क्या सोना-चांदी के बाद अब रेयर अर्थ मेटल्स और लिथियम बनेंगे भविष्य की नयी दौलत ?
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क्या सोना-चांदी के बाद अब रेयर अर्थ मेटल्स और लिथियम बनेंगे भविष्य की नयी दौलत ?

भरोसे और भय के बीच झूलता बाजार, क्या यह कहानी सोना-चांदी तक ही सीमित रहेगी ?

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Feb 9, 2026, 09:38 pm IST
inबिजनेस
Gold Silver Price Today

Gold Silver Price

जब दुनिया की नींद उचटती है, तो सबसे पहले तिजोरियों की ओर नज़र जाती है। जब युद्ध की आहट सुनाई देती है, शेयर बाज़ार कांपता है, मुद्राएं डगमगाती हैं, तब भी एक चमक बनी रहती है। यही चमक कभी इतिहास की मुद्रा रही, कभी राजाओं की शक्ति का प्रतीक बनी, और आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज़ बन चुकी है, सोना और चांदी।

पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों कीमती धातुओं ने ऐसा व्यवहार किया है, मानो वे सिर्फ धातु न हों, बल्कि मानव सभ्यता के भय, भरोसे, लालच और विवेक की जीवित अभिव्यक्ति हों। कभी इनके दाम आसमान छूते हैं, रिकॉर्ड टूटते हैं, निवेशकों की आंखों में चमक लौट आती है। और फिर अचानक… एक दिन, एक सत्र, कुछ घंटों में वही चमक धूल बन जाती है।

सोना केवल गहना नहीं, चांदी केवल सिक्का नहीं, ये दोनों वैश्विक राजनीति, तकनीक, ऊर्जा, निवेश और मनुष्य की सामूहिक चेतना से जुड़े हुए तत्व हैं। इनके भावों में सिर्फ ग्राफ़ नहीं, सभ्यता की धड़कन छिपी होती है और जहाँ चमक सिर्फ आँखों को नहीं, बल्कि समय, सत्ता और सत्य तीनों को प्रतिबिंबित करती है।

सोने के मूल्य लगातार क्यों बढ़ रहे हैं?

सोने की कीमतों में हालिया वर्षों में आई तेज़ बढ़त कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति, मौद्रिक नीति, तकनीकी बदलाव और निवेश मनोविज्ञान इन सबके संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।

केंद्रीय बैंकों की अभूतपूर्व खरीद

2022 में केंद्रीय बैंकों ने 1,136 टन सोना खरीदा जो 1967 के बाद सबसे अधिक था, 2023–25 के दौरान भी यह खरीद ऐतिहासिक औसत से काफ़ी ऊपर बनी रही। भारत, चीन, रूस, तुर्की, सिंगापुर जैसे देशों ने आक्रामक रूप से सोना जोड़ा है। भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास 2020 लगभग 653 टन था जो 2025 में लगभग 35 % वृद्धि के साथ 879 टन हो गया है।

डी-डॉलराइजेशन: डॉलर से दूरी, सोने की ओर वापसी

कई देश अपने फॉरेक्स रिज़र्व में डॉलर और US Treasury घटा रहे हैं, सोने का अनुपात बढ़ा रहे हैं , ब्रिक्स देशों में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से स्पष्ट है।

डी-डॉलराइजेशन क्या है?

डी-डॉलराइजेशन का मतलब है देशों का अमेरिकी डॉलर पर पूरा भरोसा न रखकर अपने पैसे और भंडार को सोना और दूसरी मुद्राओं में बांटना। जैसे कोई समझदार व्यक्ति अपनी पूरी बचत एक ही जगह न रखे।

यह क्यों हो रहा है?

राजनीतिक डर: कुछ देशों के डॉलर में रखे पैसे पर प्रतिबंध लग चुके हैं। इससे सबक मिला कि ज़रूरत के समय पैसा फंस भी सकता है।

महंगाई और कर्ज़: अमेरिका समेत कई देशों पर बहुत कर्ज़ है। ज़्यादा पैसा छपने से भविष्य में डॉलर की कीमत घट सकती है।

स्वतंत्रता की चाह: देश नहीं चाहते कि उनकी आर्थिक सुरक्षा किसी एक देश की नीतियों पर टिकी रहे।

यह बदलाव डॉलर को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि जोखिम कम करने के लिए है।

केंद्रीय बैंक सोना क्यों खरीद रहे हैं?

