आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने अपने प्रदेश की नयी जनसंख्या प्रबंधन नीति के अंतर्गत तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की हैI दूसरे बच्चे के जन्म पर आंध्र प्रदेश में पहले से ही 25 हजार रुपये प्रोत्साहन स्वरूप दिए जाते हैंI घोषित तौर पर उन्होंने यह निर्णय राज्य की गिरती ‘कुल प्रजनन दर’ और जनसांख्यिकीय असंतुलन की चुनौतियों से निपटने के लिए लिया हैI हालाँकि, पिछले दिनों का राजनीतिक विमर्श कुछ और ही कहानी कहता है।
नारी शक्ति वन्दन अधिनियम-2020 में संशोधन के समय दक्षिण भारत के राज्यों और विपक्ष के अधिकांश नेताओं ने इसका विरोध किया था I इस संशोधन विधेयक में लोकसभा की एक तिहाई सीटें बढ़ाकर उनका परिसीमन करते हुए 2029 से महिला आरक्षण लागू करने की बात थी। इन नेताओं की आशंका यह थी कि इससे दक्षिण भारत के राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। ऐसी आवाजें पहले भी यदा-कदा सुनाई पड़ती रही हैं। इन आशंकाओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्टीकरण भी दिया कि लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी वर्तमान सीटों को आधार बनाकर समानुपातिक रूप में होगी और परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना होगी, लेकिन उपरोक्त आशंकाजनित विरोध के कारण यह संशोधन विधेयक पारित न हो सका और 2029 से क्रियान्वित होने वाला महिला आरक्षण एकबार फिर लटक गया I
जनसांख्यिकीय असंतुलन का शॉर्टकट
दरअसल, चंद्रबाबू नायडू के द्वारा तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर प्रोत्साहन राशि और अन्यान्य सुविधाओं की घोषणा लोकसभा में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व घटने की आशंका और असुरक्षा की उपज है। आंध्र प्रदेश ऐसी योजना शुरू करने वाला पहला राज्य जरूर है, लेकिन ऐसी सम्भावना है कि दक्षिण भारत के अन्य राज्य भी उसकी राह पकड़ लेंगे। यह प्रोत्साहन नीति बहुत ही संकुचित और पृथकतावादी सोच का परिणाम है, जिसमें राज्य के हित को राष्ट्रहित से ऊपर देखा जा रहा है। यह गिरती प्रजनन दर की सरलीकृत समझ और जनसांख्यिकीय असंतुलन के शॉर्टकट समाधान से अधिक कुछ नहीं है। चंद्रबाबू नायडू सबसे प्रगतिशील राजनेताओं में से एक माने जाते रहे हैं और वे जनसंख्या नियंत्रण हेतु समेकित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति बनाने के पैरोकार भी रहे हैं। परन्तु उनका यह हड़बड़िया निर्णय संकीर्ण और प्रतिगामी है। यह राष्ट्रीय हितों के बरक्स वोट बैंक की राजनीति और प्रभावी दबाव समूह बने रहने की चाह का प्रतिफलन है। नायडू की यह सोच दूसरे बहुसंख्यक (मुस्लिम) समुदाय के एक बड़े हिस्से के साथ-साथ उस ग्रामीण, गरीब और अशिक्षित तबके से मेल खाती है जोकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करके पंचायत से लेकर लोकसभा चुनावों में अपनी दबंगई दिखाना चाहता हैI ज्यादा से ज्यादा सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना चाहता हैI यह “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” करते हुए उनके एकमुश्त वोट पाने की जुगत है।
सरलीकृत समाधान से बचना चाहिए
निःसंदेह, लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनसंख्या निर्णायक दबाव-समूह होती हैI लेकिन एक नागरिक का मतदाता मात्र के रूप में अवमूल्यन उचित नहीं हैI उसकी और भी बहुत सारी आवश्यकताएं, अपेक्षाएं, भूमिकाएँ और चुनौतियाँ होती हैंI चंद्रबाबू नायडू को राज्य की घटती प्रजनन दर और जनसांख्यिकीय असंतुलन के सरलीकृत समाधान से बचना चाहिए थाI जिसप्रकार अपेक्षाकृत शिक्षित, समृद्ध और विकसित राज्यों में प्रजनन दर कम है, ठीक उसीप्रकार शिक्षित, समृद्ध,शहरी परिवारों, खासकर हिंदुओं में भी प्रजनन दर काफी कम हैI इस समस्या के कारणों को जानने और उन्हें संबोधित करने की आवश्यकता हैI ऐसे परिवारों के युवा या तो विवाह नहीं कर रहे, या देरी से कर रहे हैं,या लिव-इन में रह रहे हैंI वे बच्चे पैदा नहीं कर रहे या बच्चे नहीं हो रहे या सिर्फ एक बच्चा पैदा कर रहे हैंI ऐसा क्यों हो रहा है? इसपर गहराई से सोचने की आवश्यकता है।
