संघ शताब्दी वर्ष : रामराज का होता आगाज
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संघ शताब्दी वर्ष : रामराज का होता आगाज

क्या इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है? पढ़िए हनुमान, रामराज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से भारत व विश्व में बदलाव पर आलेख।

Written byअरूण कुमार जैनअरूण कुमार जैन — edited by Shivam Dixit
Jan 22, 2026, 09:00 pm IST
in संघ @100

इतिहास अपने को दोहराता है, चाहे वह युग हो, काल हो, विकास हो, विनाश हो, जन्म हो, मरण हो या अन्य कोई भी प्रकार हो, यह इस सृष्टि का नियम है। अगर सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात कुछ स्थायित्व है तो वह है, पंचतत्व या ब्रह्मांड जिसमें कुछ ऐसी प्राकृतिक ईश्वरीयरूपा शक्तियां जो जागृत भी हैं, अमर भी हैं और सृष्टि रचयिता के अंश के रूप में आज भी विद्यमान हैं व जानी जाती हैं। प्राचीन संस्कृति व ग्रंथों का अध्ययन करने के पश्चात निष्कर्ष यह निकलता है कि हर काल-चक्र के प्रत्येक युग में इतिहास स्वयं को दोहराता है।

इतिहास के अध्ययन के पश्चात यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हनुमान जी हर युग, हर काल में अनेक रूपों में, विशेषकर सहयोगी के रूप में अस्तित्व में रहते हैं, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि रामायण काल में प्रभु श्रीराम ने अपने परम भक्त हनुमान को निमित्त बनाकर ही राक्षसी प्रवृत्ति के अहंकारी रावण पर विजय पाई थी।

रामायण-महाभारत काल की या हजारों वर्षों की हम चर्चा न भी करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से पहले के पिछले 200 वर्षों के इतिहास को खंगालें तो भारत की आजादी से पहले की घटनाएं, जैसे – मेरठ की क्रांति, जलियांवाला बाग हत्याकांड, क्रांतिकारियों के शहीद होने की गाथाएं तथा संघ की स्थापना के पश्चात नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे आध्यात्मिक महामानव की उत्पत्ति, श्रीराम का जन्मभूमि में प्रकटीकरण, जन्म स्थान का खुलना, मंदिर की स्थापना, अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का उस पद तक पहुंचना आदि ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जहां पर हनुमान जी की उपस्थिति, उनकी शक्ति, उनका आशिर्वाद, उनके अतिशय इत्यादि को हर समय साक्षात रूप में अनुभूत और महसूस किया जा रहा है।

इतिहास गवाह है कि सृष्टि की रचना जब से ईश्वरीयरूपी प्रकृतिसत्ता द्वारा हुई है तभी से केवल दो प्रकार की प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं जिन्हें हम तामसिक या सात्विक, सकारात्मक या नकारात्मक, देवता या राक्षसी जैसे अन्य स्वरूपों में देखते हैं, जानते हैं, महसूस करते हैं और हर प्रकार की क्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर अनुभव भी करते हैं कि जिसके बिना शायद यह जीवन भी अस्तित्व में न रह सके।

प्राचीन काल से इतिहास में यह देखने को मिलता है कि जब-जब इन प्रवृत्तियों के प्रतिरूपों में अंसतुलन जैसी स्थिति उत्पन्न होती है तो ईश्वरीयरूपी प्रकृतिसत्ता किसी न किसी शक्तिपिंड के रूप में अपने अंश को प्रतिनिधि बनाकर पुण्य व पवित्र आत्मा रूप में किसी को भेज देती है, जो मानव की तरह ही जीवन-मृत्यु के चक्र से बंधी होती है, जैसे – श्रीराम, महर्षि वाल्मीकि, श्रीकृष्ण तथा अन्य। इसके अलावा कुछ पुण्य व पवित्र आत्माएं चैकीदार व पहरेदार के रूप में जागृत अवस्था में इस ब्रह्मांड में रहती हैं जो जागृत रहती हैं और आज भी हैं तथा आवश्यकता के समय यदा-कदा आने वाले शक्तिपिंडों की भी सेवा में रत रहती हैं, जैसे – हनुमान, वेदव्यास, परशुराम विभीषण इत्यादि।

