घर के चिराग बुझ रहे हैं : ड्रग्स पर NCRB के चौंकाने वाले आंकड़े, जानिए नशे पर आपातकालीन चेतावनी
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घर के चिराग बुझ रहे हैं : ड्रग्स पर NCRB के चौंकाने वाले आंकड़े, जानिए नशे पर आपातकालीन चेतावनी

ड्रग्स सिर्फ नशा नहीं, भारत के भविष्य पर हमला हैं। NCRB के चौंकाने वाले आंकड़े, युवाओं पर खतरा और समाधान की ठोस रणनीति।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Shivam Dixit
Jan 17, 2026, 07:41 pm IST
inभारत, विश्लेषण
drugs

प्रतीकात्मक तस्वीर

यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, राष्ट्र के विरुद्ध साज़िश है, किसी भी समाज का पतन तब शुरू नहीं होता जब दुश्मन सीमा पर हमला करे, बल्कि तब होता है जब वह समाज अपने ही विनाश को आधुनिकता, आज़ादी और गौरव समझने लगे। आज भारत उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ नशा, शराब और ड्रग्स को फ़िल्मों में स्टाइल दिखाया जा रहा है, वेब सीरीज़ में यथार्थ बताया जा रहा है और युवाओं में कूल और बोल्ड होने का प्रतीक बना दिया गया है, और सबसे खतरनाक बात यह है कि इसे हम इसे अपनी संस्कृति का पतन नहीं, बल्कि गर्व मानने लगे हैं। माय लाइफ माय चॉइस , मेरी निजता , मेरी आज़ादी ने सामाजिक दूरिया बढ़ा दी है। यही वह बिंदु है जहाँ से राष्ट्र भीतर से टूटने लगता है। यही स्थिति आज बढ़ते ड्रुग मामलों की है जो हमारे युवाओ के माध्यम से राष्ट्र के भविष्य को खोखला कर रही है।

NCRB के आँकड़े : यह डर नहीं, आपातकालीन चेतावनी है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के रोंगटे खड़े कर देने के लिए पर्याप्त हैं – वर्ष 2020: NDPS के लगभग 59,800 मामले , 2021: लगभग 78,300 मामले , 2022: लगभग 1,15,000 मामले और सबसे भयावह 2022 में NDPS मामलों में लगभग 2,600 नाबालिग अर्थात् स्कूल जाने वाले बच्चे। यह कोई आकस्मिक सामाजिक विकृति नहीं है। यह निरंतर, योजनाबद्ध और बढ़ता हुआ हमला है। 2023 में ड्रग की बरामदगी लगभग ₹16,100 करोड़ और 2024 में लगभग ₹25,330 करोड़ जो 2023 की तुलना में लगभग 55% वृद्धि हुई है , साथ ही नई तस्करी प्रवृत्तियाँ (2023–2024) में देखने को मिली है डार्कनेट के उपयोग में वृद्धि हुई है , कूरियर/पार्सल के मामलों में तेज़ बढ़ोतरी एवं सिंथेटिक ड्रग्स शहरी/कॉलेज युवाओं में फैलाव बढ़ रहा है। NCRB 2022 के अनुसार NDPS के सर्वाधिक मामले वाले राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब ,मध्य प्रदेश ,राजस्थान रहे है।

फ़िल्में, वेब सीरीज़ और आधुनिकता का छल

आज का युवा नशा कहाँ से सीख रहा है? नायक शराब पीता है तो इसे मर्दानगी कहा जाता है, नायिका ड्रग्स लेती है तो स्वतंत्रता और कॉलेज पार्टी में ड्रग्स तथा शराब को फैशन और तनाव से मुक्ति माना जाता है। धीरे-धीरे यह संदेश बैठाया गया कि जो नशा नहीं करता, वह पिछड़ा है। यही सबसे बड़ा सांस्कृतिक अपराध है। यह संस्कृति का विकास नहीं, संस्कृति का विलोपन है। हम वह सभ्यता हैं जिसने संयम, मर्यादा और आत्मनियंत्रण को गौरव माना, और आज हम नशे को पहचान बना रहे हैं।

ड्रग्स के प्रकार : जाल कैसे बनाया जाता है

नशा एक झटके में नहीं आता,वह उत्प्रेरक में चढ़ाया जाता है। गांजा / भांग – यह तो हल्का है , दवाइयाँ / सिरप – यह तो दवा है , व्हाइटनर / सॉल्वेंट – सब करते हैं ,MDMA / सिंथेटिक ड्रग्स – पार्टी ड्रग , हेरोइन / स्मैक – नशे का अंतिम चरण है , यह कोई संयोग नहीं, गेटवे स्ट्रैटेजी है।

