एक खचाखच भरा हुआ हॉल, सामने मंच पर खड़ा स्टैंडअप कॉमेडियन भौंडी और अश्लील टिप्पणियों की बौछार कर रहा है। हाथों में बीयर लिए बैठे लोग हर गाली, हर दोअर्थी संवाद और हर अभद्र टिप्पणी पर ठहाके लगाते हुए तालियां बजा रहे हैं। बेतुकी बातें और फूहड़पन ही मानो हास्य का नया पैमाना बन गए हैं। महानगरों में ऐसे नजारे अब आम हो चले हैं। इनके वीडियो सोशल मीडिया पर लाखों-करोड़ों बार देखे जाते हैं। सामाजिक मर्यादाएं ऐसे शो में अक्सर ताक पर रख दी जाती हैं, विवाद भी होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोगों को हंसाने के लिए भाषा की गरिमा, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक शालीनता की बलि देना अब मनोरंजन की अनिवार्य शर्त बन चुकी है?
एक समय था जब हास्य व्यंग्य के माध्यम से सत्ता से सवाल किए जाते थे, पाखंड पर चोट की जाती थी और जीवन की विसंगतियों को मुस्कराहट के साथ सामने रखता था। आज तस्वीर बदल चुकी है। हास्य का बड़ा हिस्सा अब विचार नहीं बेचता, विवाद बेचता है। मंच पर जितनी गाली, उतनी ताली, जितनी अश्लीलता, उतनी लोकप्रियता, जितना विवाद, उतने व्यूज (यानी वीडियो को देखे जाने की संख्या)।
मानसिक प्रदूषण
दिल्ली-एनसीआर से लेकर मुंबई तक स्टैंड-अप कॉमेडी के मंच तेजी से बढ़ रहे हैं। यह अपने आप में बुरी बात नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में हास्य और व्यंग्य का विस्तार स्वस्थ संस्कृति का संकेत माना जाता है। समस्या तब शुरू होती है जब हास्य की जगह अश्लीलता ले लेती है, व्यंग्य की जगह व्यक्तिगत अपमान और बुद्धिमत्ता की जगह सस्ती उत्तेजना। मां-बहन की गालियां, स्त्री-पुरुष संबंधों पर अभद्र टिप्पणियां, माता-पिता का उपहास, धार्मिक प्रतीकों पर फूहड़ कटाक्ष और यौन संकेतों से भरे संवाद इन सबको आज ‘बोल्ड कॉमेडी’ का नाम देकर बेचा जा रहा है। यह मनोरंजन कम और मानसिक प्रदूषण अधिक प्रतीत होता है।
विडंबना यह है कि मजाक के इस कारोबार का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश का युवा वर्ग बन गया है। हजारों रुपये के टिकट खरीदकर लोग ऐसे कार्यक्रम देखने पहुंचते हैं जहां कलाकार की प्रतिभा उसके विचारों से नहीं, बल्कि उसकी गालियों की संख्या से आंकी जाती है। मंच पर शराब, अभद्र भाषा और अपमानजनक चुटकुलों के बीच ठहाके गूंजते हैं और इसे आधुनिकता तथा निर्भीक अभिव्यक्ति का प्रतीक बताया जाता है। यह केवल मनोरंजन का बदलता स्वरूप नहीं, बल्कि समाज की बदलती मानसिकता का भी संकेत है।
ओछी सोच
पिछले कुछ वर्षों की घटनाएं इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करती हैं। पिछले दिनों चर्चित डिजिटल कार्यक्रम ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ में यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया द्वारा माता-पिता से जुड़ा अत्यंत अशोभनीय प्रश्न पूछे जाने के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। अनेक राज्यों में उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई। कार्यक्रम के संचालन के समय रैना भी उसी विवाद के कारण कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक आलोचना के दायरे में आए। इसी प्रकरण में सहभागी रहे आशीष चंचलानी, अपूर्व मखीजा और जसप्रीत सिंह के नाम भी विवादों में आए।
अपूर्व मखीजा का महिलाओं को वस्तु की तरह प्रस्तुत करने वाला बयान व्यापक आलोचना का कारण बना। जिसमें उन्होंने कहा कि 2 रुपए के रोल के लिए मैं किसी के साथ नहीं सो सकती अगर दुबई का कोई शेख 10-15 करोड़ फेंक कर मारेगा तो मैं सोच सकती हूं। मधु विरली द्वारा बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों पर की गई कथित टिप्पणी ने यह प्रश्न और गंभीर बना दिया कि क्या हास्य के नाम पर किसी भी संवेदनशील विषय को मनोरंजन की वस्तु बनाया जा सकता है?
