भगवा की विजय और महारथी तानाजी मालुसरे की पूर्णाहुति
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होम भारत

भगवा की विजय और महारथी तानाजी मालुसरे की पूर्णाहुति

तानाजी मालुसरे के बलिदान पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने कहा कि "गढ़ आला पण सिंह गेला"। 4 फरवरी को बलिदान दिवस पर विशेष।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Feb 4, 2026, 09:45 am IST
in भारत
तानाजी मालुसरे

तानाजी मालुसरे

अनादि काल से भारत वीर प्रसूता वसुंधरा के नाम से विख्यात है। मध्यकालीन इतिहास में महाराणा प्रताप से लेकर, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेक महारथी हुए जो मातृभूमि, भारत माता की रक्षा के लिए अपनी अंतिम सांस तक लड़े और सर्वस्व अर्पित कर मुगलों को धूल चटाई। परन्तु आज हम इतिहास के उन शूरवीरों के योगदान और बलिदान को विस्मृत करते जा रहे हैं, इन्हीं योद्धाओं की कड़ी में एक महान् योद्धा तानाजी मालुसरे थे।

सिंहगढ़ पर विजय

तानाजी मालुसरे मराठा साम्राज्य में एक सेनापति थे, जिनके सहयोग से छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के समय के सबसे मजबूत सिंहगढ़ पर विजय हासिल की थी। तानाजी को शिवाजी के बचपन की मित्रता व कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता था। मराठा सम्राज्य में तानाजी, छत्रपति शिवाजी महाराज के विदेशी आंक्रातांओं से मुक्त भारत बनाने में सूबेदार की भूमिका में थे।

बचपन से तलवारबाजी का शौक

तानाजी मालुसरे का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव गोदोली ( जावली तालुका ) में हुआ था। उनका जन्म एक हिंदू कोली परिवार में हुआ था। तानाजी के पिता का नाम सरदार कलोजी व माता का नाम पार्वतीबाई था। उन्हें बचपन से ही तलवारबाजी का शौक था। यही वजह रही कि उनकी मित्रता शाहजी भोंसले के पुत्र शिवाजी से हो गई। शिवाजी ने आगे चलकर अपने साम्राज्य में तानाजी की कुशलता को देखकर अपनी सेना का सेनापति व मराठा साम्राज्य का मुख्य सूबेदार नियुक्त कर दिया।

तानाजी के महत्वपूर्ण युद्ध

तानाजी के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण युद्धों (तोरण द्वार, संगमनेर, उंबरखिंद और सिंहगढ के युद्ध) में एक युद्ध था सिंहगढ़ का युद्ध ( कोंढाणा )। यह युद्ध 1670 में मराठा साम्राज्य व मुगलों के बीच लड़ा गया। जब इस युद्ध की शुरुआत होने वाली थी तब तानाजी और उनकी सहधर्मचारिणी सावित्री अपने पुत्र रायबा के विवाह में व्यस्त थे। विवाह के बीच ही जब उनके पास मराठा साम्राज्य से इस युद्ध की जानकारी मिली,तब वो उसी क्षण अपने मामा शेलार मामा के साथ स्व की विजय के लिए प्रयाण किया।

जब मिला शिवाजी का संदेश

तानाजी मालुसरे शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान सरदार थे। उनके पुत्र के विवाह की तैयारी हो रही थी। चारों ओर उल्लास का वातावरण था। तभी शिवाजी महाराज का संदेश उन्हें मिला- “माता जीजाबाई ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक कोंढाना दुर्ग पर मुसलमानों के हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज नहीं फहराया जाता, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगी। तुम्हें सेना लेकर इस दुर्ग पर आक्रमण करना है और अपने अधिकार में लेकर भगवा ध्वज फहराना है।”

यह संदेश मिलते ही तानाजी ने सबको आदेश दिया- विवाह के बाजे बजाना बन्द करो, युद्ध के नगाड़े बजाओ।”सगे संबंधियों ने तानाजी से कहा- “अरे! पुत्र का विवाह तो हो जाने दो, फिर शिवाजी महाराज के आदेश का पालन कर लेना।” परन्तु तानाजी ने उच्च स्वर में कहा- “नहीं, पहले कोंढाना (कोंढाणा) दुर्ग की विजय होगी , बाद में पुत्र का विवाह। यदि मैं जीवित नहीं भी रहा तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे।” बस, युद्ध निश्चित हो गया।

कोंढाना दुर्ग को बनाया उद्देश्य

सन् 1665 में पुरंदर की संधि के कारण कोंढाना दुर्ग मुगलों को सौंपना पड़ा था तब से ही मराठा सम्राट शिवाजी हर हालत में इस किले को एक बार पुनः हासिल करना चाहते थे।

युद्ध की शुरुआत से पहले शिवाजी महाराज तानाजी को कहते है कि “ कोंढाणा किले को मुगलों की कैद से मुक्त कराना अब उनकी अस्मिता का प्रश्न बन गया है। यदि हम इस किले को हासिल नहीं कर पाए तो आने वाली पीढ़ियां उन पर हंसेगी की हम हिंदू अपना घर भी मुगलों से मुक्त नहीं करा पाए।” जब यह बात तानाजी ने सुनी तो तभी उन्होंने कसम खाई कि, अब उनके जीवन का उद्देश्य केवल कोंढाणा किले को हासिल करना ही है।