सोना किसी का कर्ज़ नहीं है ,कोई सरकार इसे रोक नहीं सकती। हर जगह स्वीकार्य है यह संकट में भी बिक जाता है। महंगाई से सुरक्षा है लंबे समय में कीमत टिकती है। यह भरोसे का भंडार जो मुश्किल समय का सहारा बन सकता है।

सोना ब्याज नहीं देता, इसलिए यह पूरी तरह डॉलर या बॉन्ड की जगह नहीं ले सकता। डॉलर आज भी दुनिया की सबसे मज़बूत और तरल मुद्रा है। इसलिए देश डॉलर छोड़ नहीं रहे, बल्कि सोने और डॉलर का संतुलन बना रहे हैं। डी-डॉलराइजेशन कोई विद्रोह नहीं, बल्कि सावधानी की नीति है।

भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता

रूस-यूक्रेन युद्ध ,मध्य-पूर्व संकट , अमेरिका-चीन तनाव और व्यापार युद्ध और टैरिफ़ अनिश्चितता ने भू राजनीतिक तनाव पैदा कर दिया है। सोना आज भी सुरक्षित निवेश , संकट से बचाव और राजनीतिक जोखिम बीमा के रूप में व्यवहार करता है।

ब्याज दरें, डॉलर की चाल

सोना ब्याज नहीं देता , जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं तो सोना दबाव में रहता है। कम ब्याज दर के समय बॉन्ड/एफडी कम आकर्षक हो जाते है इसीलिए निवेशक सोने की ओर लौटते हैं।

मुद्रास्फीति और कर्ज़ का वैश्विक संकट

वैश्विक सरकारी कर्ज़ जीडीपी के अनुपात में ऐतिहासिक ऊँचाई पर है , अमेरिका, यूरोप, जापान—सब उच्च ऋण में है। ज्यादा कर्ज़, भविष्य में मुद्रा अवमूल्यन या उच्च मुद्रास्फीति ला सकता है , जबकि सोना इन सबसे मुक्त है।

तकनीक और उद्योग में सोने की वास्तविक मांग

सोने की मांग का विभाजन (औसतन) 50% ज्वैलरी, 40% निवेश एवं केंद्रीय बैंक और 10% तकनीक/उद्योग में होता है। तकनीकी उपयोग के तहत सेमीकंडक्टर , चिप्स ,डेटा सेंटर और स्मार्टफोन, मेडिकल डिवाइस में प्रयोग होता है।

आपूर्ति की सीमाएं – सोना बढ़ाया नहीं जा सकता

अब तक कुल खनन लगभग 2.1 लाख टन तथा सालाना उत्पादन लगभग 2,500–3,000 टन और नए बड़े भंडार दुर्लभ है साथ ही खनन लागत और पर्यावरण नियम बढ़ रहे हैं। मांग बढ़ रही है जबकि आपूर्ति लगभग स्थिर है।

फिर अचानक गिरावट क्यों आती है?

सोने की कीमतों में दिखाई देने वाली अचानक और तीव्र गिरावटों को अक्सर बाज़ार की कमजोरी के रूप में देखा जाता है, लेकिन ऐतिहासिक अनुभव बताता है कि ऐसी गिरावटें प्रायः लंबी और मज़बूत तेज़ी से पहले होने वाला स्वाभाविक सुधार होता हैं। जब सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंच जाते हैं, तब बड़े निवेशक और संस्थागत खिलाड़ी मुनाफावसूली करते हैं, जिससे कीमतों में अल्पकालिक दबाव बनता है।

महत्वपूर्ण यह है कि इस दौर में सोने की मूल मांग समाप्त नहीं होती। केंद्रीय बैंक अपनी खरीद जारी रखते हैं और दीर्घकालिक निवेशक इस गिरावट को खरीद के अवसर के रूप में देखते हैं। इतिहास गवाह है कि 2008, 2012, 2020 और 2023 जैसे दौरों में 20–30 प्रतिशत तक के सुधार के बाद सोना नई ऊंचाइयों पर पहुँचा। इसलिए मौजूदा गिरावट को संरचनात्मक कमजोरी नहीं, बल्कि लंबी अवधि की मजबूती का स्वाभाविक विराम समझना चाहिए।

चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर क्यों पहुंचीं?

