गणतंत्र की जड़ें: वेद से संविधान तक, भारत की गणतांत्रिक आत्मा की खोज
June 5, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

गणतंत्र की जड़ें: वेद से संविधान तक, भारत की गणतांत्रिक आत्मा की खोज

वेदों में गणतंत्र की स्पष्ट प्रणाली का उल्लेख है , जहाँ राजा नहीं, शक्ति का संकेंद्रण सभा और समिति में होता था। इस सभा की सदस्यता जन्म पर नहीं, कर्म-सिद्धांत और प्रतिष्ठा पर आधारित थी।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Jan 26, 2026, 05:03 pm IST
in भारत
भारत में गणतंत्र

भारत में गणतंत्र

सभा में उस दिन कुछ अलग ही वातावरण था। शिक्षक ने पाठ प्रारंभ करने से पहले श्वेत पट पर एक मंत्र लिख दिया, पूर्ण, अक्षरशः, वैदिक स्वरूप में सामूहिक एकता का मंत्र

समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:/ समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति
(ऋग्वेद 10.191.4)

अर्थ: तुम्हारा उद्देश्य एक हो, हृदय एक हों, मन एक हो, ताकि तुम सभी में अच्छी एकता बनी रहे।

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥

शिक्षक ने धीरे-धीरे अर्थ पढ़ा हे ज्ञानियों! तुम सबको एक साथ जोड़ो। जैसे प्राचीन काल में सभी देवता सर्वसम्मति से अपने भाग का उपभोग करते थे, वैसे ही तुम सब मिलकर चलो, एक साथ बोलो और तुम्हारे मन एक हों। तुम्हारा विचार एक हो, तुम्हारी सभा एक हो, तुम्हारा मन और चित्त एक हो। मैं तुम्हारे लिए समान संकल्प से प्रार्थना करता हूँ और सबको समान योगदान अर्पित करता हूँ।

क्षणभर सभा में मौन छा गया। एक छात्र ने प्रश्न किया… यह तो गणतंत्र जैसा लगता है। पर हमें तो बताया जाता है कि गणतंत्र फ्रांस की क्रांति से आया, और वहीं से संविधान की प्रस्तावना में आया… तो क्या हमारे यहाँ पहले गणतंत्र था? क्या बस राष्ट्रपति का चुनाव होना ही गणतंत्र है? या गणतंत्र का कोई गहरा भाव भी होता है? यहीं से भारतीय गणतंत्र की वास्तविक यात्रा प्रारंभ होती है। क्या गणतंत्र केवल चुनाव का नाम है? आधुनिक राजनीति हमें बताती है कि राष्ट्रपति निर्वाचित होता है, संसद जनता से बनती है, सत्ता जनता के नाम पर चलती है, इसलिए हम गणतंत्र हैं।

पर क्या गणतंत्र केवल संवैधानिक व्यवस्था है? या फिर वह एक संस्कृति, एक चेतना, एक नैतिक दृष्टि भी है? यदि गणतंत्र केवल राजा के स्थान पर राष्ट्रपति लाने का नाम है, तो फिर ऋग्वेद में “सं गच्छध्वं” क्यों गूंजता है? सभा और समिति क्यों बनती हैं? महिलाएँ निर्णयों में क्यों भाग लेती हैं? राजा को प्रजा का सेवक क्यों कहा जाता है? यहीं स्पष्ट होता है कि भारत में गणतंत्र आयातित नहीं, संस्कारित विचार है।

वैदिक शासन व्यवस्था : राजशाही और गणतंत्र का सहअस्तित्व

वेदों में गणतंत्र की स्पष्ट प्रणाली का उल्लेख है , जहाँ राजा नहीं, शक्ति का संकेंद्रण सभा और समिति में होता था। इस सभा की सदस्यता जन्म पर नहीं, कर्म-सिद्धांत और प्रतिष्ठा पर आधारित थी। यहाँ सामान्य जन का प्रतिनिधित्व था, और यही आधुनिक विधायिका और द्विसदनीय प्रणाली का आद्य रूप था। महत्वपूर्ण तथ्य यह कि इन सभाओं में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी थी। यह विश्व के प्राचीन इतिहास में लैंगिक सहभागिता का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ तक कि राजा योग्य न होने पर राजा को पद से अलग करने का अधिकार भी था।