ऐसा नहीं है कि यह प्रवृत्ति केवल एक कार्यक्रम तक सीमित है। हालिया एक कार्यक्रम में कॉमेडियन प्रणित मोरे के एक शो में हिमांशु जांगड़ा नाम के एक दर्शक द्वारा यह कहना कि उसने एक युवती को 370 रुपए बिरयानी खिलाई थी, इसलिए उसे पैसों की वसूली तो करनी थी, जाहिर है उसका इशारा गलत था, बावजूद इसके उसे रोकने की बजाए, हंसते ही शो को आगे बढ़ाया गया। जब
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ तो इसका भयंकर विरोध हुआ। बाद में जांगड़ा को उनकी कंपनी ने नौकरी से भी निकाल दिया।
यह मजाक तो कतई नहीं था। यदि ओछी बातों को मनोरंजन का आधार बनाया जाए तो यह समाज को हंसाना नहीं, उसकी संवेदनशीलता को कुंद करना है।
सस्ती लोकप्रियता पाने का तरीका
पिछले कुछ वर्षों में कई स्टैंड-अप कॉमेडियन अपने मंचीय कथनों को लेकर विवादों में रहे हैं। जनवरी 2021 में मुनव्वर फारूकी को मध्य प्रदेश के इंदौर में एक कार्यक्रम के दौरान हिंदू देवी-देवताओं पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
इसी क्रम में फरवरी 2025 में स्टैंडअप कॉमेडियन यश राठी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई में आयोजित कार्यक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में प्रयुक्त अश्लील भाषा, यौन संकेतों और छात्राओं सहित महिलाओं पर की गई कथित अभद्र टिप्पणियों को लेकर व्यापक विवाद खड़ा हो गया। इस मामले में उनके विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज की गई और सोशल मीडिया पर उनके कार्यक्रम की भाषा एवं प्रस्तुति शैली को लेकर तीखी बहस हुई।
सोशल मीडिया और ओटीटी मंचों ने इस प्रवृत्ति को और तेज किया है। एल्गोरिदम वही सामग्री आगे बढ़ाते हैं जो अधिक विवाद पैदा करे। कलाकार जानते हैं कि जितना बड़ा विवाद होगा, उतने अधिक ‘व्यूज’ मिलेंगे, जितने अधिक ‘व्यूज’ होंगे, उतनी बड़ी कमाई होगी। परिणामस्वरूप गालियां, यौन संकेत और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन धीरे-धीरे व्यावसायिक मॉडल बनते जा रहे हैं। प्रतिभा और भाषा की जगह अब सनसनी और अश्लीलता ने ले ली है।
नई पीढ़ी रहे सावधान
इस पूरी बहस का सबसे चिंताजनक पक्ष नई पीढ़ी है। बच्चे और किशोर अपने पसंदीदा कलाकारों की भाषा, व्यवहार और प्रस्तुति शैली का अनुकरण करते हैं। मनोविज्ञान बताता है कि बार-बार दोहराई गई भाषा धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती है। यही कारण है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा का प्रयोग बढ़ता दिखाई देता है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह संस्कारों की वाहक भी होती है। जिस समाज की भाषा असंवेदनशील हो जाती है, उसका व्यवहार भी धीरे-धीरे वैसा ही होने लगता है।
भारत की सांस्कृतिक पहचान परिवार-केंद्रित समाज की रही है। यहां मनोरंजन का अर्थ केवल समय बिताना नहीं, बल्कि ऐसा साझा अनुभव रहा है जिसे परिवार की तीन पीढ़ियां साथ बैठकर देख सकें। आज स्थिति यह है कि अनेक लोकप्रिय कार्यक्रम परिवार के साथ देखने योग्य नहीं रह गए हैं। यदि किसी कार्यक्रम को देखने से पहले माता-पिता बच्चों को कमरे से बाहर भेजने लगें, तो यह केवल उस कार्यक्रम की समस्या नहीं, बल्कि मनोरंजन की दिशा का संकट है।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी की टिप्पणी
