विश्व पटल पर भारत : नई उड़ान, ठोस पहचान
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होम भारत

विश्व पटल पर भारत : नई उड़ान, ठोस पहचान

अमेरिका की आक्रामक नीतियों ने दुनिया में उथल-पुथल मचा रखी है। 18वीं सदी तक विश्व का नेतृत्व करने वाला यूरोप आज पस्त है। अमेरिका, जिसने 20वीं शताब्दी में नेतृत्व किया, अब ढलान पर है और नई समस्याओं का केंद्र बन गया है। ऐसे में भारत की स्वाभाविक नियति बन पड़ी है कि वह अपनी ‘सॉफ्ट पावर’, वसुधैव कुटुम्बकम् एवं ऐतिहासिक अनुभव से न सिर्फ ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करे, बल्कि विश्व सहयोग के केन्द्र के नाते दायित्व भी संभाले

Written byसतीश कुमारसतीश कुमार
Jan 23, 2026, 05:49 pm IST
in भारत, विश्लेषण

गत एक वर्ष से विश्व नई प्रकार की चुनौतियों में जकड़ा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वैश्विक पटल पर उभार के बाद पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची है, जो केवल व्यापारिक व आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक, रणनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में भी फैल चुकी है। कारण साफ है-अमेरिका का राष्ट्रपति साधारण नेता नहीं होता। अमेरिका सबसे शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र है, जिसकी आकाश, धरती, अंतरिक्ष स्टेशन से लेकर गहरे समुद्र में परमाणु पनडुब्बियों तक, वैश्विक नेटवर्क पर 100 से अधिक वर्ष से मजबूत पकड़ है। नाटो से मध्य पूर्व तक राजनीतिक, व्यापारिक व सैन्य संधियों का जाल इसे और शक्तिशाली बनाता है।

अमेरिका का व्यापार (आयात-निर्यात) 6 खरब डॉलर का है, जो लगभग हर देश से जुड़ा है। यही नहीं, विश्व की इस सबसे बड़ी सैन्य शक्ति का वार्षिक बजट एक खरब डॉलर है, जिसे इस वर्ष बढ़ाकर 1.5 खरब डॉलर करने की योजना है। विज्ञान व तकनीक में इसकी बादशाहत इसे आगे भी वैश्विक महाशक्ति बनाए रखेगी।

अमेरिकी स्वार्थ सर्वोपरि

नई बात यह है कि अमेरिका लगातार व्यापार घाटे से परेशान है। उत्पादन घट रहा है, इसलिए वह किसी भी शर्त पर दुनिया से धन का प्रवाह अपनी तरफ मोड़ना चाहता है। 1940-50 के दशक में इसने संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) बनाए ताकि आर्थिक प्रवाह का केंद्र बने रहे। जब ये अपर्याप्त हो गए, तो पहले गैट (जीएटीटी) वार्ताएं शुरू कीं, फिर 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) गठित किया, लेकिन खास फायदा नहीं हुआ। अब वैश्वीकरण व उदारीकरण का झंडाबरदार अमेरिका खुद को उद्योग और अर्थव्यवस्था में असुरक्षित मानकर चारों ओर टैरिफ की बाढ़ लाना चाहता है।

ईरान को ट्रंप की धमकी

अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में ईरान को ‘धरती से मिटाने’ की धमकी दी है। उन्होंने कहा, ‘‘अगर मुझे नुकसान पहुंचा तो तेहरान का वजूद नहीं बचेगा।’’ यह उनके पुराने बयान का विस्तार है, जब उन्होंने खामेनेई को ‘बीमार आदमी’ बताते हुए और नए नेतृत्व की बात कही थी। ट्रंप ने ईरान के प्रदर्शनकारियों को समर्थन दिया है। वे कह चुके हैं कि ‘लोगों पर अत्याचार हुआ तो हमला करेंगे।’ ईरानी सेना ने भी जवाबी धमकी दी है। जनरल शेकरची ने कहा, ‘ट्रंप जानते हैं, हमारे नेता की ओर हाथ बढ़ाया तो दुनिया में आग लगा देंगे।’ तेहरान ने साफ कहा है कि खामेनेई पर हमला युद्ध का ऐलान होगा।