निर्णय में समानता : ऋग्वेद का लोकतांत्रिक घोष

ऋग्वेद (10.191.3) का मंत्र वास्तव में गणतंत्र का नैतिक संविधान है “समानो मन्त्रः समितिः समानी…” यह केवल धार्मिक प्रार्थना नहीं, बल्कि शासन का मूल सिद्धांत है ,विचार समान हों, सभा समान हो, संकल्प समान हो, योगदान समान हो। यही तो आधुनिक गणतंत्र की आत्मा है बहस, सहमति, भागीदारी और समान अधिकार।

रामायण और रामराज्य : करुणा पर आधारित गणतंत्र

रामायण काल में शासन निरंकुश नहीं था। राजा राम हर निर्णय से पहले लोकमत का ध्यान रखते हैं। तुलसीदास लिखते हैं “दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहिं काहुहि ब्यापा।” अर्थात रामराज्य में कोई शारीरिक, दैविक या सामाजिक कष्ट नहीं। और एक अत्यंत महत्वपूर्ण चौपाई —“पर हित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।” अर्थ लोकहित से बड़ा कोई धर्म नहीं, लोकपीड़ा से बड़ा कोई अधर्म नहीं। यह लोककल्याणकारी राज्य की शुद्ध गणतांत्रिक अवधारणा है।

महाभारत और गणराज्य परंपरा

महाभारत के शांति पर्व (अध्याय 107–108) में गणराज्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। कहा गया है जब गण में एकता होती है, तो वह शक्तिशाली और समृद्ध होता है। जब आंतरिक संघर्ष होता है, तो गण स्वयं नष्ट हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में केवल हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे राजतंत्र नहीं थे, बल्कि अनेक ऐसे क्षेत्र थे जहाँ कोई राजा नहीं, केवल गणराज्य था।

वैशाली : विश्व का प्राचीनतम गणतंत्र

बौद्ध और जैन साहित्य में 16 महाजनपदों का वर्णन है। इनमें सबसे प्रसिद्ध गणराज्य था वैशाली का लिच्छवी संघ। बौद्ध साहित्य, महानिब्बान सुत्त और अवदान शतक में स्पष्ट उल्लेख है कि वैशाली में राजा नहीं, सभा सर्वोच्च थी, निर्णय सामूहिक होते थे, सत्ता विकेन्द्रित थी।वैशाली वास्तव में विश्व का प्रथम संगठित गणतंत्र माना जाता है।

यूनानी इतिहासकारों की साक्षी

ग्रीक इतिहासकार डियोडोरस सिकुलस लिखते हैं कि 326 ईसा पूर्व में सिकंदर के आक्रमण के समय उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश नगरों में गणतांत्रिक शासन था। एरियन भी इसका समर्थन करता है। मल्लों, क्षुद्रकों और अन्य गणराज्यों ने सिकंदर को भीषण प्रतिरोध दिया भारी क्षति के बाद ही वह आगे बढ़ सका। यह प्रमाण है कि गणराज्य केवल वैचारिक नहीं, राजनीतिक और सैन्य रूप से भी सशक्त थे। यह दर्शाता है कि गणतंत्र केवल वैदिक या बौद्ध काल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत तक फैला हुआ था।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र : राज्य और प्रजा का संबंध

कौटिल्य राज्य को सात तत्त्वों से बना मानते हैं स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (प्रजा), दुर्ग, कोष, बल, मित्र। वे कहते हैं प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के लाभ में राजा का लाभ। मंत्री जनता में से चुने जाते थे,और अर्थशास्त्र में प्रवेश परीक्षा तक का उल्लेख है। राजा को मंत्रियों की सलाह से शासन करना चाहिए यह सत्ता के विकेन्द्रीकरण का सिद्धांत है।