चांदी की कीमतों में तेज़ उछाल और फिर अचानक गिरावट का पैटर्न काफी हद तक सोने जैसा ही है। आज चांदी को लगभग 60% वैश्विक मांग औद्योगिक उपयोग से आती है , विशेषकर सोलर पैनल (PV सेल कनेक्शन) , इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर , इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा सेंटर और AI तकनीक , ऊर्जा संक्रमण और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने चांदी को एक रणनीतिक औद्योगिक धातु बना दिया है।

चांदी की तेजी की मांग बढ़ने का कारण उसकी सीमित आपूर्ति है। चांदी का अधिकांश उत्पादन अन्य धातुओं (तांबा, सीसा, जिंक) की खानों से उप-उत्पाद के रूप में होता है। इसलिए कीमत बढ़ने पर भी उत्पादन तुरंत नहीं बढ़ाया जा सकता। लैटिन अमेरिका विशेषकर मेक्सिको, पेरू, बोलीविया और चिली में खदानें पुरानी हो रही हैं, अयस्क की गुणवत्ता घट रही है और राजनीतिक/नियामकीय बाधाएँ बढ़ रही हैं।

फिर चांदी इतनी तेज़ क्यों गिरी?

तेज़ी के बाद स्वाभाविक सुधार आया है। रिकॉर्ड ऊँचाई के बाद चांदी में आई भारी गिरावट (₹44,000 से लेकर एक दिन में ₹1,16,000 तक) संरचनात्मक कमजोरी नहीं, बल्कि तेज़ी के बाद का स्वाभाविक और तीव्र सुधार था। जब चांदी बहुत कम समय में असामान्य रूप से ऊपर चली गई, तो बड़े निवेशकों ने मुनाफा सुरक्षित करने के लिए बिकवाली शुरू कर दी।

क्या कहानी सोना- चांदी तक ही सीमित रहेगी ?

आज जिस तरह सोना और चांदी चमक रहे हैं, ठीक वैसी ही हलचल आने वाले वर्षों में रेयर अर्थ एलिमेंट्स, तांबा, लिथियम, निकेल और कोबाल्ट में दिख सकती है। फर्क बस इतना होगा कि ये धातुएं तिजोरी में बंद नहीं होंगी , ये मशीनों के दिल में धड़केंगी। जब इलेक्ट्रिक कार चलेगी, तो उसे लिथियम और तांबा चाहिए। जब पवन चक्की घूमेगी और सोलर पैनल चमकेगा, तो उसमें रेयर अर्थ धातुएं होंगी। जब डेटा सेंटर और AI सिस्टम गर्म होंगे, तो उन्हें ठंडा और चालू रखने के लिए फिर तांबा और खास धातुएं चाहिए होंगी। अब कहानी का मोड़ देखिए इन धातुओं की खदानें कम हैं, कुछ ही देशों में सिमटी हैं, और निकालना आसान नहीं। जैसे ही कमी दिखेगी, दाम उछलेंगे कभी तेज़ी से और कभी बेकाबू होकर। लेकिन याद रखिए सोना-चांदी डर में खरीदे जाते हैं, जबकि ये नई धातुएँ भविष्य बनाने के लिए। इसलिए आने वाले समय में बाजार में नई दौड़ होगी जहाँ चमक नहीं, ज़रूरत कीमत तय करेगी। और शायद इतिहास कहेगा इक्कीसवीं सदी की असली दौलत तिजोरी में नहीं, तकनीक की रगों में बहती थी।

Topics: भविष्य का निवेशपाञ्चजन्य विशेषडी-डॉलराइजेशनस्वर्ण भंडारसोना-चांदीरेयर अर्थ मेटल्ससोना चांदी का भावलिथियम
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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