इस बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को सीधी धमकी दी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उनका देश पूरी ताकत के साथ जवाब देगा। यह बयान तब आया जब दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने उनका आमंत्रण रद्द कर दिया और एक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप एशिया से मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी लड़ाकू जेट्स और अन्य उपकरण भी मध्य पूर्व पहुंचते दिखे हैं।

मित्र, शत्रु या निष्पक्ष-ट्रंप ने हर देश पर टैरिफ लगा दिए हैं, मित्रों पर तो और भी ज्यादा। जैसे- कनाडा पर 35 प्रतिशत, भारत पर 50 प्रतिशत, यूरोप पर एकतरफा टैरिफ और ग्रीनलैंड पर तो टैरिफ और अधिक बढ़ाने की धमकी। दरअसल, यह टैरिफ नया व्यापारिक परमाणु हथियार है, जिससे विश्व को डराकर ट्रंप धन की धारा अमेरिका की ओर मोड़ना चाहते हैं। नैतिक-अनैतिक, कानूनी या गैर-कानूनी, उनके लिए कुछ मायने नहीं रखता। बहुतों को लगता है कि यह सब ट्रंप के कारण हो रहा है। लेकिन यह सच नहीं है। असल में यह अमेरिका की संरचनागत प्रक्रिया है। डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन, अथवा थिंक टैंक, सब अमेरिकी स्वार्थ, खासकर प्रभावशाली लॉबियों का हित साधते हैं। टैरिफ से महंगाई बढ़े, अमेरिका की आम जनता परेशान हो-इनकी चिंता ही नहीं, विश्व मानवता तो दूर की बात है।

लोकतंत्र, नियम-आधारित विश्व व्यवस्था, नैतिकता अमेरिका तभी अपनाता है, जब उसका फायदा हो। उसके लिए स्वार्थ सर्वोपरि है। रूस को यूक्रेन चाहिए, तो अमेरिका को वेनेजुएला का तेल और पूरा ग्रीनलैंड। अमेरिका चाहता है कि हर देश उसे टैरिफ के रूप में नया ‘टैक्स’ दे, क्योंकि वह बड़ी अर्थव्यवस्था व सैन्य ताकत है। अभी स्थिति यह है कि ग्रीनलैंड मुद्दे पर समूचा यूरोप ही नहीं, कनाडा भी परेशान है, क्योंकि ट्रंप उसे ‘अपना राज्य’ बताते हैं। इसलिए कनाडा ने चीन का रुख किया है, जो उसे कभी पसंद नहीं था। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिन से मिलने गए और अब भारत भी आएंगे।

अमेरिका डब्ल्यूएचओ से बाहर

अमेरिका 22 जनवरी, 2026 से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सहित 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य नहीं रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी माह आधिकारिक तौर पर इन संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा की थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इनमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं।

व्हाइट हाउस और अमेरिकी गृह विभाग के अनुसार ये संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं। इनमें पैसों की बर्बादी होती है। इसके अलावा ये गैर-जरूरी या खराब तरीके से चलाए जा रहे हैं। इस कदम को ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जो वैश्विक संस्थाओं से दूरी बनाने पर जोर देती है। अमेरिका भारत की पहल से बने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) में भी नहीं रहेगा। इसे 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में शुरू किया था। अमेरिका पर डब्ल्यूएचओ का 26 करोड़ डॉलर बकाया है। अमेरिकी कानून के तहत डब्ल्यूएचओ की सदस्यता छोड़ने के लिए एक साल का नोटिस देना और सभी बकाए चुकाना जरूरी है।

प्रश्न है, अमेरिका ऐसा क्यों कर रहा है? इसका उत्तर जानने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने विज्ञान, तकनीक और उद्योग विकसित करने के लिए विश्व भर के प्रतिभाशाली युवाओं व उद्यमियों को आमंत्रित किया। परिणामस्वरूप, वहां नए-नए आविष्कार हुए। आज इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (आईपीआर) से ही अमेरिका को लगभग 9 खरब डॉलर की आय होती है, जो उसकी जीडीपी का लगभग 30 प्रतिशत है। लेकिन दूसरी तरफ इसका असर यह हुआ कि अमेरिकी आरामपसंद हो गए।

