गीता और आरएसएस: उपदेश नहीं, उपचार है सामाजिक समरसता
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होम संघ @100 पंच परिवर्तन सामाजिक समरसता

गीता और आरएसएस: उपदेश नहीं, उपचार है सामाजिक समरसता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता को सामाजिक संगठन का मूल मानता है; भगवद्गीता उसे आंतरिक दृष्टि से पुष्ट करती है और महाभारत इसके व्यावहारिक परिणाम सफलता और विफलता दोनों दिखाता है

Written byडॉ मारकंडे आहूजाडॉ मारकंडे आहूजा
Feb 3, 2026, 04:26 pm IST
inसामाजिक समरसता, पंच परिवर्तन, संघ @100

आज का समाज विरोधों से अधिक, विच्छिन्नताओं से जूझ रहा है। जाति, वर्ग, भाषा, मत, पंथ, संप्रदाय और विचारधारा की दरारें गहरी हो रही हैं। ऐसे समय में सामाजिक समरसता कोई उपदेश नहीं अपितु सभ्यता का उपचार बन जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता को सामाजिक संगठन का मूल मानता है; भगवद्गीता उसे आंतरिक दृष्टि से पुष्ट करती है और महाभारत इसके व्यावहारिक परिणाम सफलता और विफलता दोनों दिखाता है।

क्या है समरसता

समरसता; समानता नहीं, समदृष्टि है । संघ दृष्टि में समरसता का अर्थ समानता थोपना नहीं बल्कि भिन्नताओं के साथ एकता है। यही भाव गीता के “समदर्शन” में व्यक्त होता है, “विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि.. पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता 5.18)। समदर्शन सामाजिक यथार्थ से पलायन नहीं करता; वह गरिमा की समानता की स्थापना करता है। महाभारत में यह दृष्टि विदुर के चरित्र में साकार दिखती है। दासीपुत्र होने पर भी उनकी बुद्धि, नीति और मर्यादा राजसभा की दिशा तय करती है।

योग्यता को मिलती है पहचान

समरस समाज वही है जहां योग्यता को पहचान मिलती है न कि जन्म को विशेषाधिकार। महाभारत का सबसे बड़ा सामाजिक संकट दुर्योधन की दृष्टि दोष से उपजा। कर्ण का अपमान, पांडवों का निष्कासन और द्रौपदी का अपमान, ये सभी घटनाएं वर्चस्व की राजनीति की उपज थीं। दुर्योधन ने संबंधों को सत्ता के चश्मे से देखा न कि समदृष्टि से, जिसका परिणाम हुआ युद्ध और विनाश। यहां गीता का कर्म संदेश स्मरणीय है,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (गीता 2.47)। कर्तव्य से हटकर फल और अहं पर टिके निर्णय समाज को तोड़ते हैं। संघ दृष्टि इसी कारण अधिकार से पहले कर्तव्यबोध पर जोर देती है, “क्योंकि कर्तव्य समाज को जोड़ता है और अधिकार अक्सर उसे तोड़ देता है।

कृष्ण की भूमिका 

समरसता का जीवंत उदाहरण है श्रीकृष्ण की भूमिका। श्रीकृष्ण महाभारत में समन्वय के प्रतीक हैं। वे पांडवों के साथ हैं परंतु कौरवों के शत्रु नहीं; वे कर्ण की क्षमता पहचानते हैं परंतु उसके अहं को नहीं बढ़ाते; वे शांति दूत बनते हैं परंतु अन्याय से समझौता नहीं करते। यह वही संतुलन है, जिसे संघ दृष्टि राष्ट्रहित में सामाजिक समन्वय कहती है।

कृष्ण का संदेश स्पष्ट है कि समरसता नैतिक साहस के बिना संभव नहीं। गीता में वे कहते हैं,“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति…” (गीता 4.7) धर्म का अर्थ यहाँ न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है। समरसता अन्याय पर पर्दा नहीं डालती, वह न्याय के साथ चलती है। परिवार से समाज तक देखें कुंती और गांधारी का उदाहरण।

परिवार से शुरू होता है समरसता का भाव

समरसता का बीज परिवार में पड़ता है। कुंती ने विपत्ति में भी पांडवों को सह-अस्तित्व और संयम सिखाया गांधारी ने त्याग किया, पर पुत्रों को विवेक न सिखा सकीं। परिणाम निकाला एक ओर लचीलापन, दूसरी ओर हठ।

