लोकमंगल व पुण्य प्राप्ति के लिए हमारी सनातन हिंदू धर्म-संस्कृति में जिन लोकपर्वों को प्रमुखता दी गयी है; उनमें माघी पूर्णिमा के दिव्य स्नान पर्व की विशिष्ट महत्ता है। वैदिक मनीषियों के अनुसार माघ यह ऋतु स्नान पर्व लोकजीवन को देवजीवन की ओर मोड़कर मानव समाज को अपने अंतस में संयम व त्याग के दिव्य भाव जगाने की प्रेरणा देता है। इनमें आध्यात्मिकता के साथ लोकतत्वों की जीवंतता व उल्लास भी है तथा प्रकृति के प्रति आदरभाव और लोकरंजन की गहन भावना भी। इस पर्व की महिमा हमारे धर्मशास्त्रों में विस्तार से वर्णित है। ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार इस वर्ष माघ मास की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 1 फरवरी, रविवार को सुबह 5 बजकर 53 मिनट पर होगी तथा इसका समापन 1 फरवरी को मध्य रात्रि के पश्चात 3 बजकर 39 मिनट पर होगा। अतः उदया तिथि के अनुसार माघ पूर्णिमा का स्नान पर्व 1 फरवरी को मनाया जाएगा।
माघ मास का अंतिम स्नान पर्व
वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा का अपना विशिष्ट माहात्म्य है, लेकिन माघ पूर्णिमा इस मायने में विशेष है, क्योंकि इस पूर्णिमा के पुण्यकाल में सृष्टि के संचालक श्रीहरि विष्णु स्वयं गंगाजल में निवास करते हैं, इसलिए इस दिन गंगा स्नान और जप ध्यान से साधकों की अन्तःऊर्जा सहज ही जाग्रत हो जाती है और उसे अलौकिक आत्मिक आनंद और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है। माघ पूर्णिमा, माघ महीने का अंतिम और सबसे पवित्र दिन है, जो जगत के पालनहार भगवान विष्णु के अर्चन वंदन के लिए अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर प्रयागराज में संगम में स्नान करने से श्रद्धालुओं के अनजाने में हुए पाप-ताप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह पूर्णिमा आत्म-शुद्धि, मन की शांति और दिव्य ऊर्जा से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है। जो श्रद्धालु माघ में कल्पवास के लिए प्रयागराज जाते हैं, उसका समापन भी माघी पूर्णिमा के स्नान के साथ होता है।
माघी पूर्णिमा के पुण्य स्नान का शास्त्रीय विधान
इस पूर्णिमा के विषय में शास्त्रों में विशेष विधान वर्णित है। ‘’निर्णय सिंधु’’ ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो श्रद्धालु इस दिन तारों के छिपने से पूर्व पवित्र स्नान करते हैं, उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति तारों के लुप्त होने के बाद, किंतु सूर्योदय से पूर्व स्नान करते हैं, उन्हें मध्यम फल प्राप्त होता है। मान्यताओं के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व जल में भगवान का दिव्य तेज विद्यमान रहता है। देवताओं से संयुक्त यह तेज पापों का शमन करने वाला माना गया है। कहा जाता है कि जब प्रातःकाल आकाश में पवित्र तारों का समूह दृष्टिगोचर हो, उस समय नदी में किया गया स्नान घोर से घोर पापों का भी नाश कर देता है और साधक को पुण्य का अक्षय फल प्रदान करता है। माघी पूर्णिमा के पर्व पर तीर्थस्थलों पर स्नान के लिए आए श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम “त्रिवेण्ये नमः” का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए, ताकि उनका संकल्प पूर्ण और साधना फलदायी हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघ मास की इसी पूर्णिमा से कलियुग का आरंभ माना जाता है।
माघ पूर्णिमा पर पृथ्वी पर आकर गंगा स्नान करते हैं देवता
मान्यता है कि माघ पूर्णिमा पर देवता पृथ्वी पर माघ का अंतिम गंगा स्नान करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो दिव्य देव शक्तियां माघ माह में गंगातट पर स्थित तीर्थों पर स्नान व विचरण करने धरती पर आती हैं; वे सब भी माघ पूर्णिमा का अंतिम स्नान कर अपने-अपने लोकों को प्रस्थान कर जाती हैं। यह दिन साधकों के लिए मोक्ष और अक्षय पुण्य की प्राप्ति का समय है। इस दिन संगम में स्नान शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है, जिससे दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट दूर होते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और सत्यनारायण कथा को भी विशेष फलदायी माना गया है। इस पर्व पर दान करने से व्यक्ति को कई गुना पुण्य फल मिलता है, जो जन्म जन्मांतरों के पाप-ताप का शमन कर देता है। पुराणकार कहते हैं कि माघ पूर्णिमा के दिन तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम में स्नान कर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ के जप से साधक को सभी प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है। अतः इस शुभ स्नान पर्व का यथासंभव लाभ हर सनातनधर्मी को उठाना चाहिए।
फाल्गुन माह की शुरुआत के साथ ऋतु क्रांति का बोध
हिन्दू तिथि पंचांग के अनुसार माघी पूर्णिमा से फाल्गुन माह की शुरुआत होती है। यह पूर्णिमा सर्दी से गर्मी की ओर परिवर्तन की ऋतु क्रांति की बोघक मानी जाती है। इस दिन विधिपूर्वक किया गया स्नान ध्यान मनुष्य को नर्क गमन से मुक्ति प्रदान करता है और स्नान, दान एवं जप के पुण्य प्रभाव से साधक भवसागर को पार कर विष्णु धाम को प्राप्त करता है। माघ स्नान वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। माघ में ठंड खत्म होने की ओर रहती है। ऋतु के बदलाव का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर नहीं पड़े, इसलिए हमारे तत्वदर्शी मनीषियों ने प्रतिदिन; विशेष कर ऋतु परिवर्तन की बेला में नदी स्नान का विधान बनाया था। तो आइए माघी पूर्णिमा के इस दिव्य स्नान पर्व के अवसर नदियों में आचमन और आस्था की डुबकी लगाने के साथ आत्ममंथन की भी डुबकी लगाएं और अपने जीवन को आध्यात्मिकता के अमृत कलश से भर लें।
छत्तीसगढ़ के राजिम कुम्भ का शुभारम्भ
छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक राजधानी राजिम नगरी में “सोंढूर”, “पैरी” और “महानदी” के संगम पर लगने वाले एक पखवारे के “पुन्नी” मेले (छत्तीसगढ़ी में पूर्णिमा को “पुन्नी” कहते हैं) का शुभारम्भ भी माघ पूर्णिमा की शुभ तिथि से ही होता है और समापन महाशिवरात्रि को। ज्ञात हो कि इस मेले को भारत के पांचवें कुंभ मेले की मान्यता हासिल है।

