वे शेयर बाजार में निवेश, आप्रवासियों की मेहनत पर खड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी और आईपीआर में लाभांश लेकर ऐशो-आराम का जीवन बिताने लगे। नतीजा, अब वे कम उत्पादक हैं। दूसरे, 60-70 वर्ष के दौरान दुनिया भर से जो लोग अमेरिका आए, उनमें भारत व चीन से आए आप्रवासियों की संख्या सर्वाधिक है और अमेरिकी यह मानने लगे हैं कि ‘ये लोग अब जनसांख्यिकी, नौकरियों एवं व्हाइट क्रिश्चियन प्रभाव को चुनौती दे रहे हैं।’ रिपब्लिकन ने इन्हीं मुद्दों को आधार बनाया और ‘मूल अमेरिकियों को नौकरियां, बाहरी निकालेंगे, महंगाई रोकेंगे’ जैसे नारों की बदौलत चुनाव जीता। इसी कारण ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (एमएजीए) का नारा दिया।

ट्रंप प्रशासन से यहीं एक बड़ी चूक हो रही है। आप्रवासी प्रतिभा व परिश्रमी उद्यमियों, जिन्होंने अमेरिका को यहां तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, को तिरस्कृत किया जा रहा है और ‘बाहरी’ कहा जा रहा है, तो वे इसे कैसे स्वीकार करेंगे? डेमोक्रेटिक पार्टी इसी आवाज को बुलंद कर रही है। दूसरी बात, यदि ये उद्यमी वापस चले जाएंगे या तिरस्कृत हो जाएंगे, तो अमेरिका अवश्य नीचे आएगा।

भारत के लिए अवसर

आज भले ही ट्रंप अमेरिका को समृद्ध बनाए रखने के लिए टैरिफ और 10 मिलियन डॉलर की सदस्यता जैसी कृत्रिम योजनाएं ला रहे हैं, लेकिन इससे अमेरिका और उसकी अर्थव्यवस्था का कमजोर होना तय है। हालांकि, इस स्थिति तक पहुंचने में समय लगेगा। ऐसे में प्रश्न उठता है कि भारत के लिए मार्ग क्या है? क्या निकट भविष्य में कोई समाधान संभव है? वास्तव में, हर बड़ी चुनौती एक बड़ा अवसर भी लाती है। यह अब तक की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है। यदि भारत इस चुनौती को अवसर में बदलने का दृढ़ संकल्प कर ले, तो वह अपनी नई वैश्विक भूमिका निभा सकता है। इसके लिए भारत को न केवल आर्थिक और सामरिक दृष्टि से स्वयं को सुदृढ़ करना होगा, बल्कि अमेरिका की इस दादागिरी से परेशान और भयभीत विश्व के लगभग सभी देशों का नेतृत्व करने की सोच भी बनानी होगी। यही इसके लिए सबसे उपयुक्त अवसर है।

बीते एक वर्ष में जिस तरह अमेरिका ने लगभग सभी देशों को अपने से दूर किया है, आने वाले समय में यह दूरी शत्रुता में भी बदल सकती है। चीन, जो कि दूसरी बड़ी वैश्विक शक्ति है, अब आर्थिक और सामरिक रूप से उभर रही है। लेकिन समस्या यह है कि चीन पर यूरोप विश्वास नहीं कर सकता। अफ्रीकी महाद्वीप के 55-56 देश आर्थिक रूप से कुछ हद तक चीन पर निर्भर हैं, लेकिन अमेरिका जैसी धौंस-पट्टी से तंग आकर वे भी सम्मानजनक विकास का मार्ग तलाश रहे हैं।