वैश्विक स्तर पर आज जिस प्रकार की स्थितियां निर्मित हुई हैं, ऐसे में यह देखने को मिल रहा है कि इंसानियत, मानवता एवं करुणा का नितांत अभाव हो गया है। महाशक्तियां अपने से कमजोर देशों के संसाधनों पर कब्जा कर लेना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें जो कुछ भी करना पड़ रहा है, करने के लिए तैयार हैं और कर भी रही हैं। बाहरी तौर पर देखने में लगता है कि महाशक्तियों में आपस में द्वंद्व चल रहा है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि महाशक्तियां आपस में मिलीभगत करके अपनी सुविधा एवं योजना के अनुरूप अपना ऊल्लू सीधा कर रही हैं। पूरे विश्व को लगता है कि दुनिया विश्व युद्ध की कगार पर है किंतु ऐसा हो नहीं पा रहा है। त्रेतायुग में लंकापति रावण ने छल से माता जानकी का अपहरण किया था। कमोबेश आज भी वह स्थिति देखने को मिल रही है कि एक महाशक्ति द्वारा एक देश के राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण कर लिया गया है। ऐसी स्थिति में पूरे विश्व में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आखिर भविष्य का विश्व कैसा होगा? ईरान के आंतरिक हालात खराब हैं, रूस-यूक्रेन, इजरायल-फिलीस्तीन, चीन-ताईवान का मामला अभी जैसे था, वैसे ही पड़ा है। इसी बीच वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और क्यूबा इत्यादि का भी संकट दुनिया के सामने आ गया है। ऐसा महसूस हो रहा है कि विश्व युद्ध के शंखनाद होने से पहले ही परिस्थितियां व अमानवीय व्यवहारों के चलते वैश्विक युद्ध चालू हो चुका है जिससे होने वाले नुकसान की कल्पना करते ही शरीर में सिहरन सी दौड़ने लगती है। तामसिक या नकारात्मक मानसिकता के लोग जो अशांत रहते हैं, ऐसी सात्विक सकारात्मक ईश्वरीय शक्तियों को जानकर भी अंजान बने रहते हैं तथा अपनी अंहकारी जिज्ञासा को राजनीतिक, कूटनीतिक व धूर्तनीतिक कृत्यों के द्वारा अपने नकारात्मक विचारों को थोपने व झूठे प्रपंचों का सहारा लेकर अस्थायी असफल प्रयास करते रहते हैं जबकि सात्विक व्यक्ति सत्य पर आधारित इतिहास, प्राचीन सभ्यता संस्कृति तथा पूर्व की शक्तियों को संज्ञान में रखकर ईश्वरीयरूपी प्रकृतिसत्ता के साथ चलायमान रहते हैं और चित्त चैन से रहते हैं।