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है। कलाकार को सत्ता, समाज और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का पूरा अधिकार है। किंतु संविधान ने भी इस अधिकार को निरंकुश नहीं माना। किसी की गरिमा, सामाजिक मर्यादा और सार्वजनिक शालीनता की कीमत पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उत्सव नहीं मनाया जा सकता। अधिकार और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल किसी भी सीमा को तोड़ देना हो जाए, तो अंततः उसका दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी हास्य के नाम पर परोसे जा रहे अश्लील और भोंडे कंटेंट पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार को नियामक उपायों पर विचार करने का सुझाव दिया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यवस्था बने तो वह संविधान के अनुरूप युक्तिसंगत प्रतिबंधों के दायरे में हो। यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह केवल एक कार्यक्रम पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलती डिजिटल संस्कृति पर न्यायपालिका की चिंता को भी व्यक्त करती है। साथ ही यह भी सच है कि भारतीय न्याय संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 जैसे कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। आवश्यकता नए कानूनों से अधिक उनके प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन की है।
हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरा स्टैंड-अप कॉमेडी जगत अश्लीलता पर टिका है। आज भी अनेक कलाकार बिना गाली दिए, बिना किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाए उत्कृष्ट हास्य प्रस्तुत कर रहे हैं। समस्या पूरे समुदाय से नहीं, बल्कि उस छोटे लेकिन प्रभावशाली वर्ग से है जिसने अभद्रता को ही अपनी पहचान बना लिया है। दुर्भाग्य यह है कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी अक्सर उसी सामग्री को सबसे अधिक प्रचारित करता है जो सबसे अधिक विवाद पैदा करती है। सोशल मीडिया साइट और ओटीटी मंचों पर भी अंकुश लगाए जाने की मांग उठती है, टीआरपी की जरूरत एवं कंटेंट पर विवाद हो सकते हैं, किन्तु मर्यादाओं का ख्याल भी रखना होगा।
कुछ चर्चित मामले
प्रणित मोरे शो : 31 मई, 2026
जून 2026 में कॉमेडियन प्रणित मोरे के एक लाइव शो का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें दर्शक हिमांशु जांगड़ा ने कहा कि उसने एक युवती को 370 रुपए की बिरयानी खिलाई थी, इसलिए उसे ‘पैसों की वसूली’ करनी थी। ऐसी ओछी टिप्पणी का विरोध करने की बजाए हंसी-मजाक जारी रहा। वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ। बाद में प्रणित मोरे ने सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त किया।
सेजल पवार : 13 जून, 2026
मुंबई के केईएम अस्पताल और सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस छात्रा सेजल पवार स्टैंड-अप कॉमेडी शो में मेडिकल शिक्षा के लिए उपयोग किए जाने वाले शव (कैडेवर) पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के कारण विवादों में आ गईं। वीडियो वायरल होने के बाद चिकित्सा जगत और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। अस्पताल प्रशासन ने प्रारंभिक जांच के बाद उन्हें 15 दिनों की अनिवार्य छुट्टी पर भेज दिया और कॉलेज, अस्पताल व छात्रावास परिसर में प्रवेश पर रोक लगा दी। हालांकि बाद में सेजल पवार ने लिखित और सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए अपने बयान पर खेद व्यक्त किया।
