सरकार में ‘आर्किटेक्ट’ रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद वे जनजाति समाज के धर्म और संस्कृति के संरक्षण में अहम योगदान दे रहे हैं।
जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा कार्य करने वाले त्रिपुरा के प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं साहित्यकार नरेशचंद्र देव बर्मा को भी पद्मश्री सम्मान दिया जाएगा। अगरतला के रहने वाले नरेशचंद्र देव बर्मा त्रिपुरा विधानसभा के ग्रंथालय से सेवानिवृत्त हुए हैं। वे अनेक वर्ष से त्रिपुरा कल्याण आश्रम के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष के नाते संगठन के कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते रहे हैं। वे वनवासी समाज के उत्थान के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी धर्मपत्नी सुनीता गोडबोले को संयुक्त रूप से पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। इन दोनों ने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया है। डॉ. गोडबोले कहते हैं, “मैं अपनी पत्नी के साथ कई दशक से भारत माता के बच्चों की सेवा कर रहा हूं। इसलिए मुझे लगता है कि यह सम्मान भारत माता ने दिया है।” वे यह भी कहते हैं, “जब सेवा के लिए गांव-गांव भटकते थे, तो लगता था कि हमारे काम को कौन देख रहा है, लेकिन अब विश्वास हो गया कि अच्छे काम का फल अच्छा ही मिलता है।” डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है।
युवावस्था में ही उनके मन में समाज सेवा का बीज अंकुरित हो गया और उन्होंने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े और नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्ष बाद उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनकी स्थायी कर्मभूमि बन गया।
कल्याण आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी भेंट पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर कार्य कर रही थीं। दोनों के विचार और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।
यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन समाज साधकों को पद्मश्री सम्मान देने से इस सम्मान का ही मान बढ़ा है।
परंपरा में परिवर्तन

बीते दस-बारह वर्षों में पद्म सम्मानों की परंपरा में जो परिवर्तन देखने को मिला है, वह भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक चेतना के विकास का महत्वपूर्ण संकेत है। लंबे समय तक पद्म पुरस्कारों को एक विशिष्ट वर्ग से जुड़ा हुआ माना जाता रहा, जहां प्रसिद्ध व्यक्तित्व, सत्ता के निकट लोग या बड़े मंचों पर दिखाई देने वाले नाम ही सम्मानित होते थे। इस कारण समाज के भीतर यह धारणा बन गई थी कि ये सम्मान आम नागरिकों की पहुंच से बाहर हैं। वर्तमान सरकार ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया और पद्म सम्मानों को वास्तव में जन सम्मान का स्वरूप देने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
सरकार ने पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सहभागी बनाया। आम नागरिकों से नामांकन आमंत्रित किए गए, जिससे समाज के उन लोगों की पहचान संभव हो सकी जो बिना किसी प्रचार या प्रसिद्धि के राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पद्म सम्मान पाने वालों की सूची में किसान, श्रमिक, शिक्षक, लोक कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े लोग, पर्यावरण संरक्षण में लगे ग्रामीण और वनवासी समाज के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में शामिल होने लगे।
यह बदलाव वीआईपी कल्चर को समाप्त करने की दिशा में एक मजबूत संदेश देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र का सम्मान केवल पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि कर्म और समर्पण से अर्जित होता है। जिन नागरिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद समाज की समस्याओं का समाधान खोजा, स्थानीय स्तर पर परिवर्तन लाया और दूसरों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाला, उन्हें राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया गया। इससे समाज में यह विश्वास मजबूत हुआ कि पारदर्शी और निष्ठापूर्वक किए गए प्रयास और सेवा भावना को देश पहचान और मान देता है।
इस नीति का एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव यह भी है कि यह युवाओं और सामान्य नागरिकों को प्रेरित करती है। जब कोई साधारण व्यक्ति, जो अपने गांव या समुदाय में निस्वार्थ भाव से काम कर रहा है, पद्म सम्मान पाता है, तो यह संदेश जाता है कि बड़े बदलाव के लिए बड़े पद की आवश्यकता नहीं होती। यह प्रेरणा समाज में सेवा, नवाचार और दायित्व की भावना को बढ़ावा देती है।
तथ्यात्मक दृष्टि से देखें तो बीते वर्षों में पद्म पुरस्कार पाने वालों में ग्रामीण, जनजातीय और अर्ध शहरी पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कई ऐसे नाम सामने आए हैं जो दशकों तक अपने क्षेत्र में काम करते रहे, लेकिन कभी सुर्खियों में नहीं आए। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने सम्मान की दृष्टि को व्यापक और समावेशी बनाने का प्रयास किया है।

