ऐसे में विश्व की आशाओं का केंद्र भारत ही दिखता है। इसलिए भारत को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहिए, यह चिंतन विश्व स्तर पर चल रहा है। किंतु क्या भारत विश्व नेतृत्व की भूमिका संभालने को तैयार है? भारत के पास ऐसे कौन से विचार और योजनाएं हैं, जो इसे नेतृत्व प्रदान करने योग्य बनाता है? भारत, जो एक उभरती अर्थव्यवस्था है, से विश्व के इन देशों को क्या हासिल होगा जो वे इसके नेतृत्व को स्वीकार करेंगे? सबसे पहले, भारत को बौद्धिक और मानसिक रूप से तैयार होना होगा कि उसे न केवल एक समृद्ध, सशक्त और महान अर्थव्यवस्था बनना है, बल्कि विश्व के सहयोग और समन्वय का नेतृत्व भी करना है। स्वामी विवेकानंद ने ‘शिशु नेतृत्व’ की कल्पना दी थी, अर्थात् विचार और व्यवहार के आधार पर वैश्विक नेतृत्व प्रदान किया जा सकता है।

कोरोना महामारी के बाद पापुआ न्यू गिनी के राष्ट्रपति ने हवाईअड्डे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छुए, क्योंकि कठिन समय में भारत ने उनकी आर्थिक मदद की थी। इसी प्रकार, भारत अन्य आपदाओं में भी ऐसी ही भूमिका निभाता रहा है। यह ‘सॉफ्ट पावर’ है, जिस पर विश्व का कोई देश अभी पूर्ण विश्वास के साथ प्रयोग नहीं कर पाया। यही भारत की विशेष ताकत है। विश्व हमेशा ‘हार्ड पावर’ पर चलता रहा है, यह सत्य है, किंतु ‘सॉफ्ट पावर’ से भी एकजुटता संभव है। यह भारत करके दिखा सकता है। 1893 में जब स्वामी विवेकानंद शिकागो गए, तो वे एक पराधीन देश के प्रतिनिधि थे, जिसकी छवि मलिन थी। वे स्वयं मात्र 30 वर्ष के थे। न किसी पद पर थे और न ही सरकार या किसी संगठन के प्रतिनिधि। किंतु विचार की शक्ति से वे अमेरिका सहित पूरे विश्व के मन-मंदिर में छा गए। यानी, जो व्यक्ति के स्तर पर संभव था, वही राष्ट्र स्तर पर भी किया जा सकता है।

ईरान सरकार ने जारी किया मौत का आंकड़ा

ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों को लेकर पहली बार खामेनेई सरकार ने चुप्पी तोड़ी है। सरकार ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों पर की गई कार्रवाई के बाद पहली बार मरने वालों का आंकड़ा जारी किया है। लेकिन यह आंकड़ा अन्य एजेंसियों के अनुमानों से काफी कम है। सरकारी टेलीविजन पर गृह मंत्रालय और वेटरन्स मामलों की फाउंडेशन के बयानों के अनुसार, वहां 28 दिसंबर से चल रहे प्रदर्शनों के दौरान 3,117 लोग मारे गए। इनमें 2,427 आम नागरिक और सुरक्षा बल के जवान थे। हालांकि इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है।

वहीं, अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी ने 22 जनवरी की सुबह तक कम से कम 4,902 मौतों की पुष्टि की है। यह संगठन ईरान में वर्षों से प्रदर्शनों और अशांति पर सटीक रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। अन्य मानवाधिकार समूहों ने भी सरकारी आंकड़ों से काफी अधिक संख्या बताई है। अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, लगभग 26,500 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

यह सत्य है कि हम अभी 4.2 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था हैं-विश्व की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति। भले ही हम अमेरिका, चीन और कई मामलों में यूरोप से पीछे हैं, किंतु हमारी ‘सॉफ्ट पावर’, यानी हमारे विचार, धन, व्यवहार, विश्व के साथ सम्मानपूर्ण संबंध विकसित करने का गुण तथा कठिनाई में सहायता करने की भावना बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इसके अलावा, हमारे पास योग, आयुर्वेद और विश्वस्तरीय चिकित्सा सेवाएं हैं। मनुष्य की दो प्रमुख आवश्यकताएं हैं-भोजन और स्वास्थ्य, जो हमारे पास विश्व में सर्वाधिक उपलब्ध हैं। सबसे बड़ी बात, हमारे पास हजारों वर्ष से विश्व को एकजुट करने वाला मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है। विचारों की शक्ति सर्वोपरि होती है।

