‘लता’ नाम को उल्टा पढ़ें तो शब्द बनता है ‘ताल’। किसी भी कोण, रूप के किसी भी प्रारूप अथवा परिस्थिति की किसी भी स्थिति या वातावरण के किसी भी आवरण में जब एक वाणी वीणा सदृश झंकृत होती अनवरत गुंजायमान रहती है तब वह स्वतः ही काल के भाल पर कालजयी बन कर दृश्यमान हो उठती है। संगीत में लय-सुर-ताल का पर्याय रहीं लता मंगेशकर आज अपने गाए ढेरों गीतों के ध्वनि संस्करण में अपने महाप्रयाण के पश्चात् भी इस सृष्टि के पोर-पोर में जीवन्त हैं। लता अपने समकालीन गायक-गायिकाओं में सर्वाधिक सम्मान मुकेश का करती थीं। वह गायक मुकेश की भावपूर्ण, निश्छल एवं सरल गायकी से बेहद प्रभावित थीं। वह कहती थीं कि हर समय मुकेश भैया के अधरों पर प्रभु श्री राम का नाम रहता था। ‘रामायण’ का उनका सहज गायन तो अत्यन्त उच्च कोटि की श्रेणी में आता है। मुझे प्रभु राम के प्रति उनकी इस आस्था और भक्ति भाव से बहुत प्रेरणा मिलती है।
लता मंगेशकर के गाए गीतों में समर्पण की निधि इतनी प्रबल है कि उसमें भक्ति और आस्था की संजीवनी ने उसे जैसे अमरत्व के बूंद-बूंद से आच्छादित कर दिया हो। भिन्न-भिन्न विषयों में प्रयुक्त पृथक-पृथक भावों एवं तरह-तरह के दृश्य-परिदृश्य तथा रंग-रूप के सांचे में ढले अनेक कथ्य-तथ्य को जिस सहजता से परोसा गया वह उनके स्वयं के श्रम के साथ ही उस अदृश्य शक्ति के संयोग का भी भान कराता है जो परम शक्तिमान ईश्वर की सत्ता के आशीष से ही पुष्पित होता है। लता मंगेशकर के व्यक्तित्व और कृतित्व में भक्ति और आस्था का एक ऐसा पक्ष है जिस पर कभी भी मुक्त रूप से न विमर्श हुआ है, न ही इस सम्बन्ध में ज्ञात-अज्ञात तथ्य ही लोगों के समक्ष उजागर हुए हैं।

उनके आध्यात्मिक गुरु
अपने वृहद गायन जीवन में लता मंगेशकर ने सुरों की पतवार थामे राग-रागिनियों के विभिन्न तटबन्धों पर पड़ाव डालते हुए आरोह-अवरोह की संगत में तार सप्तक के शीर्ष को छूते हुए सुर-सागर में गहरे उतर कर उसकी तलहटी तक का जिस सहजता से स्पर्श किया है वह आत्मिक श्रम और समर्पण के साथ ही अपने इष्ट के सात्विक आशीष से ही सम्भव होता है। लता मंगेशकर का स्वयं का आत्म विश्वास और उसमें निहित आत्मिक शक्ति एक ऐसे प्रमुख कारक रहे हैं जो उनके जीवन में आने वाले व्यवधानों तथा अवरोधों को स्वतः ही परे धकेल दिया करते थे। लता मंगेशकर का अपने आध्यात्मिक गुरु के संग का संसार उनका एक ऐसा नितान्त एकल परिसर रहा है, जिस पर कभी कोई चर्चा कहीं नहीं हुई।
गुरू ने ठीक किया था कण्ठ
लता मंगेशकर के आध्यात्मिक गुरु थे श्री श्री 1008 जम्मू महाराज जी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत के प्रथम न्यायाधीश रहे डॉ. नागेन्द्र सिंह के भतीजे राज सिंह डूंगरपुर ने ही लता मंगेशकर का श्री श्री 1008 जम्मू महाराज से प्रथम परिचय कराया था। पहली भेंट में ही लता उनकी अनन्य भक्त बन गई थीं। उनके पद-प्रतिष्ठा-आसन के उत्तराधिकारी बने उनके पुत्र और शिष्य श्री अशोक महाराज। श्री श्री 1008 जम्मू महाराज के जीवन काल में ही लता को श्री अशोक महाराज का सम्पर्क भी सदैव प्राप्त होता रहा। लता मंगेश्कर को एक बार किसी ने किसी खाद्य पदार्थ या पेय में मिला कर कुछ अवांछित तत्व दे दिया था। इस कारण वह गा नहीं पा रही थीं। यहां तक कि बोलने में भी सहज नहीं थीं। वह श्री श्री 1008 जम्मू महाराज के पास पहुंचीं। उन्होंने मां दुर्गा का आवाहन करके पूजा-हवन प्रारम्भ किया। वह बेहद कष्ट में थीं लेकिन फिर भी धैर्य और संयम रखते हुए अडिग भक्ति भाव से एकाग्रचित्त होकर बैठी रहीं।
इस पूजा के बाद उनका कण्ठ पूर्णतः व्याधि मुक्त हो गया। वह दोगुनी ऊर्जा, विश्वास एवं उत्साह के साथ फिर से गायन करने लगीं। जबकि इससे पहले वह इस समस्या को लेकर देश-विदेश में ढेरों चिकित्सकों से मिल चुकी थीं परन्तु इसका निवारण कहीं भी नहीं हो सका था।
