रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रारंभ में अमेरिका ने रूस के लगभग 300 अरब डॉलर मूल्य के बांड को फ्रीज कर दुनिया को चेताया। इसी कारण विभिन्न देश लगातार अपने डॉलर डिनोमिनेटेड विदेशी मुद्रा का भंडार कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के कारण सभी देशों का अमेरिका और अमेरिकी डॉलर से भरोसा डगमगाया है। इसके चलते अमेरिकी डॉलर अन्य मुद्राओं की तुलना में कमजोर हुआ है। वर्तमान में अमेरिका जिन नीतियों पर चल रहा है, संभावना है आने वाले समय में अमेरिकी डॉलर और कमजोर होगा।
डाॅलर पर घटती निर्भरता
पिछले कुछ महीनों में भारत-चीन सहित दुनिया के सभी बड़े देश तेजी से अमेरिकी बांड बेच कर अपनी डॉलर आधारित रिजर्व कम कर रहे हैं। साथ ही, अधिकतर देश अमेरिकी ट्रेजरी बांड की बजाय सोना खरीद रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत ने 200 अरब डॉलर तथा चीन ने लगभग 700 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का अमेरिकी बांड बेचा है। गत दो वर्ष में इन देशों ने केंद्रीय अमेरिकी ट्रेजरी बांड न खरीदकर 2000 टन से अधिक सोना खरीदा है। बीते तीन दशकों में यह पहला अवसर है, जब केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में सोना और डॉलर का अनुपात 1 से अधिक हो गया है। इसका स्पष्ट मतलब है कि दुनिया के केंद्रीय बैंक अमेरिकी डॉलर से अधिक सोना खरीद रहे हैं। आरबीआई ने ही बीते कुछ माह में लगभग 100 अरब डॉलर का सोना खरीदा है। अनुमान है कि 2026 में भी लगभग इतने ही मूल्य का और सोना खरीद सकता है। वर्तमान में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत से अधिक हो गई है, जो 2021 में लगभग 5 प्रतिशत थी।

भारत का स्वर्ण भंडार
भारत के पास दुनिया का 7वां सबसे बड़ा सोने का भंडार है, जो 2015 में 10वें स्थान से ऊपर आया है। बीते कुछ वर्षों में आरबीआई अपने रिजर्व का विविधीकरण करने और अपनी विदेशी संपत्ति की स्थिति को मजबूत करने के लिए सक्रिय रूप से सोना खरीद रहा है। जनवरी 2026 तक भारत की कुल विदेशी संपत्ति में सोने का हिस्सा बढ़कर लगभग 16 प्रतिशत हो गया है, जो 2024-25 में 10 प्रतिशत था।
वित्त वर्ष 2025 में रिजर्व बैंक ने 57.5 टन सोना खरीदा, जो दिसंबर 2017 के बाद से उसकी दूसरी सबसे बड़ी सालाना खरीद थी। अक्तूबर 2025 तक सोने का भंडार लगभग 102 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था। आरबीआई के अनुसार, भारत का स्वर्ण भंडार 2020 में 653 टन था, जो मार्च 2025 तक बढ़कर 880 टन हो गया। यानी, 5 वर्ष में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। आरबीआई ने कोरोना महामारी के बाद से अपने भंडार में चीन को छोड़कर किसी भी दूसरे देश के केंद्रीय बैंक से अधिक सोना जोड़ा है। आरबीआई ने 2025 में लगभग 3 टन सोना और जोड़ा, जिससे 31 जनवरी, 2025 तक उसका स्वर्ण भंडार बढ़कर 870 टन हो गया।
वहीं, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) ने पिछले पांच वर्ष में मिलकर लगभग 700 टन सोना खरीदा है। इसमें से एक तिहाई से अधिक हिस्सा भारत का है। भारत में यह रफ्तार जारी है, जबकि कुछ दूसरे देशों ने इसे धीमा कर दिया है। 2024 की आखिरी तिमाही में भारत सोने का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार था। इसने 22.54 टन सोना खरीदा, जबकि पोलैंड 28.53 टन सोने के साथ सबसे ऊपर रहा। वहीं, चीन ने 15.24 टन और सिंगापुर ने सोने की होल्डिंग में 7.65 टन की कटौती की। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, आरबीआई ने 2020 से 2024 तक 5 वर्ष में 244 टन सोना जोड़ा, जबकि चीन ने 336 टन।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार
इसके अलावा, ट्रंप ने जब से टैरिफ का मुद्दा छेड़ा है, दुनिया के अनेक देशों ने डॉलर के बदले स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना शुरू कर दया है। पिछले कुछ वर्षों में चीन और रूस के बीच होने वाला लगभग समूचा व्यापार स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। उसी तरह भारत भी रूस सहित अनेक देशों के साथ भारतीय रुपये में व्यापार कर रहा है। इतना ही नहीं, आरबीआई तेजी के साथ दुनिया के अन्य देशों के साथ रुपये में व्यापार हो सके, इसके लिए आवश्यक समझौते और अधारभूत ढांचा खड़ा कर रहा है।
ब्रिक्स और अन्य क्षेत्रीय सहयोग संगठन स्थानीय मुद्राओं या किसी वैकल्पिक साझा मुद्रा में व्यापार करने के लिए लगातार बातचीत कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने दुनिया को किसी अन्य वैकल्पिक साझा मुद्रा की बातचीत व विचार करने के विषय को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए लगता है कि धीरे-धीरे दुनिया अमेरिकी डॉलर के बदले किसी अन्य वैकल्पिक मुद्रा को लेकर जल्दी ही कुछ स्पष्ट सहमति बना सकती है।
इन परिस्थितियों में संभावित वैश्विक शक्ति परिवर्तन की स्थिति में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। भारत न सिर्फ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, बल्कि इसकी बड़ी डेमोग्राफिक शक्ति भी महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं, भारत ने यूपीआई और रूपे पेमेंट गेटवे सिस्टम की सफलता से यह साबित कर दिया है कि दुनिया के लिए अमेरिकी पेमेंट गेटवे अब अपरिहार्य नहीं है।
वर्तमान में दुनिया के एक दर्जन से अधिक देश रूपे और यूपीआई को स्वीकार कर चुके हैं। ये तथ्य भारतीय रुपये को अमेरिकी डॉलर का विकल्प बनने का संभावित दावेदार बनाता है। हालांकि यह रास्ता बहुत लंबा है। जब तक भारत दुनिया के देशों के साथ व्यापार में लाभ की स्थिति में नहीं आता, तब तक दुनिया को भारतीय रुपया स्वीकार नहीं होगा। भारत के इस स्वप्न को साकार करनेे के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारों व व्यवसायों को ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए विनिर्माण में दुनिया बड़ा केंद्र बनना होगा। इसका रास्ता आने वाले वर्षों में शोध के क्षेत्र में अधिक से अधिक खर्च कर बौद्धिक संपदा प्राप्त करने से खुलेगा। (प्रस्तुति : राजीव उपाध्याय)

