तात्पर्य यह है कि एक ओर भारत को समृद्ध, सशक्त और महान बनाना तथा दूसरी ओर विश्व में सहायता, समन्वय, बंधुत्व और परिवार-भाव का प्रसार करना—इन दोनों पर चलें, तो निश्चय ही सफलता मिल सकती है। संपूर्ण मानवता को संभालना, उसे धैर्य बंधाना, मनोबल बढ़ाना तथा अमेरिका-चीन जैसी शक्तियों के विरुद्ध एकजुट होकर खड़े होने का साहस देना, यह एक बड़ा विचार है। एक और महत्वपूर्ण बात। इतना विशाल कार्य केवल सरकारों पर छोड़ना उचित नहीं। सरकारों की भूमिका निश्चय ही महत्वपूर्ण है, किंतु कई क्षेत्रों में उनकी भूमिका सीमित रहती है। राजनीतिक उठापटक के कारण सरकारों को चलाना स्वयं में इतना जटिल है कि वे नए विचार विकसित करने, आवश्यक तंत्र गढ़ने तथा विश्वास व सद्भावना पर आधारित कल्पनाएं साकार करने में असमर्थ रहती हैं। इसलिए राष्ट्रवादी संगठन, अन्य वैश्विक संस्थाएं, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दृष्टिकोण के प्रति समर्पित हों, ऐसे व्यक्ति और संस्थान मिलकर इस दैवीय दायित्व को निभाने की तैयारी करें।

यूरोप, जो 18वीं शताब्दी तक विश्व का नेतृत्वकर्ता था, अब पूर्णतः पस्त हो चुका है। अमेरिका, जिसने 20वीं शताब्दी में नेतृत्व किया, अब ढलान पर है और नई समस्याओं का केंद्र बन गया है। चीन के पास विविधता में एकता, एकात्म मानवदर्शन या वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे विचार नहीं हैं, न ही उसके 4,000 वर्ष के इतिहास में ऐसा अनुभव ही है। यह विचार-धन और ऐतिहासिक अनुभव केवल भारत के पास है। इसलिए भारत को अपने ईश्वरीय एवं प्रकृति-जन्य दायित्व को स्वीकार करते हुए विश्व सहयोग एवं नेतृत्व के लिए पूर्ण तैयारी में जुट जाना चाहिए।

राष्ट्रवादी संस्थाएं और व्यक्ति शुरू में केवल यह चिंतन करें-‘यह कार्य हमारा है।’ एक बार यह प्रारंभ हो गया, तो भूमिकाएं, मार्ग और योजनाएं स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाएंगी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि भारत यह दायित्व नहीं निभाएगा, तो शून्य नहीं रहता। विश्व कोई ऐसा नेतृत्व खोज लेगा, जो सुखद नहीं होगा। नेतृत्व करना या पीछे चलना-हमें दोनों में से एक चुनना होगा। इसमें स्वाभाविक है नेतृत्व चुनना। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे, तो किसी और के पीछे चलना पड़ेगा। इसलिए इस विषय पर गहन चिंतन आवश्यक है।

Topics: ‘ग्लोबल साउथ’मानवीय दृष्टिकोणवसुधैव कुटुम्बकम्#विश्व पटल पर भारतपाञ्चजन्य विशेषठोस पहचाननई उड़ानरणनीतिक संयमआक्रामक नीतियांसंरचनागत प्रक्रियासॉफ्ट पावरस्वामी विवेकानंदटैरिफ की बाढ़वैश्विक पटलदैवीय दायित्वएकात्म मानवदर्शनविचार की शक्ति
सतीश कुमार
सतीश कुमार
राष्ट्रीय सह संगठक स्वदेशी जागरण मंच [Read more]
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