पंजाब की राजनीति में जब भी कांग्रेस संकट में आती है, वह अपने सबसे कमजोर लेकिन सबसे संवेदनशील बिंदु से टकराती है — जातिगत प्रतिनिधित्व और नेतृत्व का सवाल। इस बार यह टकराव किसी चुनावी मंच पर नहीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी मंच पर हुआ है। और इस टकराव की आग इतनी तेज़ है कि उसकी लपटें अब चंडीगढ़ से दिल्ली तक पहुंच चुकी हैं।
शनिवार को चंडीगढ़ कांग्रेस भवन में हुई एससी सेल की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के एक बयान ने वह कर दिखाया जो विपक्ष वर्षों से नहीं कर पाया— कांग्रेस के भीतर छुपे दलित बनाम जट्ट सिख सत्ता संघर्ष को खुले मंच पर ला दिया। यह बयान अचानक नहीं था। यह एक सोची-समझी, दबे हुए असंतोष की रणनीतिक अभिव्यक्ति थी। और अब कांग्रेस हाईकमान को तय करना है —
क्या यह आग बुझाई जाए या इससे नई राजनीति गढ़ी जाए..?
एक माइक, एक सवाल और पार्टी का टूटता संतुलन
शनिवार की बैठक औपचारिक थी। एजेंडा था — वंचित समाज की भूमिका, संगठन विस्तार और चुनावी तैयारी। लेकिन जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत चन्नी माइक पर आए, एजेंडा बदल गया। उनके शब्द किसी स्क्रिप्ट से नहीं, बल्कि अंदर से निकल रहे थे।
चरनजीत चन्नी ने कहा— “पंजाब कांग्रेस का प्रधान अपर कास्ट, नेता प्रतिपक्ष अपर कास्ट, महिला कांग्रेस प्रधान अपर कास्ट, NSUI प्रधान अपर कास्ट… तो फिर 32–35% दलित आबादी वाले हम कहां जाएं ?”
इसके बाद हॉल में सन्नाटा छा गया। फिर नारे गूंजने लगे। इसके बाद अनुसूचित नेताओं ने समर्थन में आवाज़ उठाई। जिसके बाद जट्ट सिख खेमे में बेचैनी फैल गई। और हालात इतने बिगड़े कि माइक बंद कर दिया गया। यह दृश्य सिर्फ एक मीटिंग का नहीं था — यह कांग्रेस के भीतर सालों से दबे ज्वालामुखी का लावा था।
कांग्रेस के भीतर खुला गृहयुद्ध
अब समझिये कि इस ब्यान की जड़ है कहां ? दरअसल बीते दिनों में पंजाब कांग्रेस के इंचार्ज भूपेश बघेल ने मीडिया के सवाल का जवाब देते हुए बयान दिया था कि कांग्रेस पिछली गलती नहीं दोहराएगी, बघेल के इस ब्यान को 2021 के साथ जोड़कर देखा जा रहा है जब कैप्टन अमरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री के पद से हटाकर चरनजीत सिंह चन्नी को मात्र तीन महीने के बचे हुए कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बना दिया गया था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान नवजोत सिद्धू व चरनजीत चन्नी के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चली कशमकश को कांग्रेस प्रधान राहुल गांधी ने समाप्त करते हुए चन्नी को सीएम फेस अनाउंस कर दिया लेकिन कांग्रेस हार गई और ठीकरा चन्नी पर फो़ड़ दिया गया।
यहां पर भी कांग्रेस में अपर कास्ट बनाम दलित नेता वाला फेक्टर हावी रहा। चन्नी दो सीट से चुनाव लड़े और दोनों से हार गए लेकिन चन्नी की बदौलत पंजाब के दोआबा में कांग्रेस ने वो सीटें जीत लीं, जिनके बारे में खुद कांग्रेसी भी असमंजस में थे चूंकि दोआबा के एस.सी वोटरों ने चन्नी के चेहरे के चलते कांग्रेस के पक्ष में खुलकर मतदान किया। और ऐसे में बघेल द्वारा यह कह दिया जाना कि पिछली गलती नहीं दोहराएंगे, चन्नी को भी चुभ रहा होगा।
