शिक्षा में सुधार के लिए बेहद जरूरी है भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक
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शिक्षा में सुधार के लिए बेहद जरूरी है भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक

विकसित भारत–2047 की ओर बढ़ते हुए भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उस गति को टिकाऊ आधार दे पाने में सक्षम है।

Written byप्रो. (डॉ.) परीक्षित सिंह मनहास (लेखक  शैक्षिक संचार संकाय के निदेशक हैं)प्रो. (डॉ.) परीक्षित सिंह मनहास (लेखक  शैक्षिक संचार संकाय के निदेशक हैं) — edited by Mahak Singh
Jan 16, 2026, 04:54 pm IST
inभारत

किसी भी राष्ट्र की दिशा उसकी शिक्षा तय करती है। विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित सुधार एक निर्णायक मोड़ का संकेत हैं।  2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प तब ही साकार होगा, जब विश्वविद्यालय ज्ञान और नवाचार के केंद्र बनें। नया शिक्षा विधेयक इसी परिवर्तन की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। विकसित भारत–2047 की ओर बढ़ते हुए भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उस गति को टिकाऊ आधार दे पाने में सक्षम है। संसद के शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 इसी बुनियादी चुनौती का उत्तर खोजने का प्रयास है। यह केवल उच्च शिक्षा में सुधार का प्रस्ताव नहीं, बल्कि उस रणनीतिक सोच का परिचायक है जो भारत को अगले दो दशकों में ज्ञान-आधारित, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और आत्मविश्वासी राष्ट्र बनाने की दिशा तय करती है।

दशकों से भारतीय विश्वविद्यालय और महाविद्यालय जटिल नियामकीय जाल में उलझे रहे हैं। किसी नए पाठ्यक्रम की शुरुआत हो या शोध कार्यक्रम का विस्तार, संस्थानों को कई नियामकों के बीच भटकना पड़ता है। यह प्रक्रिया न केवल समय साध्य है, बल्कि नवाचार की ऊर्जा को भी क्षीण करती है। प्रस्तावित विधेयक एकल-खिड़की व्यवस्था और स्पष्ट भूमिका-विभाजन के माध्यम से इसी बोझ को हल्का करने का दावा करता है। स्वीकृति-आधारित नियंत्रण की जगह प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन और डिजिटल पारदर्शिता पर जोर देकर यह व्यवस्था संस्थानों को अधिक स्वायत्तता और साथ ही जवाबदेही देने की दिशा में कदम बढ़ाती है। भरोसे और उत्तरदायित्व के इस संतुलन से शिक्षा संस्थानों में सृजनशीलता और गुणवत्ता दोनों को नई गति मिल सकती है।

लचीली और बहुविषयक शिक्षा का भविष्य

विधेयक की आत्मा छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण में निहित है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 की भावना के अनुरूप यह लचीले शैक्षणिक मार्ग, बहुविषयक अध्ययन और व्यावसायिक प्रशिक्षण को मुख्यधारा से जोड़ने की परिकल्पना करता है। आज का विद्यार्थी केवल एक ही अनुशासन की संकीर्ण परिधि में बंधा न रहे, बल्कि अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विज्ञान, कला, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों का संयोजन चुन सके, यही भविष्य की शिक्षा का स्वरूप होगा। इससे न केवल उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ेगा, बल्कि वह कौशल-संपन्न मानव संसाधन भी तैयार होगा जिसकी विकसित भारत को आवश्यकता है।

शिक्षा में समावेशिता और अवसरों का विस्तार

समावेशिता इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ है। शिक्षा का विकास तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों, ग्रामीण और छोटे कस्बों के युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार, कौशल और रोजगार के बीच की खाई को पाटना, तथा आजीवन सीखने की संभावनाएं पैदा करना- ये सभी पहल ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना को साकार करने की दिशा में हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह ढांचा वास्तव में सामाजिक और भौगोलिक असमानताओं को कम कर पाएगा।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारतीय शिक्षा की नई दिशा

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी यह विधेयक महत्वाकांक्षी है। हर वर्ष बड़ी संख्या में भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं, जिससे न केवल प्रतिभा का पलायन होता है बल्कि आर्थिक संसाधन भी बाहर जाते हैं। यदि भारतीय संस्थान शोध, नवाचार और अकादमिक गुणवत्ता में विश्वस्तरीय बनें, तो यही देश अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों का गंतव्य बन सकता है। क्रेडिट ट्रांसफर, संकाय विनिमय और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी जैसे प्रावधान इसी दिशा में संकेत करते हैं। सके साथ ही, भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मानकों के साथ जोड़ने का प्रयास इस विधेयक को विशिष्ट बनाता है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक आत्मबोध का यह संतुलन ही एक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी भारत की पहचान हो सकता है।

शिक्षा: भारत के 2047 के विकास की नींव

यह विधेयक शिक्षा को केवल प्रशासनिक ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के आधार के रूप में देखने का आग्रह करता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित सुधार कागजों से निकलकर जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, क्या वास्तव में प्रक्रियाएं सरल होंगी, स्वायत्तता से गुणवत्ता बढ़ेगी और समावेशिता अंतिम छोर तक पहुंचेगी। फिर भी दिशा स्पष्ट है। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसकी नींव शिक्षा पर ही टिकेगी। हर नीति, हर सुधार को इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए कि वह हमें एक समावेशी, ज्ञान-सम्पन्न और वैश्विक नेतृत्व करने वाले भारत के कितने करीब ले जाता है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक उसी लक्ष्य की ओर बढ़ाया गया एक निर्णायक कदम प्रतीत होता है।

Topics: Developed India Education Billशिक्षाशिक्षा में सुधारDeveloped India 2047India 2047 Higher Education ReformsEducation Reforms and University Innovationiksit Bharat Shiksha Adhishthan BillIndian Higher Education Reform
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