अशोक के अभिलेख : पिता-समान राजा की अवधारणा

सम्राट अशोक अपने शिलालेखों में लिखते हैं सारी प्रजा मेरी संतान है।वे कहते हैं प्रजा का पालन पिता की भाँति करना चाहिए, उनके सुख को अपना सुख, उनके दुःख को अपना दुःख समझना चाहिए। यह केवल नैतिकता नहीं, यह कल्याणकारी शासन की मूल परिकल्पना है।

कमन्दक का नीतिसार : कर और कर्तव्य का संतुलन

कमन्दक नीतिसार में अद्भुत उपमा दी गई है जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से जल ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा से थोड़ा-थोड़ा कर ग्रहण करना चाहिए। वे आगे कहते हैं राजा की तुलना ग्वाले से की जो पहले गाय का पालन करता है, फिर दूध दुहता है। राजा की तुलना माली से की जो पहले पौधों को सींचता है, फिर फल तोड़ता है। अर्थात पहले पोषण, फिर कर। पहले सेवा, फिर शासन। यह विश्व के इतिहास में कर-न्याय और सामाजिक अनुबंध का अनुपम उदाहरण है।

चोलकालीन स्थानीय स्वशासन : भारतीय गणतंत्र का सर्वश्रेष्ठ व्यावहारिक रूप

अब यदि कोई पूछे कि क्या यह सब केवल ग्रंथों और आदर्शों तक सीमित था? तो उत्तर है नहीं। दक्षिण भारत में, विशेषतः चोल साम्राज्य (9वीं–13वीं शताब्दी) में लोकतंत्र की ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था विकसित हुई जिसे आधुनिक विश्व भी आदर्श मानता है। चोल काल में हर गाँव में , ग्रामसभा, महासभा, कार्यरत थीं। ये संस्थाएँ कर निर्धारण करती थीं, सिंचाई, शिक्षा, मंदिर, न्याय का संचालन करती थीं, अधिकारियों का चयन करती थीं, और राजा को भी परामर्श देती थीं।

कुडवोलै प्रणाली : विश्व की प्राचीन चुनाव प्रणाली

चोल काल में प्रतिनिधियों का चयन कुडवोलै (पर्ची-प्रणाली) से होता था। योग्य नागरिकों के नाम पत्तों पर लिखकर घड़े में डाले जाते थे और सार्वजनिक रूप से चयन होता था। यह गुप्त मतदान, निष्पक्ष चयन, योग्यता आधारित प्रतिनिधित्व का अद्भुत उदाहरण है। उत्तरमेरूर अभिलेख (10वीं शताब्दी) में इस पूरी चुनाव प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह प्रमाण है कि भारत में गणतंत्र केवल सिद्धांत नहीं, सजीव प्रशासनिक व्यवस्था था।

विजयनगर और कृष्णदेव राय

कृष्णदेव राय के अमुक्तमाल्यद में भी कहा गया है कि राजा का कर्तव्य है , न्याय, जनकल्याण, लोकसम्मति। राजतंत्र होते हुए भी उसकी आत्मा गणतंत्रात्मक थी। इसलिए यह कहना कि गणतंत्र, समता और बंधुता के विचार हमें फ्रांस से मिले ऐतिहासिक रूप से अधूरा और असंतुलित निष्कर्ष है।

सशक्त गण — सशक्त तंत्र — सशक्त गणतंत्र : आधुनिक भारत की आत्मा

सभा उस दिन केवल अध्ययन का कक्ष नहीं थी, वह नागरिकता की प्रयोगशाला बन गई थी। श्यामपट पर लिखा था गणतंत्र = गण + तंत्र , शिक्षक बोले गणतंत्र केवल राष्ट्रपति का चुनाव नहीं है। यह दो शक्तियों का संतुलन है जागरूक गण और उत्तरदायी तंत्र। भारत की चुनाव व्यवस्था इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, आचार संहिता, पर्यवेक्षक और निगरानी यह तंत्र की शक्ति है। और करोड़ों नागरिकों का कतार में खड़े होकर निर्भीक मतदान यह गण की शक्ति। जब दोनों सशक्त होते हैं, तभी लोकतंत्र शांतिपूर्वक चलता है।