बताया जा रहा है कि पहले चन्नी शांत रहे लेकिन जब उन्हें बोलने नहीं दिया गया तो फिर उन्होंने मंच पर आकर माईक संभाला और अपनी बात रखी। आम तौर पर पंजाबी में अपनी बात रखने वाले पूर्व सीएम चन्नी ने सारी बात हिंदी में की, जैसा कि वीडियो में सुना जा रहा है और माना जा रहा है कि उनकी बातें हाईकमान तक पहुंच जाएं और आसानी से समझी जा सकें, इसलिए चन्नी हिंदी भाषा में बोल रहे थे।
वहीं, चन्नी के इस बयान के बाद पार्टी दो साफ़ हिस्सों में बंट गई।
– वंचित खेमा : जो कह रहा है— 32% – 35% आबादी के बावजूद सत्ता में भागीदारी नहीं, टिकट वितरण में अनदेखी, संगठन में सिर्फ “काम” कराया जाता है, “पद” नहीं दिया जाता
– जट्ट सिख खेमा : जो मानता है— चन्नी जानबूझकर पार्टी तोड़ रहे हैं, चुनाव से पहले दबाव की राजनीति कर रहे हैं, खुद को CM चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहते हैं, यह टकराव अब विचारधारा का नहीं, सीधे सत्ता का संघर्ष बन चुका है।
हालांकि यहां भी चन्नी व दूसरे खेमे में दोनों तरफ कुछ अनुसूचित व कुछ अपर कास्ट नेता चन्नी के पक्ष और विरोध, दोनों में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
कांग्रेस नेता डैनी का काउंटर और आग में घी
जैसे ही माहौल गरमाया, जंडियाला से पूर्व विधायक सुखविंदर सिंह डैनी ने चन्नी को सीधे चुनौती दी— “आपको मुख्यमंत्री बनाया गया, विपक्ष का नेता बनाया गया, CWC में लिया गया… फिर आप कैसे कह सकते हैं कि अनुसूचितों को पद नहीं मिले ?”
यह बयान अनुचुचित नेताओं को चुभ गया। उनका जवाब साफ था— एक व्यक्ति को पद मिलना, पूरे समाज को प्रतिनिधित्व मिलना नहीं होता।
राजा वड़िंग का तीखा वार : ‘आप यह बात कह ही नहीं सकते’
वहीं पंजाब में पार्टी प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने बयान देकर साफ कर दिया कि अब यह मामला दबाया नहीं जाएगा।
उन्होंने मीडिया से कहा— “चन्नी दोनों सीटों से चुनाव हारे थे, फिर भी पार्टी ने उन्हें सांसद बनाया। सुखजिंदर रंधावा मुख्यमंत्री बनने वाले थे, लेकिन चन्नी को बनाया गया। वे CWC मेंबर हैं, लोकसभा की एग्रीकल्चर कमेटी के चेयरमैन हैं — अब वो कह रहे हैं कि उन्हें कुछ नहीं मिला ?”
बता दें कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग का यह सिर्फ जवाब नहीं था, यह पार्टी की लाइन थी, जिसका मतलब स्पष्ट था कि— अब चन्नी को भावनात्मक कार्ड खेलने की खुली छूट नहीं मिलेगी।
वहीं इस मामले में चन्नी की सफाई, लेकिन रणनीति साफ- बढ़ते विरोध के बाद चन्नी ने वीडियो जारी किया और कहा कि उन्होंने किसी जाति का नाम नहीं लिया, उन्होंने सिर्फ सामाजिक न्याय की बात की है।
लेकिन कांग्रेस के अंदर हर नेता जानता है— चन्नी का अगला कदम 2027 की राजनीति है। उनका मकसद साफ है –
- खुद को दलितों का एकमात्र राष्ट्रीय चेहरा बनाना
- पार्टी पर दबाव बनाना
- हाईकमान को मजबूर करना कि अगला चेहरा दलित हो
- 2021 का मास्टरस्ट्रोक, 2022 की ऐतिहासिक हार
- कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसने दलित कार्ड खेला, लेकिन उसे संभाल नहीं पाई।
- 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना बड़ा दांव था।
- 32%- 35% दलित वोट बैंक साधने की कोशिश थी।
- लेकिन नतीजा हार में रहा।
- कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई
- चन्नी खुद दो सीटों से लड़े और दोनों सीटों से हारे
- आम आदमी पार्टी ने सत्ता पर कब्जा कर लिया
- कांग्रेस की रणनीति ध्वस्त हो गई
अब सवाल है — क्या कांग्रेस वही गलती दोहराएगी ?