माता-पिता, स्कूल, कॉलेज क्यों नहीं पकड़ते? क्योंकि नशा अब बदबू नहीं देता , सुई नहीं दिखती , बच्चा घर में रहता है , मोबाइल पर व्यस्त रहता है , और माता-पिता मानते हैं—मेरा बच्चा ऐसा नहीं हो सकता, यह इनकार सबसे घातक हथियार है।

स्पष्ट लक्षण : जिन्हें अनदेखा करना अब अपराध है

यदि ये लक्षण दिखें, तो समझिए खतरा दरवाज़े पर है – अचानक गुस्सा , अकेले रहना ,झूठ बोलना ,संवेदनहीनता ,आँखें लाल/सुस्त , वजन में तेज़ बदलाव , नींद बिगड़ना , पढ़ाई में गिरावट, पुराने दोस्तों से दूरी , पैसे की माँग/चोरी और मोबाइल/कमरे पर अत्यधिक सुरक्षा करना। यदि तीन से अधिक लक्षण हो तुरंत नज़र रखनी चाहिए।

यह केवल व्यक्तिगत बर्बादी नहीं, राष्ट्र का क्षरण है

युवा राष्ट्र की रीढ़ है, रीढ़ टूटी तो राष्ट्र झुका, युवा खोखला हुआ तो राष्ट्र कमजोर होगा ,नशे में युवा होगा तो अपराध, अराजकता, अस्थिरता होगी। क्या यह संयोग है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स सबसे ज़्यादा फैलते हैं? यह युद्ध के बिना युद्ध है। अब सबसे ज़रूरी है बचाव फिर कार्रवाई हो।

हमारे पास कानून हैं, विभाग हैं, परंतु समन्वित इच्छाशक्ति, स्पष्ट जवाबदेही और जमीनी रणनीति का अभाव है। अब आवश्यकता भाषणों, नारों या प्रतीकात्मक अभियानों की नहीं, बल्कि कठोर, समयबद्ध और उत्तरदायित्व-आधारित कार्ययोजना की है—जिसमें यह स्पष्ट हो कि कौन क्या करेगा, कब करेगा और कैसे करेगा। नशा इसलिए नहीं रुक पा रहा क्योंकि जिम्मेदारी बँटी हुई है। हर विभाग समस्या को देखता है, पर कोई यह नहीं कह पाता कि अंतिम उत्तरदायित्व किसका है।

इस भ्रम को समाप्त करने का पहला कदम है, जिला ड्रग नियंत्रण समन्वय केंद्र की स्थापना हो , प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक जिला ड्रग नियंत्रण समन्वय केंद्र स्थापित किया जाए। इसमें पुलिस अधीक्षक, शिक्षा अधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निकाय/पंचायत, आबकारी विभाग और सामाजिक न्याय विभाग को शामिल किया जाए।

यह कोई औपचारिक समिति नहीं, बल्कि कार्रवाई का केंद्र होगा। इसके मुख्य कार्य होंगे नशे से जुड़े सभी मामलों का एकीकृत आँकड़ा, साप्ताहिक समीक्षा बैठक, और सबसे महत्वपूर्ण है एक आदेश, एक कार्रवाई। अब कोई भी विभाग यह कहने की स्थिति में नहीं रहेगा कि यह मेरा क्षेत्र / विषय नहीं था।

हॉटस्पॉट नियंत्रण हो , जहाँ नशा दिखाई नहीं देता, वहीं फलता-फूलता है , आज नशा सुनसान गलियों में नहीं, बल्कि समाज के बीचों-बीच पनप रहा है,चाय और पान की दुकानों पर, जिम और व्यायामशालाओं में, सैलून और पार्लरों में, ढाबों, छात्रावासों, किराए के कमरों और पार्सल वितरण केंद्रों पर। इसलिए अगला अनिवार्य कदम है ड्रग संवेदनशीलता मानचित्रण ,प्रत्येक थाना क्षेत्र में ऐसे सभी स्थानों की सूची बनाई जाए, जिन्हें उच्च जोखिम क्षेत्र घोषित किया जाए। इन स्थानों पर सीसीटीवी अनिवार्य हो,लाइसेंस नवीनीकरण से पूर्व पुलिस सत्यापन आवश्यक हो, अचानक निरीक्षण हों, और संदिग्ध गतिविधि मिलने पर तत्काल सील करने की व्यवस्था हो।