दूसरा सूत्र – जब गण जागरूक हो, तभी गणतंत्र मजबूत हो

सूचना का अधिकार आंदोलन बताता है कि भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ सरकार की कृपा से नहीं, जागरूक नागरिकों की विजय से हुआ। जहाँ नागरिक प्रश्न करता है, वहीं सत्ता संयम सीखती है।

तीसरा सूत्र – गण की शक्ति से तंत्र चले, तंत्र की शुचिता से राष्ट्र फले

आपातकाल, भ्रष्टाचार या नागरिक स्वतंत्रता के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने सत्ता को रोका। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और तंत्र की शुचिता का प्रमाण है।

चौथा सूत्र लोक जागे — तंत्र जगे — तभी लोकतंत्र सजे

निर्भया कांड, पर्यावरण आंदोलन, भूमि अधिग्रहण जहाँ जनता जगी, वहाँ संसद ने कानून बदले। लोकतंत्र का सौंदर्य है संवाद से सुधार।

पाँचवाँ सूत्र गण सशक्त होगा, तंत्र समर्थ होगा — तभी गणतंत्र अमर होगा

73वाँ–74वाँ संशोधन, पंचायतें, महिला आरक्षण और सामाजिक लेखा परीक्षा दिखाते हैं कि गणतंत्र केवल दिल्ली में नहीं, गाँव-गली तक जीवित है।

छठा सूत्र नागरिक सशक्त, व्यवस्था पारदर्शी — यही है सच्चा गणतंत्र

2G, कोयला, रक्षा सौदों में CAG और संसदीय समितियों ने सत्ता से जवाब माँगा। यह बताता है कि भारत में कोई शक्ति निरंकुश नहीं।

सातवाँ सूत्र जहाँ जागरूक गण, वहीं मजबूत राष्ट्र

कोरोना काल में स्वयंसेवक, डॉक्टर और अनुशासित नागरिक सिद्ध करते हैं कि राष्ट्र की रीढ़ सरकार नहीं, समाज स्वयं है।

आठवाँ सूत्र गण की चेतना ही तंत्र की सबसे बड़ी शक्ति

जनहित याचिकाओं से पर्यावरण, बाल श्रम, सड़क सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में नीतियाँ बदलीं। अंतिम शक्ति अदालत नहीं, नागरिक विवेक है।

नवाँ सूत्र —जब गण सशक्त और तंत्र निष्पक्ष — तभी गणतंत्र महान

भारत में सत्ता परिवर्तन मतपत्र से होता है, युद्ध से नहीं। यही लोकतंत्र की महानता है।भारत का गणतंत्र काग़ज़ की व्यवस्था नहीं, चलती हुई सभ्यता है। यह जीवित है मतदाता की उँगली में, न्यायालय के निर्णय में, पंचायत की बैठक में, पत्रकार के प्रश्न में, छात्र की जिज्ञासा में।

क्या हम सचमुच गणतंत्र हैं? — भारत के लोकतंत्र का आत्मपरीक्षण

सभा में उस दिन शिक्षक ने कोई मंत्र नहीं लिखा। उन्होंने केवल एक प्रश्न पूछा बच्चो…आज के भारत में क्या हम सचमुच गणतंत्र में जी रहे हैं? कक्षा में सन्नाटा छा गया। एक छात्र बोला सर, राष्ट्रपति निर्वाचित होता है, संसद है, चुनाव होते हैं…तो हम गणतंत्र ही तो हैं। शिक्षक मुस्कराए हाँ, व्यवस्था है। पर प्रश्न यह है क्या चेतना भी है? क्या हम ‘गण’ हैं, या केवल भीड़? और यहीं से आधुनिक भारतीय गणतंत्र का कठोर आत्मपरीक्षण शुरू होता है।