श्री श्री 1008 जम्मू महाराज जी के प्रताप से ही राष्ट्रपति रहे वी. वी. गिरी ऐसे रोग से मुक्त हो सके थे जिसका उपचार देश और विदेश में कहीं नहीं हो पाया था। जिन दिनों ज्ञानी जैल सिंह भारत के गृह मंत्री थे तब वे दिल्ली स्थित श्री श्री 1008 जम्मू महाराज से भेंट करने उनके मन्दिर में आए थे। इस भेंट में श्री श्री 1008 जम्मू महाराज ने उन्हें कहा – ज्ञानी जी, आप तैयारी कीजिए अब आप देश के राष्ट्रपति बनने वाले हैं। वह चकित हो गए पर कुछ माह बाद जब वे राष्ट्रपति बन गए तो अपनी प्रथम यात्रा उन्होंने इसी मन्दिर के लिए की और अपना आत्मिक आभार श्री श्री 1008 जम्मू महाराज के श्रीचरणों में, अर्पित किया। लता मंगेशकर ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में अपने निधन के एक वर्ष पूर्व 11 फरवरी 2021 को अपने प्रमुख गुरु वृंदों का पुण्य स्मरण करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा था, ”मेरे जीवन पर जिनका बहुत प्रभाव रहा उन चार गुरुओं में से तीन गुरुजनों की आज पुण्यतिथि है। मेरे आध्यात्मिक गुरु जम्मू महाराज जी, मेरे संगीत गुरु उस्ताद अमान अली खान भेंडी बाजार वाले जी और महाकवि पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी, इन सबको मैं कोटि-कोटि प्रणाम करती हूं।” लता की इस आत्मिक अभिव्यक्ति से स्पष्ट है कि उनके जीवन में उनका मार्गदर्शन करने वाले समस्त गुरुजनों में श्री श्री 1008 जम्मू महाराज का स्थान सर्वोपरि है।
अपने अन्तिम समय में जब लता मंगेशकर अस्वस्थ चल रही थीं तब वे अपनी नियमित दिनचर्या के अधीन श्री अशोक महाराज के सम्पर्क में रह कर उनसे विमर्श कर आवश्यक मार्गदर्शन ले रही थीं। जम्मू महाराज जी के महाप्रयाण के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी श्री अशोक महाराज अब उनके गुरु पद पर आसीन हो कर उनकी समस्त समस्या, शंका एवं दुविधा का निवारण कर रहे थे। निधन से कुछ माह पूर्व से लता मंगेशकर का चित्त अशान्त रहने लगा था। कोरोना की वैश्विक आपदा के घेरे में लता भी आईं पर इन्हीं अशोक महाराज के आध्यात्मिक प्रभाव से वे इस व्याधि से तब मुक्त हो गयीं जब उनका उपचार कर रहे सभी चिकित्सक भी आशा छोड़ चुके थे। इस अवधि में शारीरिक शक्ति के अत्यधिक ह्रास से लता अत्यन्त दुर्बल हो चुकी थीं। उन्हें ये आभास हो रहा था कि अब उनके इस संसार से विदा होने का समय निकट आ रहा है। वे भयभीत नहीं थीं परन्तु अशान्त अवश्य थीं। मृत्यु के प्रति लता उदासीन हो चुकी थीं। उन्हें पुनर्जन्म की कामना नहीं थी। हां, इस सांसारिक माया-मोह से मुक्त हो कर वे मोक्ष प्राप्त करना चाहती थीं।
जीवन और मृत्यु के मध्य डोलते वैचारिक द्वंद्व के ऊहापोह में तब लता मंगेशकर ने फोन पर अशोक महाराज से अपने अशान्त चित्त की व्यथा साझा की और इससे मुक्त होने के लिए कुछ उपाय कराने का अनुरोध किया। वह मुम्बई स्थित उनके आवास ‘प्रभु कुंज’ में शान्ति एवं मुक्ति हेतु विशेष पूजा-हवन करने के लिए आए। उन्होंने इस विशेष पूजा के सम्बन्ध में मुझे बताया था कि वांछित कार्य एवं संकल्प सिद्धि हेतु उन्होंने हनुमान जी का आवाहन किया था और वे प्रज्ज्वलित अग्नि में अपने अपूर्व ओज संग प्रगट हो कर हमारे मनोरथ के पूर्ण होने का आशीष हमें प्रदान कर गए। अग्नि का यह रूप और ओज तब तक बना रहा जब तक हनुमत बलबीरा विदा नहीं हो गए। ज्ञातव्य है कि किसी भी इष्ट देव को आमंत्रित करने के लिए प्रथम उनका आवाहन सम्पूर्ण विधि-विधान से करना होता है और प्रयोजन पूर्ण होने के पश्चात् उन्हें आभार ज्ञापित करते हुए सम्पूर्ण विधि-विधान से विदा किया जाता है।
लता मंगेशकर का अशान्त चित्त अब स्थिर और संयत हो चुका था। उनके भीतर के द्वंद्व का बुलबुला फूट गया था। हृदय अब व्याकुल नहीं था बल्कि आशान्वित था कि उस पार अपने बाबुल प्यारे के संरक्षण में जाने का उनका मार्ग सहज ही प्रशस्त होने जा रहा है। चार वर्ष पूर्व, 6 फरवरी 2022 को वे अपने प्रभु के चरणों में प्रस्थान कर गईं। अध्यात्म, भक्ति, आस्था और प्रार्थना का यह नितान्त व्यक्तिगत परिक्षेत्र और उसकी कथा की गाथा लता मंगेशकर की चतुर्थ पुण्य तिथि पर प्रथम बार उजागर हुई है। लता की उर स्थित पुण्य स्मृति को आत्मिक प्रणाम।
(लेखक, कवि-गीतकार और फिल्म निर्माता हैं)

