आपूर्ति श्रृंखला पर निर्णायक प्रहार हो क्योंकि पैसा रुकेगा तो गिरोह टूटेगा, जब तक नशे से धन कमाया जाता रहेगा, तब तक यह धंधा जीवित रहेगा। इसलिए सबसे कठोर कदम है धन-श्रृंखला पर प्रहार ,प्रत्येक नशा संबंधी मामले को धन-शोधन के दृष्टिकोण से देखा जाए। आर्थिक अपराध शाखा को सक्रिय किया जाए, अवैध संपत्तियाँ ज़ब्त हों,और बेनामी संपत्तियों की गहन जाँच की जाए।साथ ही नीति स्पष्ट हो केवल छोटे विक्रेताओं पर नहीं, बल्कि वित्तपोषकों, आपूर्तिकर्ताओं और गिरोह प्रमुखों पर कार्रवाई हो।

संस्कृति और मीडिया को इसका महिमामंडन नहीं, प्रतिरोध करना होगा । फ़िल्मों, वेब-श्रृंखलाओं और सामाजिक माध्यमों ने नशे को आधुनिकता और स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया है। यह प्रवृत्ति अत्यंत घातक है। इसलिए आवश्यक है, कि नशे के महिमामंडन पर निगरानी, विद्यालयों में मीडिया साक्षरता, और डिजिटल मंचों के लिए विशेष निगरानी तंत्र हो ।लक्ष्य स्पष्ट हो कि नशे को आकर्षक नहीं, घातक के रूप में प्रस्तुत करना।

स्कूल–कॉलेज स्तर पर हर संस्थान में ड्रग-निरोध समिति जिसमे प्राचार्य शिक्षक, काउंसलर ,अभिभावक प्रतिनिधि हो। कक्षा 8 से नशा-जागरूकता , मानसिक स्वास्थ्य ,जीवन-मूल्य शिक्षा दी जाए। स्कूल में गोपनीय शिकायत पेटिका स्थापित की जाए । छात्र/ छात्रा की पहचान करना होगी जिसमे शिक्षक/अभिभावक लक्षण देखें , छात्र को डाँटना नहीं है उसकी गोपनीय रिपोर्टिंग उसके घर वालो को दे। अगले चरण में काउंसलिंग , निजी संवाद उसे डराए नहीं भरोसा दिलाये , माता-पिता उस पर आरोप लगाने की बजाय उसके मूल जड़ को समझे उसे समय दे उसके साथ रहे उसके जीवन के मूल्य को समझाए।

यह समझना होगा नशा अपराध नहीं, बीमारी है। यदि आवश्यकता हो तो उपचार और पुनर्वास किया जाये और गंभीर अवस्था में व्यसन-मुक्ति केंद्र भेज जाये लेकिन पढ़ाई से निष्कासन नहीं हो। सरकार को ड्रग्स के नेटवर्क पर वार करना होगा उनका लक्ष्य छात्र नहीं, सप्लायर हो , पुलिस/NCB से समन्वय ,स्कूल के आसपास सख्त निगरानी की जाये।

माता-पिता और परिवार मिलकर कुटुंब मूल्यों की पुनर्स्थापना करे नशा वहाँ नहीं पनपता जहाँ संवाद होता है , समय दिया जाता है , सीमाएँ स्पष्ट होती हैं ,मूल्य जीवित होते हैं , परिवार का कमजोर होना, नशे का सबसे बड़ा निमंत्रण है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि अब चुप रहना देशद्रोह के समान , यह सोच कि यह सरकार देखेगी अब स्वीकार्य नहीं। हर नागरिक का दायित्व है नशे का महिमामंडन रोकना , संदिग्ध गतिविधि की सूचना देना , युवाओं को सही दिशा देना , चुप्पी अब तटस्थता नहीं, सहभागिता है।

यदि आज माता-पिता नहीं जागे , स्कूल नहीं बदले , सरकार ने नीति नहीं बदली , समाज ने चुप्पी नहीं तोड़ी , तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी। युवा बचेगा तो राष्ट्र बचेगा। युवा बर्बाद हुआ, तो राष्ट्र भी बर्बाद होगा। अब नहीं तो कभी नहीं।

Topics: ड्रग माफियानशा मुक्त भारतराष्ट्र विरोधी साजिशNasha Mukt Bharat
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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