गणतंत्र : व्यवस्था से पहले संवेदना

गणतंत्र का पहला सिद्धांत यह नहीं कि कौन शासन करता है, बल्कि यह कि क्या पूरा समाज एक-दूसरे के दुःख का सहभागी है? पर आज का भारत देखिए कश्मीर के हिंदुओं के साथ कुछ होता है तो शेष भारत कहता है,यह तो वहाँ का मामला है। किसानों के साथ कहीं अन्याय होता है तो शहरी समाज कहता है, हमें क्या, हमें तो रोज़ ऑफिस जाना है। किसी जाति के साथ अत्याचार होता है तो लोग कहते हैं, यह तो उनका आंतरिक मुद्दा है। मानो देश नहीं, खंडों में बँटा हुआ मोहल्ला हो। प्रश्न यह नहीं कि घटनाएँ हो रही हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम उनके भागीदार बनते हैं? या हम तब तक सोए रहते हैं जब तक आग हमारे अपने घर तक न पहुँचे? यही वह बिंदु है जहाँ गणतंत्र धीरे-धीरे संवेदनहीन व्यवस्था बन जाता है।

सरकार : सेवा या उपकार?

सत्ता का व्यवहार देखिए, सड़क बनती है तो उद्घाटन ऐसे जैसे कोई राजा दान दे रहा हो। पुल बनता है तो होर्डिंग ऐसे लगते है जैसे जनता पर उपकार हो गया हो। योजना आती है तो प्रचार ऐसे जैसे सरकार अपने निजी धन से सहायता दे रही हो। पर एक मूल प्रश्न कोई नहीं पूछता क्या ये सड़कें, पुल, योजनाएँ सरकार की कृपा हैं या जनता के ही कर का उपयोग? यह धन किसान का टैक्स है, आम आदमी का जीएसटी है, दुकानदार की कमाई है, मध्यमवर्ग की बचत है। तो फिर सरकार क्यों त्याग माँगती है और स्वयं को विशेषाधिकार प्राप्त मानती है? लोकतंत्र में सरकार दाता नहीं होती, केवल न्यासी होती है। पर जब सत्ता स्वयं को उपकारकर्ता समझने लगे, तब गणतंत्र धीरे-धीरे दरबारी मानसिकता में बदल जाता है।

भीड़तंत्र बनाम गणतंत्र

यह हमारे समय की सबसे खतरनाक विडंबना है। भारत में कई माँगें कानून से नहीं, भीड़ से मनवाई जाती हैं। जहाँ सड़क जाम होता है, ट्रेन रोकी जाती है, हिंसा होती है, दबाव बनता है वहाँ सरकार तुरंत झुकती है। पर जो लोग शांतिपूर्वक, संवैधानिक ढंग से, नैतिक आधार पर न्याय माँगते हैं उनकी फाइल किसी मेज़ के नीचे धूल खाती रहती है। तो प्रश्न उठता है क्या भारत गणतंत्र है, या धीरे-धीरे भीड़तंत्र बनता जा रहा है?

भारत को सच्चा गणतंत्र बनाने के पाँच सूत्र

संवेदना का राष्ट्रीयकरण

देश में कहीं भी अन्याय हो उसे उनका मामला नहीं, हमारा मामला मानना होगा। गणतंत्र केवल मतदान से नहीं, संवेदना से जीवित रहता है।

सरकार को उपकारकर्ता नहीं, सेवक समझना

हर योजना जनता के धन से है, जनता के लिए है और जनता की निगरानी में है । सरकार को दानदाता नहीं, न्यासी बनना होगा।

भीड़ से नहीं, कानून से माँग मनवाना

जो माँग हिंसा से मनवाई जाती है, वह लोकतंत्र को कमजोर करती है। हमें फिर से
शांतिपूर्ण, तर्कसंगत, संवैधानिक संघर्ष की संस्कृति लौटानी होगी।

न्याय को सचमुच अंतिम सहारा बनाना

न्याय सुलभ हो , सस्ता हो शीघ्र हो और निष्पक्ष हो ताकि किसी को भीड़ या हिंसा का सहारा न लेना पड़े।

नागरिक के भीतर नैतिक पुनर्जागरण

बिना नैतिक नागरिक के कोई भी संविधान केवल पुस्तक रह जाता है। हमें फिर से सिखाना होगा कर्तव्य , सत्य , अनुशासन , करुणा लोकहित । यही गणतंत्र की वास्तविक रक्षा है।

गणतंत्र केवल दिवस नहीं, गणतंत्र चेतना का पर्व

गणतंत्र केवल एक दिन का उत्सव नहीं, यह हर दिन की आत्मपरीक्षा है। तिरंगा फहराना आसान है, पर तिरंगे के मूल्यों को जीवन में उतारना कठिन। परेड देखना सरल है, पर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना साहस माँगता है। प्रश्न यह नहीं कि हमारा संविधान कितना महान है प्रश्न यह है कि हम उसके योग्य नागरिक कितने हैं। क्या हम केवल अपने अधिकार जानते हैं, या दूसरों के दुःख में भी सहभागी बनते हैं?