ऐसे माहौल में पूरे विश्व की नजरें घुमा-फिराकर भारत की ही तरफ आती हैं क्योंकि भारत यदि रूस के साथ है तो यूक्रेन के साथ भी उसकी सहानुभूति है। इजरायल के साथ है तो मुसीबत में फिलीस्तीन की भी मदद करता है। महाशक्तियों से भी भारत तालमेल बनाकर रखना चाहता है और रख भी रहा है। भारत की यदि इस प्रकार की सोच है तो वह अचानक ही नहीं बनी है। इस प्रकार की सोच आदिकाल से ही भारतीय सभ्यता-संस्कृति में विराजमान है। भारत के ऋषियों-मुनियों, साधु-संतों, विद्वानों, दार्शनिकों एवं चिंतकों ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात कही है यानी भारत पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानता है इसलिए भारत में आदिकाल से ही यह भावना विद्यमान है कि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न रहे। भारत भूमि की सभ्यता-संस्कृति में आदिकल से ही ‘¬ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग् भवेतः।।’ की भावना विद्यमान रही है यानी सभी सुखी हों, स्वस्थ हों, आनंदित हों और कोई भी दुखी न रहे। इस श्लोक से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत पूरे विश्व के बारे में क्या सोचता है। इसके अतिरिक्त भारतीय सभ्यता-संस्कृति के बारे में और विचार किया जाये तो भारत भगवान महावीर के सिद्धांतों ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’’ एवं ‘‘जियो और जीने दो’’ पर चलने वाला देश है। वैसे भी, यदि गंभीरता एवं जिम्मेदारी से विश्लेषण किया जाये तो अपने आप यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी दुनिया की शांति का रहस्य इन्हीं दोनों सिद्धांतों में निहित है। यहां पर यह बताना भी मैं अपना फर्ज समझता हूं कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति में पुनर्जन्म की मान्यता बहुत व्यापक स्तर पर स्वीकार की गयी है इसलिए भारत में जीवित लोगों के साथ परलोकवासियों की भी पूजा-अर्चना की जाती है यानी जो समाज परलोकवासियों का ध्यान रखता है तो उसके बारे में यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि जीवित लोगोें के प्रति क्या दृष्टिकोण होगा? पूरी दुनिया एवं भारत की संस्कृति में कुछ इस प्रकार का अंतर देखने को मिलता है।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि आज का भारत कमोबेश आदिकाल से चली आ रही सभ्यता-संस्कृति, रीति-रिवाजों, जीवनशैली एवं परंपराओं पर पूरी तरह अमल कर रहा है। भगवान महावीर के सिद्धांत आज भारतवासियों को प्रेरणा दे रहे हैं। विगत कुछ वर्षों में घटित घटनाओं पर यदि ध्यान कंेद्रित किया जाये तो स्पष्ट रूप से देखने में आता है कि भारत में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है। इन बदले हुए नजारों को देखकर अब पूरे देश में इस बात की चर्चा होने लगी है कि संभवतः भारत में रामराज का आगाज हो गया है। मुझे यह बात लिखने में जरा भी संकोच नहीं है कि इस रामराज की चर्चा के पीछे राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कठिन परिश्रम एवं साधना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की बात की जाये तो ईश्वरीय कृपा से ठीक उसी प्रकार हुई, जैसे- पृथ्वी पर दुष्टों एवं पापियों का नाश करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के आगमन से पूर्व महाबली हनुमान, विभीषण सुग्रीव, निषादराज, नल-नील एवं अन्य योद्धाओं का आगमन हो चुका था यानी प्रभु श्रीराम से आने से पहले भूमिका तैयार हो चुकी थी, मैदान सज चुका था। रामराज की स्थापना के आगाज के संदर्भ में यह बताना भी उचित होगा कि विभिन्न विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों के सदस्य बहुत संख्या में हृदय परिवर्तन होने के कारण, जिन्हें उनकी पार्टियों के लोग विभीषणो की संज्ञा देते हैं। रामराज स्थापना की विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टी को अपना सहयोग कर रही हैं जो एक शुभ संकेत है।

बिना किसी लाग-लपेट के यदि मूल्यांकन एवं विश्लेषण किया जाये तो ईश्वरीय इच्छा से भारत में भी कुछ वैसा ही देखने को मिला अन्यथा 100 वर्ष पहले 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के ही दिन संघ की स्थापना का विचार परम पूज्य डाॅ. हेडगेवार जी के मन में नहीं आता। प्रभु श्रीराम को ध्यानस्त लेते हुए हनुमान जी को निमित्त मान कर प्रेरणा पाई व अग्रसर हुए। विजयदशमी के दिन संघ स्थपना को निश्चित रूप से ईश्वरीय प्रेरणा ही माना जाना चाहिए। आज जो कुछ भी रामराज जैसा देखने को मिल रहा है, ईश्वरीय कृपा एवं प्रेरणा से उसका आगाज नागपुर में 1925 में ही हो गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वर्तमान समय में शताब्दी वर्ष चल रहा है, इसलिए रामराज की अवधारणा और भी तेज हो रही है। 1925 से लेकर अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस प्रकार राष्ट्र के प्रति समर्पित एवं जिम्मेदार स्वयंसेवकों का निर्माण किया है, वही रामराज के आगाज का आधार बने हैं। ये स्वयंसेवक ठीक उसी प्रकार राष्ट्र एवं समाज के लिए काम कर रहें हैं जिस प्रकार त्रेतायुग में हनुमान, सुग्रीव, निषादराज, नल-नील, जामवंत, विभीषण एवं अन्य येाद्धाओं ने किया था।

वैसे भी, देखा जाये तो देश में रामराज के आगाज की चर्चा यूं ही नहीं हो रही है। इस चर्चा के पीछे कुछ ठोस कारण हैं। राम मंदिर निर्माण का मुद्दा पिछले लगभग 500 वर्षों से उलझा था, उसका समाधान बिना किसी विवाद, हिंसा एवं उत्पात के न्यायिक हस्तक्षेप से पूरा हुआ है। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में यदि अतीत में जाया जाये तो राजनीतिक दृष्टि से संघ के विपरीत विचारधारा वाले लोगों का समर्थन, ताला टूटना, खुलना, राम मंदिर के लिए आंदोलन होना, गुंबद टूटना, हटना, न्यायिक हस्तक्षेप, देश के महत्वपूर्ण लोगों की गवाही तथा हनुमान भक्त माननीय अशोक सिंघल जी का नेतृत्व, संकट मोचन हनुमान मंदिर से विश्व हिंदू परिषद के केंन्द्रीय कार्यालय का संचालन, महंत परमहंस रामचंद्र दास जी का बाल्यकाल से हनुमान भक्त होना तथा वर्ष 1949 में श्रीराम की मूर्ति के प्रकटीकरण के समय से ही न्यायालय में पूजा अधिकारों हेतु संघर्ष, 70 वर्षों से अनवरत लड़ते रहना इत्यादि एवं अन्य तमाम झंझटों के बीच प्रभु श्रीराम के मंदिर का निर्माण हुआ है तो इसे कोई ईश्वरीय इशारा, प्रेरणा या चमत्कार ही माना जाना चाहिए। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

भारत में एक बहुत प्राचीन कहावत है कि इतिहास स्वयं को दोहराता है यानी रामराज की धुरी तब भी अयोध्या थी और आज भी उसी को श्रेय दिया जा रहा है। हनुमान एवं विभीषण तब भी थे और आज भी हैं। हनुमान जी को धरती पर साक्षात देवता माना जाता है। इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हैं जिनसे रामराज की अवधारणा को बल मिलता है। 1998 में हनुमान मंदिर में बम फिस्फोट की एक घटना हुई थी, जब एक बंदर ने विस्फोट को निष्क्रिय कर दिया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया था। इस घटना को ‘मिरेकल आफ अयोध्या’ के नाम से जाना जाता है। उस समय एसटीएफ के अधिकारी अविनाश मिश्रा ने बताया था कि बंदर ने तार हटाकर मंदिर को विस्फोट से बचा लिया था। इस घटना को हनुमान जी की कृपा से जोड़कर देखा जाता है। कोठारी बंधु जिस समय अयोध्या में गुंबद पर चढ़े थे तो मंदिर का ध्वज जब एक भाई से छूटा तो दूसरे ने थाम लिया और जब दूसरे भाई के हाथ से छूटा तो एक बंदर ने थाम लिया था। इस घटना को भी हनुमान जी कृपा से जोड़ा जाता हैै।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन एक बार भारत दौरे पर आये तो घूमते-घूमते बाबा नीम करोली के आश्रम पहुंच गये, वहां उन्हें हनुमान जी की मूर्ति उपहार में विशेष आशीर्वाद स्वरूप मिली। वहां उन्हें हनुमान जी की कृपा का एहसास हुआ और उन्होंने इसकी चर्चा भी की। बिल क्लिंटन को इस बात का भी एहसास हुआ कि हनुमान जी वास्तव में धरती पर साक्षात जीवित देवता हैं। इस प्रकार की ऐसी अनेक घटनाएं समय-समय पर घटित हुई हैं, जो ईश्वरीय प्रेरणा की तरफ इशारा करती हैं। इस प्रकार हनुमान जी ने विश्व की ताकतवर शख्सियत को अपनी उपस्थिति व शक्ति का आभास कराया था।

1925 में हनुमानरूपी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को तो अब भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व मानने लगा है कि इसकी स्थापना भारत एवं पूरे विश्व में रामराज की स्थापना के लिए ही ईश्वरीय प्रेरणा से हुई है। पूरे विश्व में इस समय जिस प्रकार का वातावरण है, ऐसे में लोग यह भी कहने लगे हैं कि कलयुग अपने प्रथम चरण में है किंतु पापाचार, दुराचार एवं लूटपाट की वजह से अपने अंतिम चरण का अभास कराने लगा है। महाशक्तियां जिस प्रकार दूसरे देशों को लूटने एवं निचोड़ने में लगी हैं। ऐसे में यह भी कहा जाने लगा है कि महाशक्तियां रावण जैसी राक्षसी प्रवृत्ति पर उतर आई हैं। जहां रावण जैसी प्रवृत्ति हावी होगी, वहां राम जैसी प्रवृत्ति के लोगों को आगे आना ही होगा। कहा तो यहां तक जा रहा है कि महाशक्तियां अपने आपको चाहे जितना भी शातिर समझ लें किंतु एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब वे अहंकारवश मतिभ्रष्ट होकर आपस में लड़कर नष्ट होने की कगार पर पहुंच जायेंगी। निश्चित रूप से यह सब ईश्वरीय कृपा से ही होगा। यह भी उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि एक दिन धरती पर निश्चित रूप से सात्विक प्रवृत्तियों से परिपूर्ण शक्तियों का ही शासन होगा। सात्विक प्रवृत्ति की बात की जाये तो उसकी उम्मीद वर्तमान परिस्थितियों में भारत सहित पूरी दुनिया में मात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, स्वयंसेवकों और उसके अनुयायियों से ही की जा सकती है जिसके आसार पूर्ण रूप से दिख रहे हैं।

जिस तरह रामराज के समय कोई जात-पात, भेदभाव या अन्य कोई विघटन वाली बात नहीं थी, उसी तरह संघ में भी जाति की चर्चा नहीं होती। स्वयंसेवक तो अपने नाम के आगे जाति लिखते भी नहीं। वैसे भी, रामराज की बात की जाये तो न्याय, समृद्धि, शांति, सत्य, नैतिकता, प्रजा की सुख-सुविधा ही शासन-प्रशासन का आधार थी, उसी प्रकार की बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं स्वयंसेवक भी करते हैं। केद्र सरकार एवं राज्यों में आज जहां भी स्वयंसेवक सत्ता में हैं, वे रामराज के आदर्शों, मूल्यों एवं सिद्धांतों को ही आधार बनाकर आगे बढ़ रहे हैं। स्वयंसेवकों द्वारा संचालित सरकारों में रामायण-महाभारत काल की नैतिकता, करुणा, इंसानियत एवं अन्य गुण भरपूर देखने को मिल रहे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, प्रयागराज में कुंभ जैसा विराट आयोजन, उपग्रहों को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित करना, चंद्रयान और मंगलयान अभियानों की सफलता, जी-20 समूह की अध्यक्षता, कोरोना काल में स्वदेशी वैक्सीन का निर्माण, गांव-गांव सड़कें, नेट पर देश-दुनिया की जानकारियां, पारंपरिक जीवनशैली की तरफ युवाओं का बढ़ना, प्रकृति एवं पंचतत्वों से लगाव आदि सहित तमाम ऐसे बिंदु हैं जिनसे भारत के मान-सम्मान एवं अस्मिता को चार चांद लगा है। मुझे यहां यह बात लिखने में प्रसन्नता हो रही है कि यह सब स्वयंसेवकों के माध्यम से ही संभव हुआ है और यह बात भी अपने आप में पूर्णरूपेण सत्य है कि स्वयंसेवकों के सभी कार्य ईश्वरीय प्रेरणा से ही संपन्न होते हैं।

यहां एक और बात जानने और समझने योग्य है कि न ही रामायण काल में और न ही महाभारत काल में हनुमान जी ने अपने कार्यों का श्रेय लिया या अपने नाम को आगे रखा बल्कि जिस शक्तिपिंड के भी सहयोगी बने उसी की कृपा को प्रसाद स्वरूप मानकर श्रद्धा के साथ सेवा करते रहे। इन बातों को आज भी जब कोई हनुमान उपासक, संत, तपस्वी तथा अन्य अपने ऊपर किसी शक्ति के होने का पूर्वाभास करता है तो वह श्रीराम या श्रीकृष्ण या अन्य किसी भी शक्तिपिंड के अंश की कृपा ही मानता है। ऐसा ही हनुमान जी चाहते भी हैं, ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुयायी ईश्वरीय कृपा को साक्षात मानकर बिना किसी लाग-लपेट या लोभ-लालच के सामाजिक उत्थान व राष्ट्र निर्माण, भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ बनाने के लक्ष्य को पाने की रामराज की कल्पना के साथ पिछले 100 वर्षों से अपने आप को सौभाग्यशाली निमित्त मानकर अनवरत संघर्ष करते हुए अग्रसर हो रहे हैं क्योंकि यह ईश्वरीय कार्य भी प्रभु श्रीराम व हनुमान जी कृपा से ही संभव हो पा रहा है।

शताब्दी वर्ष में आम लोगों के बीच चर्चा के लिए पंच परिवर्तन के रूप में जिन मुद्दों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चुना है, वे हैं- सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन (नैतिक मूल्य आधारित परिवार) स्वदेशी आधारित जीवनशैली एवं नागरिक कर्तव्यबोध। मुझे तो लगता है कि पंच परिवर्तन के बिंदु भी ईश्वरीय प्रेरणा से ही तय हुए हैं। कुल मिलाकर भारत सहित पूरे विश्व में जिस प्रकार स्थितियां निर्मित हुई हैं उससे भारत में रामराज का आगाज तो हो ही गया है, साथ ही साथ पूरे विश्व में रामराज स्थापित होने के आसार हैं। निश्चित रूप से यह सब ईश्वरीय प्रेरणा एवं कृपा से हो रहा है। कई बार तो तामसिक प्रवृत्ति के लोग विज्ञान का सहारा लेकर नैतिक मृल्यों रहित विकास को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं और ऊल-जुलूल टिप्पणियां आध्यात्मिक जगत के विषय में करते रहते हैं। यह जानते हुए भी कि विज्ञान द्वारा न तो पेट की भूख और न ही किसी व्यक्ति का या यूं कहें कि किसी भी जीव का एक सांस घटा-बढ़ा सकते हैं जबकि हमारे संतों-महात्माओं ने प्राचीन काल से लेकर आज तक भी दोनों ही पहलुओं को योग व यौगिक क्रियाओं के माध्यम से नियंत्रित किया हुआ है। हिमालय की बर्फीली कंदराओं में आज भी ऐसी पुण्य और पवित्र आत्माएं अपनी उपस्थिति बनाये हुई हैं जहां जीवन की कल्पना करना भी असंभव लगता है। वैश्विक घटनाक्रम के इशारों को अगर जाना एवं समझा जाये तो यह अब राज नहीं रह गया है कि हनुमान जी ने इतनी जमीन तैयार कर दी है कि रामराज का आगाज तो हो ही चुका है। भारत में रामराज का आधार यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं तो विश्व में भी रामराज का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही बनेगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी और न ही इसे इंकार करने की स्थिति में कोई है।

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अरूण कुमार जैन
अरूण कुमार जैन
इंजीनियर, पूर्व ट्रस्टी श्रीराम-जन्मभूमि न्यास, विहिप एवं पूर्व केन्द्रीय कार्यालय मंत्री, भा.ज.पा. [Read more]
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