रणवीर इलाहाबादिया : इंडियाज गॉट लेटेंट विवाद (फरवरी 2025)
फरवरी 2025 में यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया कॉमेडियन समय रैना के शो इंडियाज गॉट लेटेंट में पूछे गए एक अश्लील प्रश्न को लेकर विवादों में आ गए। उन्होंने एक प्रतिभागी से उसके माता-पिता के निजी संबंधों पर अत्यंत आपत्तिजनक सवाल पूछा, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। देशभर में इसकी तीखी आलोचना हुई और महाराष्ट्र, असम सहित कई राज्यों में एफआईआर दर्ज हुई। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां न्यायालय ने हास्य के नाम पर बढ़ती अश्लीलता पर चिंता जताई। बाद में रणवीर इलाहाबादिया ने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी।
यश राठी (फरवरी 2025)
फरवरी 2025 में स्टैंड-अप कॉमेडियन यश राठी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई में आयोजित एक कार्यक्रम में बेहद अश्लील भाषा का प्रयोग किया। कार्यक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें उन्होंने महिलाओं, छात्राओं और यौन संबंधों पर अश्लील भाषा तथा दोअर्थी टिप्पणियां की थीं। छात्रों और सामाजिक संगठनों ने इसे शैक्षणिक परिसर की गरिमा के विरुद्ध बताया। विरोध बढ़ने पर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।
मुनव्वर फारूकी (फरवरी 2025)
फरवरी 2025 में स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी का ओटीटी शो हफ्ता वसूली विवादों में आ गया। शो में प्रयुक्त अश्लील भाषा, यौन संकेतों और कुछ धार्मिक संदर्भों को लेकर विभिन्न संगठनों ने आपत्ति जताई। आरोप लगाया गया कि लोकप्रियता और मनोरंजन के नाम पर अभद्रता को सामान्य बनाया जा रहा है। इस संबंध में शिकायतें दर्ज कराई गईं और शो पर रोक लगाने की मांग भी उठी। विवाद के बाद एक बार फिर यह बहस शुरू हुई कि क्या डिजिटल मंचों पर स्टैंड-अप कॉमेडी के लिए भी स्पष्ट आचार-संहिता और प्रभावी नियमन आवश्यक है।
एआईबी नॉकआउट रोस्ट विवाद
दिसंबर 2014 में मुंबई में आयोजित एआईबी नॉकआउट कार्यक्रम और जनवरी 2015 में उसके यूट्यूब पर आने के बाद देशभर में विवाद छिड़ गया। इस रोस्ट शो में कई स्टैंड-अप कॉमेडियनों ने लगातार गालियों, अश्लील संवादों और यौन टिप्पणियों का प्रयोग किया। वीडियो वायरल होने पर इसे भारतीय मनोरंजन के स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करने वाला बताया गया। महाराष्ट्र में एफआईआर दर्ज हुई और अश्लीलता, अभद्रता तथा धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे। यह मामला भारत में डिजिटल स्टैंड-अप कॉमेडी के सबसे चर्चित विवादों में से एक माना जाता है।
हास्य की स्वस्थ भारतीय परंपरा
भारतीय हास्य परंपरा इस संदर्भ में एक अलग ही उदाहरण प्रस्तुत करती है। हमारे लोकनाट्यों में विदूषक राजा तक पर कटाक्ष करता था, लेकिन उसकी भाषा संयमित रहती थी। उत्तर प्रदेश की नौटंकी, हरियाणा का सांग, गुजरात की भवाई, महाराष्ट्र का तमाशा, पश्चिम बंगाल का जात्रा और कर्नाटक का यक्षगान सभी में हास्य सामाजिक सुधार का माध्यम था, सामाजिक पतन का नहीं। आधुनिक काल में हरिशंकर परसाई ने व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया, शरद जोशी ने समाज की विसंगतियों को उजागर किया, काका हाथरसी, शैल चतुर्वेदी, ओमप्रकाश आदित्य और सुरेंद्र शर्मा ने करोड़ों लोगों को हंसाया, लेकिन कभी अश्लीलता का सहारा नहीं लिया। उन्होंने सिद्ध किया कि सबसे तीखा व्यंग्य भी शालीन भाषा में किया जा सकता है।