2027 की जंग : बिना चेहरे की पार्टी और चेहरा बनने की होड़
कांग्रेस ने ऐलान किया है कि वह इस बार बिना CM चेहरे के चुनाव लड़ेगी। लेकिन चन्नी के बयान बता रहा है कि वे यह स्वीकार नहीं कर रहे। वह खुद को वंचित समाज के “प्राकृतिक नेता” के रूप में स्थापित कर रहे हैं। इसीलिए उनका बयान सिर्फ गुस्सा नहीं था, यह राजनीतिक ऐलान था।
हाईकमान का हस्तक्षेप : दिल्ली दरबार में फैसला होगा
वहीं अब पंजाब की स्थिति बिगड़ते देख राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने 23 जनवरी को दिल्ली में आपात बैठक बुलाई।
इस बैठक में शामिल होंगे —
- राजा वड़िंग
- प्रताप सिंह बाजवा
- चरणजीत चन्नी
- प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल
यह बैठक सिर्फ विवाद सुलझाने की नहीं, बल्कि पंजाब कांग्रेस के भविष्य की पटकथा लिखेगी।
विपक्ष का हमला : कांग्रेस की असलियत उजागर
इसके बाद आम आदमी पार्टी ने तुरंत हमला बोला— “कांग्रेस दलितों को सिर्फ चुनाव में याद करती है।”
वहीं अकाली दल ने कहा— “जिस पार्टी ने दशकों तक दलितों को धोखा दिया, आज वही टूट रही है।”
वहीं भाजपा ने इसे “कांग्रेस की जातिवादी राजनीति का सबूत” बताया। वहीं, कांग्रेस से भाजपा में गए कई पुराने साथियों ने चरनजीत चन्नी को भाजपा में आकर नया पंजाब बनाने का निमंत्रण तक दे दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में रहकर एस.सी वर्ग का होने के चलते अनदेखी करवाने का कोई लाभ नहीं है, पंजाब के हितों की रक्षा के लिए, पंजाब की तरक्की के लिए, पंजाब की खुशहाली के लिए अहम है कि भाजपा को सत्ता में लाया जाए इसलिए आओ सभी मिलकर इस संकल्प को पूरा करते हैं।
दलित वोट बैंक : कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट
पंजाब में वंचित वोट अब बंधा हुआ नहीं है। हालांकि AAP, BSP और भाजपा लगातार सेंध लगा रही हैं। अगर कांग्रेस ने इस मुद्दे को नहीं संभाला, तो अनुसूचित वोट हमेशा के लिए निकल सकता है।
क्या कांग्रेस दलित CM या डिप्टी CM देगी?
पूर्व MLA कुलदीप वैद का बयान अहम है— “अगर हाईकमान वाकई न्याय चाहता है, तो वंचित को CM या डिप्टी CM बनाए।” यह मांग अब सिर्फ सुझाव नहीं रही, यह दबाव बन चुकी है।
कांग्रेस की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा
पंजाब कांग्रेस आज उस मोड़ पर खड़ी है जहां एक गलत फैसला पार्टी को वर्षों पीछे धकेल सकता है। चन्नी का बयान चेतावनी है। राजा वड़िंग का जवाब चुनौती है। हाईकमान की चुप्पी संकट है। अब सवाल सिर्फ जाति का नहीं, कांग्रेस के अस्तित्व का है। अगर पार्टी ने इसे नहीं सुलझाया, तो 2027 में वह सिर्फ चुनाव नहीं हारेगी— वह पंजाब की राजनीति से बाहर हो जाएगी।

















