प्रवर्तन निदेशालय बनाम पश्चिम बंगाल सरकार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में माहौल उस वक्त काफी तीखा हो गया, जब न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने साफ शब्दों में कहा कि अदालत चाहती तो “10 मिनट में ही आदेश पारित कर सकती थी”, लेकिन चूंकि मामला गंभीर है और व्यापक बहस हुई है, इसलिए हर बात को रिकॉर्ड पर लाना जरूरी है।
बता दें कि अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक न लगाने की दलील दी।
सिंघवी की दलील पर कोर्ट की सख्त प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से आग्रह किया कि या तो FIR पर रोक न लगाई जाए या फिर जांच बिना किसी दबाव के आगे बढ़े। इसी पर न्यायमूर्ति मिश्रा ने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण मामला नहीं है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में हर सुनवाई सार्वजनिक होती है और ऐसे में संवैधानिक संतुलन से जुड़े मामलों में जल्दबाजी ठीक नहीं।
कोर्ट का रुख साफ था कि केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता और संघीय ढांचे से जुड़े हर पहलू को विधिवत दर्ज किया जाना चाहिए।
केंद्रीय एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि यह गंभीर विषय है कि राज्य पुलिस किसी वैधानिक केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई में हस्तक्षेप कर रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान हर संस्था को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार देता है और राज्य पुलिस को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह ED जैसी एजेंसियों के काम में बाधा डाले।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्रीय एजेंसियां किसी राजनीतिक दल के चुनावी कार्यक्रम में हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करना उनका वैधानिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश और आदेश
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR पर रोक रहेगी। इसके साथ ही तलाशी के दौरान परिसर के CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अंतिम फैसले तक ED अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
वहीं इस मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस कमिश्नर और DGP को नोटिस जारी किया गया है। अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी।
तुषार मेहता के गंभीर आरोप : “यह सरासर चोरी है”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बंगाल सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला “सरासर चोरी” जैसा है। मेहता का आरोप था कि पुलिस, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मिलकर, सबूत हटाने और नष्ट करने आई थी।
उन्होंने दावा किया कि कथित तौर पर फाइलें अपने कब्जे में ली गईं और एक ED अधिकारी का फोन जब्त किया गया। मेहता ने चेतावनी दी कि अगर ऐसे मामलों में कड़ा उदाहरण नहीं बना, तो इससे केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल गिरेगा और राज्य सरकारें मनमानी करने लगेंगी।
जस्टिस मिश्रा का सवाल और संवैधानिक संकेत
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मिश्रा ने सवाल किया कि क्या ऐसे मामलों में अधिकारियों को निलंबित कर देना चाहिए। इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि सक्षम प्राधिकरण को कार्रवाई का निर्देश दिया जाए और उन्होंने PMLA की धारा 54 का हवाला भी दिया।
कोर्ट ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया कि यह मामला केवल एक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि संघीय ढांचा, कानून का शासन और केंद्रीय एजेंसियों की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है।
इसी वजह से अदालत ने जल्दबाजी के बजाय पूरी बहस को रिकॉर्ड पर लाना जरूरी समझा।

