समरस परिवार समरस समाज की नींव

गीता की दृष्टि यहां स्पष्ट है-“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः” (गीता 6.5) आत्मसंयमित व्यक्ति ही समरस परिवार बनाता है और समरस परिवार ही समरस समाज की नींव है। संघ का परिवार प्रबोधन इसी सत्य को सामाजिक स्तर पर स्थापित करता है। कहा जाता है कि दृष्टि बदलेगी तो दिशा बदलेगी। महाभारत हमें बताता है कि समरसता टूटे तो युद्ध होता है और समदृष्टि बने तो समाज टिकता है।

व्यवहारिक नीति है समरसता

संघ दृष्टि समाज को जोड़ने की संरचनात्मक राह दिखाती है; गीता व्यक्ति को बदलने की आंतरिक शक्ति देती है। दोनों मिलकर बताते हैं कि समरसता कोई भावुक आदर्श नहीं बल्कि व्यवहारिक नीति है। निष्कर्ष यही है कि जब दृष्टि समदर्शी होगी, जब कर्तव्य अधिकार से आगे होगा और जब न्याय करुणा से जुड़ा होगा तभी सामाजिक समरसता विचार से व्यवहार बनेगी।

यूनिवर्स 25 के उदाहरण से समझें

समाज बदलने से पहले दृष्टि बदलनी होती है और यही गीता का शाश्वत संदेश और संघ का सामाजिक प्रयत्न है। यूनिवर्स 25 एक प्रसिद्ध समाज-वैज्ञानिक प्रयोग था, जिसे 1960-70 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन बी कल्होंन ने किया और मुझे लगता है कि सभी को इस प्रयोग और इसके नतीजों पर ध्यान देना चाहिये। यह प्रयोग चूहों पर किया गया, लेकिन इसके निष्कर्ष मानव समाज के लिए गहरी चेतावनी बनकर उभरे जिनमे से एक यह भी है कि सामाजिक समरसता केवल संसाधनों से नहीं अपितु संबंधों, मूल्यों और उद्देश्य से बनती है तथा जब समाज में उद्देश्य, नैतिक अनुशासन, सामाजिक भूमिकाएँ, परस्पर उत्तरदायित्व कमजोर पड़ते हैं, तो समृद्धि भी विघटन में बदल जाती है।

समान उद्देश्य से आती है समरसता

महाभारत में राजवंश एक था परंतु दृष्टि विभाजित थी। समरसता केवल साथ रहने से नहीं, समान उद्देश्य से आती है। गीता कहती है-“लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि”(गीता 3.20) अर्थात, व्यक्ति का कर्म समाज को जोड़ने वाला होना चाहिए। सामाजिक समरसता कोई भावुक नारा नहीं, बल्कि सभ्यता की जीवन-रेखा है।

संबंधों की मृत्यु से होता है पतन

इतिहास और विज्ञान दोनों चेतावनी देते हैं कि जब समाज केवल सुविधा, उपभोग और अधिकारों की भीड़ बन जाता है, तब उसका पतन संसाधनों की कमी से नहीं, संबंधों की मृत्यु से होता है। यदि हम वर्ग, जाति, विचार और स्वार्थ की दीवारों को ही अपनी पहचान मानते रहे, तो यूनिवर्स 25 जैसी विफलताएँ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेंगी अपितु वे हमारे नगरों, परिवारों और मनुष्यों के भीतर घटेंगी। अब भी समय है कि हम “मैं” से ऊपर “हम” को, और सुविधा से ऊपर कर्तव्य को स्थापित करें; क्योंकि समरसता के बिना विकास केवल विस्तार है-सभ्यता नहीं।

 

Topics: समाज और संघसंघ और समरसतापाञ्चजन्य विशेषपंच परिवर्तनसंघ शताब्दी वर्षसंघ के 100 साल
डॉ मारकंडे आहूजा
डॉ मारकंडे आहूजा
पूर्व कुलपति ( गुरुग्राम विश्व विद्यालय , बाबा मस्तनाथ विश्व विद्यालय, इंदिरा गांधी विवि. रेवाड़ी) [Read more]
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