वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर देश के कई हिस्सों में लगातार विरोध देखने को मिल रहा है। यह प्रसारित होने से पहले ही लगातार विवादों में घिरती नजर आ रही है और आगे आने वाले दिनों में इसका विरोध और तेज होने की संभावना दिख रही है। कुछ हिंदू संगठनों और समुदायों ने इसके शीर्षक को आपत्तिजनक और ब्राह्मणों के लिए अपमानजनक बताते हुए अपनी आपत्ति दर्ज की है।
शीर्षक को लेकर विवाद का केंद्र
इस वेब सीरीज के निर्माता नीरज पांडे हैं और मुख्य भूमिका में मनोज वाजपेयी नजर आ रहे हैं। पूरे विवाद का केंद्र इसका शीर्षक और उसका अर्थ है। ‘पंडित’ जैसे अत्यंत गरिमा सूचक और सम्मानित शब्द के साथ ‘घूसखोर’ जैसा नकारात्मक और अपमानजनक विशेषण जोड़ना पूरे समुदाय को अपमानित करने जैसा है।
समुदाय की छवि धूमिल करने का आरोप
ऐसे में लोगों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचना स्वाभाविक है। एक ही शब्द के माध्यम से पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा करने और उसकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे पहले भी कई ऐसी फिल्में आ चुकी हैं जो रचनात्मक स्वतंत्रता की आड़ में समाज को तोड़ने का काम करती रही हैं।
जाति आधारित फिल्मों पर उठते सवाल
समाज में वैमनस्य फैलाने वाली इस तरह की फिल्मों पर रोक लगनी चाहिए। जाति जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे को लेकर समाज को तोड़ने की कोशिश हाल के वर्षों में आर्टिकल 15, धड़क 2 और फूले जैसी फिल्मों के माध्यम से की गई है। सन 1975 में ‘पोंगा पंडित’ शीर्षक से भी एक फिल्म आ चुकी है।
अनुराग कश्यप की ‘फूले’ और जातिवाद का आरोप
अनुराग कश्यप की फिल्म ‘फूले’ के दृश्य भी जातिवाद को बढ़ाते हैं और स्वर्ण समाज का नकारात्मक प्रस्तुतीकरण करते हैं। फिल्म में तीस हजार साल की गुलामी का जिक्र किया गया है और स्वर्ण समाज को जातिवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इसमें मनुस्मृति, पेशवाई और जाति व्यवस्था जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।
धड़क 2 और ब्राह्मण समाज पर आरोप
धड़क 2 फिल्म भी सतही तौर पर जातिवाद पर सवाल उठाती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह संपूर्ण ब्राह्मण समाज के विरुद्ध एक सुनियोजित षड्यंत्र करती दिखाई देती है। इस तरह की फिल्में सामाजिक समरसता के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं।
खलनायक दिखाने की प्रवृत्ति
इन फिल्मों और वेब सीरीज में ब्राह्मण समाज को हिंसक, अहंकारी, असहिष्णु और जातिवादी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अनेक वेब सीरीज में भी ब्राह्मण को खलनायक बनाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व
जब भी ऐसे शीर्षकों, दृश्यों या पटकथाओं का विरोध होता है, तो एक बड़ा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर बच निकलता है। सवाल यह है कि क्या अभिव्यक्ति और कला की स्वतंत्रता किसी निर्माता या निर्देशक को उसके सामाजिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर देती है?
सिनेमा का समाज पर प्रभाव
यह कैसे भुलाया जा सकता है कि ऐसे विषय राष्ट्र और समाज में दरार डालने का काम करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में किसी एक समुदाय की भावनाओं को आहत करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है। सिनेमा का प्रभाव समाज के बड़े वर्ग पर पड़ता है, इसे नकारा नहीं जा सकता।
‘पंडित’ शब्द का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
भारत में ‘पंडित’ शब्द अत्यंत आदर और सम्मान का प्रतीक है। इसका प्रयोग सदियों से उस व्यक्ति के लिए होता आया है जो विद्वान, ज्ञानी और शास्त्रों में निपुण हो। यह जन्म से जुड़ी पहचान नहीं बल्कि ज्ञान और विद्वत्ता से जुड़ा सम्मान है।
मायावती की प्रतिक्रिया
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी इस शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समाज के अपमान पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में चित्रपट के माध्यम से पंडित शब्द को भ्रष्टाचार से जोड़कर ब्राह्मण समाज का अपमान किया जा रहा है, जिससे समाज में तीव्र आक्रोश है।
केंद्र सरकार से प्रतिबंध की मांग
मायावती ने कहा कि ऐसे जाति सूचक चित्रपटों पर केंद्र सरकार को त्वरित प्रतिबंध लगाना चाहिए। यह प्रवृत्ति समाज में नफरत और टकराव को जन्म देती है।
तेज नारायण पांडे के गंभीर आरोप
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्य मंत्री तेज नारायण पांडे ने भी इस वेब सीरीज को लेकर निर्माताओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने इसे समाज को बांटने वाला प्रयास बताते हुए शीर्षक बदलने या पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
सोशल मीडिया पर बहस तेज
वेब सीरीज के शीर्षक को लेकर सोशल मीडिया पर भी लगातार बहस जारी है। कई यूजर्स इसे जातिगत और धार्मिक भावनाओं पर हमला बता रहे हैं। आम राय यही है कि पंडित जैसे आदर्श सूचक शब्द को भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से जोड़ना पूरे समुदाय को बदनाम करने जैसा है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म और सामाजिक जिम्मेदारी
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित फिल्में और वेब सीरीज वर्तमान समय में जनसंचार का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुकी हैं। निर्माताओं और निर्देशकों को ऐसे शीर्षक और विषय चुनने चाहिए जिससे किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हों और समाज में वैमनस्य न फैले।
निष्कर्ष
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित ऐसी दृश्य सामग्री देश की सामाजिक समरसता के लिए बड़ा खतरा है। कला का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को निशाना बनाकर विभाजन को बढ़ावा देना।
