कोंढाणा किला जीतना चाहते थे शिवाजी महाराज

कोंढाणा किले की बनावट कुछ इस तरह से थी कि इस पर हमला करने वाली सेना को सबसे ज्यादा विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, वहीं शिवाजी इस किले को हर परिस्थिति में जीतना चाहते थे । उस समय किले पर करीब 5000 हजार मुगल सैनिकों का पहरा था एवं किले की सुरक्षा का जिम्मा उदयभान के हाथों में था। इन परिस्थितियों में कोंढाणा किले का एक ही भाग ऐंसा था,जहां से मराठा सेना आसानी से किले में प्रवेश कर सके और वो भाग था किले की ऊंची पहाड़ियों का पश्चिमी भाग।

तानाजी की रणनीति

तानाजी की रणनीति के अनुसार उन्होंने यह तय किया कि वो पश्चिमी भाग की चट्टानों पर गोहपड़ की सहायता से चढ़कर किले की सुरक्षा को भेदेंगे । गोह सरीसृप प्रजाति से होती है,यह एक बार में मुश्किल से मुश्किल चट्टान में भी मजबूती से चिपक जाती है। गोहपड़ की सहायता से तानाजी के कोंढाणा किले में प्रवेश करने के बाद मराठा सैनिक एक के बाद एक किले में प्रवेश कर गये। तानाजी की इस गोहपड़ का नाम यशवंती था।

मुगलों से कोंढाणा किले को मुक्त कराने के लिए करीब 342 सैनिकों के साथ तानाजी किले में प्रवेश कर गये परन्तु किले में सुरक्षा के लिए तैनात सेनापति उदयभान को इस बात की भनक लग गई और कोंढाणा किले में मुगल व मराठा सैनिकों के बीच 4 फरवरी सन् 1670 के दिन भंयकर युद्ध छिड़ गया। मुगलों की तोपों को निष्क्रिय करते हुए तानाजी ने अनेक मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

उदयभान से भयानक संग्राम

अत्यंत घायल अवस्था में, उदयभान से भयानक संग्राम हुआ। इस द्वंद्व युद्ध में तानाजी मालुसरे का अत्यंत घायल अवस्था में प्राणोत्सर्ग हुआ, परंतु इसके पूर्व तानाजी मालुसरे, ने उदयभान को भी मौत के घाट उतार दिया । अंत में महासंग्राम समाप्त हुआ, भगवा ध्वज फहराया और स्व के लिए पूर्णाहुति के साथ विजय हुई। एक बार फिर कोंढाणा(कोंधाना) किले पर मराठा साम्राज्य का अधिकार गया।

कोंढाणा किले को जीतने के बाद मराठा सम्राट शिवाजी किले की जीत के बाद भी अत्यंत दुखी हो गए और बोले “ गढ़ आला पण सिंह गेला ” यानी गढ़ तो जीत लिया लेकिन मेरा सिंह तानाजी मुझे छोड़ कर चला गया।

कोंढाणा किले का नाम सिंहगढ़ रखा

मुगलों के अधीन से कोंढाणा किले से मुक्त कराने के बाद शिवाजी महाराज ने कोंढाणा किले का नाम बदलकर अपने मित्र की याद में सिंहगढ़ रख दिया साथ ही पुणे नगर के “ वाकडेवाडी ” का नाम “ नरबीर तानाजी वाडी ” रख दिया। तानाजी की वीरता को देखते हुए शिवाजी ने उनकी याद में महाराष्ट्र में उनकी याद में कई स्मारक स्थापित किए।भारत सरकार ने भी तानाजी का सम्मान करते हुए सिंहगढ़ किले की तस्वीर के साथ एक डाक टिकट जारी किया।

तानाजी मालुसरे की वीरता व दृढ़ निश्चय की वीरता का उल्लेख मध्यकाल युग के कवि तुलसीदास ने “ पोवाडा ” कविता की रचना की थी।देश के समाजसेवी बनकर देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने भी तानाजी के जीवन पर “ बाजीप्रभु” नामक गीत की रचना की। सावरकर की इस रचना पर ब्रिटिश सरकार ने रोक लगा दी लेकिन 24 मई 1946 को प्रतिबंध हटा दिया गया।

वीर सावरकर ने तानाजी की सिंहगढ़ की वीरता को अपनी कविता में इस तरह उल्लेख किया

” जयोऽस्तु ते श्रीमहन्‌मंगले शिवास्पदे शुभदे ।
स्वतंत्रते भगवति त्वामहम् यशोयुतां वंदे ॥१॥
स्वतंत्रते भगवती या तुम्ही प्रथम सभेमाजीं ।
आम्ही गातसों श्रीबाजीचा पोवाडा आजी ॥२॥
चितूरगडिंच्या बुरुजानो त्या जोहारासह या ।
प्रतापसिंहा प्रथितविक्रमा या हो या समया ॥३॥
तानाजीच्या पराक्रमासह सिंहगडा येई ।
निगा रखो महाराज रायगड की दौलत आयी ॥४॥
जरिपटका तोलीत धनाजी संताजी या या ।
दिल्लीच्या तक्ताचीं छकलें उधळित भाऊ या ॥५॥
स्वतंत्रतेच्या रणांत मरुनी चिरंजीव झाले ।
या ते तुम्ही राष्ट्रवीरवर या हो या सारे ॥६॥ “
– वीर सावरकर

 

Topics: छत्रपति शिवाजी महाराजतानाजी मालुसरेसिंहगढ़ का किलाकोढाणा का युद्ध
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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