आज प्रश्न केवल कलाकारों से नहीं, दर्शकों से भी है। जिस सामग्री को समाज लोकप्रिय बनाता है, वही आगे चलकर उद्योग का मानक बन जाती है। यदि दर्शक गालियों पर ताली बजाएंगे तो मंच पर गालियां बढ़ेंगी। यदि वे विचार, बुद्धिमत्ता और स्वच्छ हास्य को स्वीकार करेंगे तो कलाकार भी उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे। बाजार अंततः वही बेचता है जिसकी मांग होती है।
मर्यादा होना जरूरी
समाधान सेंसरशिप नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्ममंथन है। कलाकारों को यह समझना होगा कि लोकप्रियता और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। मनोरंजन उद्योग को परिवारोपयोगी और विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों को बढ़ावा देना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भाषा, मीडिया साक्षरता और डिजिटल जिम्मेदारी पर गंभीर संवाद आवश्यक है। माता-पिता को भी यह समझना होगा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सामग्री की निगरानी केवल नियंत्रण का विषय नहीं, बल्कि संस्कार का प्रश्न है।
हंसी मनुष्य की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियों में से एक है। वह तनाव दूर करती है, रिश्तों को मजबूत बनाती है और समाज को जीवंत रखती है। लेकिन जब वही हंसी किसी की गरिमा, स्त्री सम्मान, पारिवारिक मूल्यों या सामाजिक संवेदनाओं की कीमत पर खरीदी जाने लगे, तब वह मनोरंजन नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक अवमूल्यन का माध्यम बन जाती है। इसलिए समय आ गया है कि हम हास्य और अश्लीलता के बीच स्पष्ट रेखा खींचें। समाज को ऐसे हास्य की आवश्यकता है जो सोचने पर मजबूर करे, मुस्कुराहट दे, लेकिन मनुष्य की गरिमा को कभी ठेस न पहुंचाए। क्योंकि सभ्यता की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितनी जोर से हंस सकती है, बल्कि इस बात से होती है कि हंसते समय भी वह अपनी मर्यादा कितनी बचाकर रखती है।
आज आवश्यकता केवल कलाकारों के आत्मसंयम की नहीं, बल्कि दर्शकों के आत्ममंथन की भी है। आखिर वही सामग्री सबसे अधिक बनती है, जिसे सबसे अधिक देखा और सराहा जाता है। यदि समाज फूहड़ता पर ताली बजाएगा तो मंच पर फूहड़ता ही बढ़ेगी, लेकिन यदि वह विचार, संवेदना और स्वच्छ हास्य को स्वीकार करेगा तो मनोरंजन की दिशा भी बदलेगी।
हास्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति, परिवार, धर्म या समाज की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को सहज बनाना होना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में हास्य कभी भी अश्लीलता का पर्याय नहीं रहा। हमारे यहां विदूषक से लेकर आधुनिक व्यंग्यकारों तक ने बिना मर्यादा तोड़े समाज को हंसाया भी और सोचने पर भी मजबूर किया। आज डिजिटल युग में कलाकारों, ओटीटी मंचों, सोशल मीडिया कंपनियों, अभिभावकों और स्वयं दर्शकों सभी की जिम्मेदारी है कि मनोरंजन और अश्लीलता के बीच की रेखा को धुंधला न होने दें। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है। यदि हास्य समाज को बेहतर इंसान बनाने के बजाय उसकी संवेदनाओं को कुंद करने लगे, तो यह केवल मनोरंजन का संकट नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के लिए भी गंभीर चेतावनी है।