क्या हम व्यवस्था को कोसते हैं, या उसे सुधारने का उत्तरदायित्व भी निभाते हैं? क्योंकि गणतंत्र संसद से नहीं, समाज की चेतना से जीवित रहता है और इसलिए सत्य यही है जब गण जागेगा, तभी तंत्र सुधरेगा, और जब तंत्र सुधरेगा, तभी गणतंत्र सचमुच महान बनेगा तभी ऋग्वेद का यह मंत्र ग्रंथों से उतरकर राष्ट्र के जीवन में साँस लेगा सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।साथ चलो, साथ बोलो, साथ सोचो यही भारत के गणतंत्र की सनातन आत्मा और भविष्य की दिशा है।

 

Topics: वेद संविधानभारत में गणतंत्रभारतगणतंत्र दिवसपाञ्चजन्य विशेषभारत का संविधानभारत की आत्मा
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

पर्यावरण दिवस पर विशेष : प्रकृति ही परमात्मा

विश्व पर्यावरण दिवस :- स्वस्थ पर्यावरण, स्वस्थ जीवन : आज की सबसे बड़ी आवश्यकता

राहुल गांधी

विशेष रिपोर्ट : बोलने से पहले इतिहास पढ़ें ‘राहुल’

आज का श्लोक : सन्तः सन्तप्यन्ते न दुःखेषु

‘महंगाई काबू में और देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत स्थिति में’- प्रो. गौरव वल्लभ

तराई में कन्वर्जन कराने की शिकायत मिलने के बाद जांच करते उधम सिंह नगर प्रशासन के अधिकारी

उत्तराखंड से विशेष रिपोर्ट : तराई में कन्वर्जन की छाया

Load More

ताज़ा समाचार

पर्यावरण दिवस पर विशेष : प्रकृति ही परमात्मा

rss karyakarta vikas varg nagpur concludes kumar mangalam birla speech

“संघ का कार्य अभूतपूर्व है” : नागपुर में बोले कुमार मंगलम बिरला, ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग’ के समापन पर दिया बड़ा मंत्र

rss karyakarta vikas varg nagpur mohan-bhagwat speech kumar mangalam birla

“दुनिया को भारत की आवश्यकता है” : डॉ. मोहन भागवत जी

rss path sanchalan karyakarta vikas varg nirala nagar lucknow

लखनऊ: RSS के ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग’ का भव्य पथ संचलन, घोष की धुन और कदमताल से दिखा अनुशासन का अद्भुत नजारा

विश्व पर्यावरण दिवस :- स्वस्थ पर्यावरण, स्वस्थ जीवन : आज की सबसे बड़ी आवश्यकता

5 जून का पंचांग

5 जून पंचांग: किस समय करें शुभ कार्य, क्या कहती है ग्रहों की स्थिति?

Constitution expert Dr Subhash Kashyap passes away

संविधान विशेषज्ञ और पद्म भूषण डॉ. सुभाष कश्यप का 97 वर्ष की उम्र में निधन, संसदीय जगत में शोक की लहर

ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी: बड़े मंदिरों को बम से उड़ाने की धमकी, लिखा- बदला, बदला, बदला

bijnor umar international meat factory-sealed 168 crore assets attached in cow smuggling

बिजनौर: ‘फिश फूड’ की आड़ में गोतस्करी, अतीक अहमद की 168 करोड़ की मीट फैक्ट्री सील

बशीर बद्र (फाइल फोटो)

असली जमींदार कौन? भारत की मिट्टी पर अधिकार: कब्रों से या कर्तव्यों से?

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies