कुटुम्ब प्रबोधन : हावी न हो पश्चिमी हौव्वा
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होम भारत

कुटुम्ब प्रबोधन : हावी न हो पश्चिमी हौव्वा

आज जब पश्चिमी प्रभाव परिवारों और दाम्पत्य को विखंडित करने पर तुले हुए हैं, ऐसे में भारतीय दृष्टि से नारी, विवाह और कुटुम्ब की पुनर्व्याख्या अत्यंत आवश्यक हो गई है

Written byडॉ. वरुण गुलाटीडॉ. वरुण गुलाटी
Jan 21, 2026, 04:58 pm IST
in भारत, कुटुम्ब प्रबोधन

 

भारतीय मनीषा में ‘कुटुम्ब’ को मात्र रक्तसंबंधों का समुच्चय नहीं, अपितु एक सजीव, सुसंस्कृत एवं धर्मनिष्ठ इकाई के रूप में मान्यता प्राप्त है। ‘कुट’ अर्थात् एकत्रित होना तथा ‘उम्ब’ अर्थात् पोषण करने वाली शक्ति-इन दोनों से उद्भूत ‘कुटुम्ब’ वह आदर्श व्यवस्था है जहां व्यक्ति के संस्कारों, मूल्यबोध और धर्मचेतना का प्रथम अंकुरण होता है। इसी प्रकार ‘अर्धांगिनी’ का स्थान केवल सामाजिक या पारिवारिक संरचना तक सीमित नहीं, अपितु वह आत्मिक तथा सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक है। ‘अर्धांगिनी’ शब्द एक औपचारिक संबोधन नहीं, वरन् एक आध्यात्मिक अवधारणा है, जो स्त्री और पुरुष को एक ही आत्मा का अर्धभाग मानती है।

बृहदारण्यकोपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य जब अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं-“सा वा अयं आत्मा, पत्नी वा आत्मा”-तो वे इस बात की स्थापना करते हैं कि पत्नी केवल सहचरी नहीं, अपितु आत्मसत्ता की सहयात्री है। तैत्तिरीय संहिता में भी यज्ञ के संदर्भ में पत्नी को ‘सहधर्मिणी’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, उसकी उपस्थिति के बिना कोई भी वैदिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। इस प्रकार, स्त्री केवल गृहिणी नहीं, ‘गृह लक्ष्मी’ है। वह उस लौकिक शक्ति का मूर्त रूप है, जो कुटुम्ब का सृजन करती है, उसे संस्कारित करती है और समाजोपयोगी पीढ़ियां गढ़ती है।

भारतीय दृष्टि

पश्चिमी समाज में स्त्री को दीर्घकाल तक न केवल अधिकारों से वंचित रखा गया, बल्कि उन्हें अस्तित्वहीन या अपवित्र तक घोषित कर दिया गया। ग्रीक दर्शन में प्लूटो और अरस्तु जैसी बुद्धिजीवी परंपरा ने स्त्री को आत्मारहित और हीन समझा। चर्च ने उन्हें ‘ईव’ के पाप का मूल स्रोत बताकर युगों तक नरक का द्वार बना कर रखा। यूरोप की ‘सभ्य’ भूमि पर स्त्रियों को मत देने का अधिकार भी तब मिला जब भारत में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त कर चुकी थीं और सावित्रीबाई फुले अंधकार में शिक्षा का दीप जला चुकी थीं।

पश्चिमी समाज को जब यह बोध हुआ कि उन्होंने स्त्री को युगों तक दरकिनार रखा है, तब वहां आत्मग्लानि के बजाय आंदोलन शुरू हुए-“सफ्राजेट मूवमेंट”, जिसमें नारियां पुरुषों से यह निवेदन करती रहीं कि कृपया हमें वोट देने की अनुमति दीजिए, बेट्टी फ्रायडन और उनकी “सेकेंड वेव फेमिनिज़्म,” जिसमें “किचन सिंक” और “लॉन्ड्री बैग” के खिलाफ संघर्ष चला, और “थर्ड वेव फेमिनिज्म”, जिसमें स्त्रीत्व की परिभाषा “रील्स, बॉडी पॉजिटिविटी और जेंडर न्यूट्रैलिटी” के पायदान पर आकर ठहर गई। आज वहां कुछ स्त्रियां ‘पुरुष’ कहलाने के अधिकार के लिए संघर्षरत हैं, और कुछ पुरुष ‘स्त्री’ होने का पुरस्कार पाने हेतु कचहरी का सहारा ले रहे हैं। इस विषमता को वे ‘प्रगतिशीलता’ की संज्ञा देते हैं।

इसके विपरीत, भारत में स्त्री को अधिकार देने का कार्य सड़कों पर किए गए प्रदर्शन, नारेबाजी या विधायिका के दबाव का परिणाम नहीं रहा, यह तो भारतीय संस्कृति की सहज चेतना से उपजा एक सांस्कृतिक जागरण था। वैदिक वाङ्मय से लेकर भक्तिकाल और स्वतंत्रता संग्राम तक, भारतीय नारी ने स्वतः अपनी भूमिका और अधिकारों की प्रतिष्ठा की-बिना किसी ‘ग्लोरिया स्टाइनम’ के नारों के। स्वतंत्रता संग्राम में नारी केवल ‘प्रेरणा’ नहीं रही, अपितु क्रांतिकारी भी थी-सरोजिनी नायडू की काव्यात्मक शक्ति से लेकर कमला देवी चट्टोपाध्याय के समाज-संस्कार और भीकाजी कामा की अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रचेतना तक, भारतीय स्त्री ने देश की चेतना को आलोकित किया।

पश्चिमी नारीवाद

आज जब हम स्वतंत्रता के अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं, नारी केवल पुरुष की समकक्ष नहीं, कई क्षेत्रों में उससे आगे निकल चुकी है। चाहे कल्पना चावला जैसी महिलाओं का अंतरिक्ष में योगदान हो, अभिलाषा बराक जैसी स्त्रियों का सेना में परचम फहराना हो, टीसीए अनुराधा का इसरो में वैज्ञानिक नेतृत्व हो, या निर्मला सीतारमण जैसी महिलाओं की नीति-निर्माण में सक्रिय भागीदारी-भारतीय स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया है कि उसे सशक्त बनाने के लिए न तो पिंजरे तोड़ने की जरूरत पड़ी, न ही मुखर नारे लगाने की।

वह स्वयं ही शक्ति है, और उसी आत्मशक्ति से उसने सृजन और संघर्ष दोनों में विजय प्राप्त की है। परन्तु इसी अमृतकाल की वेला में, जब भारत में नारी अपनी साधना, सामर्थ्य और संकल्प के बल पर गरिमा के शिखर पर प्रतिष्ठित हो चुकी है, उसी समय एक अन्य विचारधारा ने समाज की मूल आधारशिला-कुटुम्ब-को भीतर से विघटित करने का सुनियोजित षड्यंत्र रचना प्रारंभ किया है। यह विचारधारा कोई प्रकट आक्रांता नहीं है, बल्कि “वोकिज्म”, “उदार नारीवाद” और “वामपंथी समता-वाद” के सुनियोजित, चुपचाप परंतु गहरे घाव करने वाले स्वरूप में आई।

मीडिया, शिक्षा, फैशन और उपभोक्तावाद-ये सब मिलकर ‘संयुक्त परिवार’ को एक पिछड़ी परंपरा, गृहिणी को एक शोषित प्राणी और समर्पित पत्नी को मानसिक रूप से दबी बताने लगे। जैसे स्त्री का घर में रहना आधुनिकता के विरुद्ध कोई ‘अपराध’ हो। वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य में पश्चिम प्रेरित उदार नारीवाद ने नारी स्वाधीनता को संबंधविहीनता का पर्याय बना दिया है।

वैचारिक आक्रमण

“Bombay Begums” जैसे धारावाहिक प्रेम को मानसिक गुलामी, और परिवार को दमनकारी संरचना बताकर स्त्री को आत्मविकास के नाम पर जड़ों से काटते हैं। इंस्टाग्राम की रीलें “Be a queen, don’t need no man” जैसे नारे उछालती हैं, जैसे कि पुरुष-विमुखता ही सशक्तिकरण हो। यह विमर्श सुनियोजित रूप से ‘अधिकार’ के नाम पर स्त्री को आत्ममुग्ध, असंयमित और अंततः अकेला बना रहा है-यही इसका षड्यंत्र है।

इस तथाकथित ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के प्रतिफलस्वरूप आज संबंध-विच्छेद एक नवीन उपलब्धि समझा जाने लगा है, एकल मातृत्व (सिंगल मदरहुड) को ‘साहसिक निर्णय’ की संज्ञा दी जा रही है और भरण-पोषण राशि (एलिमनी) एक पुरस्कार जैसी बन गई है-मानो विवाह का परम लक्ष्य ही अधिकतम मुआवजा प्राप्त करना हो। ऐसी मानसिकता वाले लोगों के लिए विवाह अब सप्तपदी का पवित्र रिश्ता नहीं, बल्कि “यदि मन खिन्न हुआ तो अगला परिचय-मंच (डेटिंग ऐप) खोल लो” जैसी क्षणिक सहजीवन की चौखट बन चुका है।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स सर #SmashPatriarchy ट्रेंड कराना, एक प्रमुख अभिनेत्री का टी-शर्ट यह प्रचार करना है कि “पितृसत्ता को तोड़ दो” (हालांकि वह स्वयं करोड़ों के विज्ञापन अनुबंध एक पुरुष बहुलता वाले उद्योग से लेती हैं), या नेटफ्लिक्स जैसे मंचों पर हर पारिवारिक स्त्री पात्र को या तो उत्पीड़ित दिखाना या फिर विवाह को ही ‘गुलामी’ बताना-ये सब विमर्श के शस्त्र हैं।

अर्बन नक्सल, जिन्हें आजकल ‘अधिकार-कार्यकर्ता’ (Rights Activists) कहा जाता है, योजनाबद्ध ढंग से भारतीय नारी को ‘संग्रामशील पीड़िता’ की स्थायी भूमिका में स्थापित कर, पुरुष को जन्मसिद्ध शोषक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इनके लिए विवाह समस्याओं का समाधान नहीं, संघर्ष का रणक्षेत्र है। “पति-पत्नी के संबंध को खंडित कर, समाज को खंडहर बनाओ”-यही है इनकी वैचारिक योजना। वास्तव में यह कोई स्वतंत्रता आंदोलन नहीं, अपितु ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर मूल्यसंहिता के प्रति छद्म विद्रोह है। जिस भारतीय स्त्री ने मैत्रेयी और गार्गी की भांति वैदिक सभाओं में पुरुषों से शास्त्रार्थ किया, वही आज स्क्रीन पर ‘पति के तानों से तंग आकर वाइन पीती नायिका’ बन रही है-और इसे ‘प्रगतिशीलता’ कहा जाता है।

शिक्षा-नीति, पाठ्यक्रम, वेब-श्रृंखलाएं, फैशन प्रवृत्तियां, ये सभी केवल मनोरंजन या ज्ञान नहीं, एक सुनियोजित वैचारिक अभियान का भाग हैं। उद्देश्य स्पष्ट है: “भारतीय कुटुम्ब-व्यवस्था को इतना विखंडित कर दो कि पति-पत्नी का सम्बन्ध स्नेह का नहीं, संघर्ष का प्रतीक बन जाए; परिवार सजीव संबंधों की संरचना नहीं, केवल सुविधाभोगी इकाइयों का समूह रह जाए।” फलतः व्यक्ति संवेदना-युक्त मानव न रहकर केवल ‘कंटेन्ट-खपत’ मशीन बनकर रह जाए।

भारतीय दृष्टि से समाधान

अतः समय की आवश्यकता है कि हम अपने कुटुम्ब एवं संबंधों के आधारभूत मूल्यों को पुनः समझें और आत्मसात करें।

विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, ‘सप्तपदी’ के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य स्थायी, सहमति-आधारित भावनात्मक रिश्ता है, जिसकी सात प्रतिज्ञाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं: (1)धर्म का पालन साथ-साथ (2) परिवार की समृद्धि हेतु सहयोग (3) जीवनोपयोगी लक्ष्यों की पूर्ति (4) संतानों को शिक्षा एवं संस्कार देना (5) सुख-दुःख में भागीदारी (6) परस्पर स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना, और (7) जीवनपर्यंत साथ रहने की प्रतिज्ञा। यह सप्तपदी कोई रस्म नहीं, अपितु दाम्पत्य जीवन की आत्मा है।

आज आवश्यकता है कि पति-पत्नी दोनों इस सांस्कृतिक संबंध को केवल कर्तव्य नहीं, आनंद और आत्मिक विकास का माध्यम समझें। उदाहरणस्वरूप, जहां एक ओर डॉ. रितु करिधाल जैसी वैज्ञानिक मातृत्व और राष्ट्र-निर्माण में संतुलन का आदर्श प्रस्तुत करती हैं, वहीं अनुपम खेर और किरण खेर जैसे दम्पत्ति कला और जीवन में सहयोग का प्रेरणास्पद उदाहरण हैं। इसी प्रकार विक्की कौशल जैसे पुरुष अभिनेता, जो गृहकार्य को साझा कर्तव्य मानते हैं, युवा पीढ़ी के लिए संदेश हैं कि पुरुषत्व सेवा और संवेदनशीलता से क्षीण नहीं होता, अपितु परिपक्व होता है।

व्यावहारिक उपाय

  • पारिवारिक संवाद को पुनर्जीवित करें – पति-पत्नी के मध्य खुले मन से मंगल-संवाद ही विवादों का समाधान है।
  •  साझा उत्तरदायित्व निभाएं-गृहकार्य, संतान-पालन और आर्थिक नियोजन, सबमें सहभागिता हो।
  •  कर्तव्यपरक शिक्षा-शिक्षा केवल अधिकारों की सूची न बने, अपितु संबंधों में कर्तव्यों की भावना का भी समावेश हो।
  • मीडिया का विवेकपूर्ण चयन करें-वेबसीरीज़, धारावाहिक, रीलें-जो संबंधों को दमन और स्वतंत्रता के संघर्ष के रूप में चित्रित करती हैं, उनसे सजग रहें।
  •  विवाह पूर्व संस्कार-शिक्षा-विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में ‘दाम्पत्य धर्म’, ‘कुटुम्ब नीति’ जैसे व्यावहारिक पाठ्यक्रम हों, जिससे युवा संबंधों के प्रति परिपक्व दृष्टि विकसित कर सकें।
  • “सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्।” (यजुर्वेद, 36.24)-अर्थात् हम दोनों साथ-साथ यश और ब्रह्मतेज अर्जित करें। समग्रतः, स्त्री और पुरुष न तो प्रतिद्वन्द्वी हैं, न पराजय और विजय के खेमों में बंटे कोई युग्म-वे तो सृष्टि-चक्र के सहचर, जीवन-पथ के परस्पर पूरक अर्धांश हैं। नारी के अधिकार उसके दायित्वों से कभी टकराते नहीं; वे तो उन्हें प्रकाशित करते हैं-जैसे दीपक की लौ को घी पोषित करता है। आज की अनिवार्यता है-एक ऐसी “समर्थ कुटुम्ब व्यवस्था” की पुनर्रचना, जो “बल, शील, ओज, धैर्य, युक्ति, बुद्धि, दृष्टि, दक्षता” जैसे अष्टसद्गुणों से समन्वित हो, और “भय, स्वार्थ, अहंकार, आलस्य, मिथ्या सामाजिक मान्यताएं तथा बौद्धिक जड़ता” जैसे षड्दोषों से रहित हो।
  • यह कुटुम्ब-नीति तभी स्थिर रह सकेगी जब हम संबंधों की पुनर्रचना भारतीय ऋ षि-दृष्टि, धर्मशास्त्रों की चेतना और ऋ त-अर्थात् सृष्टि की सनातन मर्यादा और लयबद्ध समरसता-के आलोक में करें, न कि पाश्चात्य आत्मकेन्द्रितता के भ्रमजाल में। कुटुम्ब की यह धुरी तभी अक्षुण्ण रह सकेगी, जब हम यह स्वीकार करें कि प्रेम और अधिकार परस्पर विरोधी नहीं, सहचर हैं-जैसे प्राण और वायु, जैसे शिव और शक्ति।
Topics: परिवार को संस्कारअर्धांगिनी और सहधर्मिणीआधुनिक विचारधारासांस्कृतिक जागरणएकल मातृत्वस्वतंत्रता का अमृतकालप्रवृत्ति पर प्रहारअर्बन नक्सलभारतीय नारी वैचारिक षड्यंत्रपश्चिमी नारीवादसप्तपदीपाञ्चजन्य विशेषकुटुम्ब प्रबोधन
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