तथाकथित अल्पसंख्यक होंगे प्रेरित
इन युवाओं को आठ से बारह घंटे काम करना पड़ता है। दो से चार घंटे ऑफिस आवागमन में लगाने होते हैंI उनमें से अधिकांश बर्नआउट और जीवन–शैली संबंधी व्याधियों(उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अवसाद,तनाव,चिंता,मोटापा आदि) के शिकार हैं। बच्चे के स्तरीय पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा के लिए आवश्यक समय, उत्साह, ऊर्जा और संसाधनों का अभाव उन्हें इन जिम्मेदारियों से विमुख कर रहा हैI पेशेगत अतिव्यस्तता और महंगे होते गुणवत्तापूर्ण जीवन ने उनकी सोच, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया है I भौतिक सुविधाएँ तो फिर भी हैं, परन्तु जीवन निर्द्वंद्व और गुणवत्तापूर्ण नहीं हैI इससे प्रजनन दर नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हैI 30 हजार या 40 हजार रुपये की एकमुश्त प्रोत्साहन राशि देकर इन शिक्षित, समृद्ध, शहरी युवाओं को बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है I इस तरह की प्रोत्साहन राशि से तो , अशिक्षित गरीबों, ग्रामीणों और वोट को हथियार समझने वाले तथाकथित अल्पसंख्यकों को ही बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित किया जा सकता हैI ऐसे परिवारों में यूँ भी प्रजनन दर ठीक-ठाक ही होती हैI अगर इन परिवारों में और भी ज्यादा बच्चे पैदा होंगे तो वे मानव संसाधन बनने की जगह राज्य के संसाधनों पर बोझ ही बनेंगेI उनके लिए गरिमामयी जीवन की गारंटी कौन सुनिश्चित करेगा? उनके रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की चिंता कौन करेगा? क्या इससे रेवड़ी संस्कृति को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा? उल्लेखनीय है कि आर्थिक विकास दर को बढ़ाने में जनसंख्या मात्र का नहीं बल्कि मानव संसाधन का योगदान होता है I
देश में जनसांख्यिकीय असंतुलन
निश्चय ही, देश में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा हैI भारत में प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र हैI ऐसी स्थिति में जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में पहल की है, उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा और संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका है। यह आशंका सिर्फ राज्यों की ही नहीं है, बल्कि तमाम धार्मिक और जातीय समुदायों का भी यही डर हैI इसलिए भारत सरकार को इस दिशा में निर्णायक पहल करते हुए जल्दी-से जल्दी एक समेकित जनसंख्या नीति बनानी चाहिए, ताकि ऐसी आशंकाओं की समाप्ति के साथ-साथ समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सकेI जनसंख्या का अपेक्षाकृत समान वितरण और जनसांख्यिकीय संतुलन राष्ट्रीय शान्ति और समृद्धि की आधारभूत शर्त हैI जागरूकता कार्यक्रम मात्र इस समस्या का समाधान नहीं हैं। जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका तो है, किन्तु ये समेकित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का विकल्प नहीं हैंI
भारत में संसाधन सीमित
भारत जैसे विकासशील देश में संसाधन और सुविधाएं सीमित हैंI इन सीमित संसाधनों पर बढ़ती हुई जनसंख्या का बेहिसाब दबाव हैI इसीकारण हमारे देश में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि आधारभूत आवश्यकताओं के लिए जबर्दस्त मारामारी है। सरकारी विद्यालयों-अस्पतालों से लेकर नामी-गिरामी निजी विद्यालयों-अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, हवाई अड्डों, होटल-रेस्टोरेंटों, पर्यटन-स्थलों, सड़कों, बाजारों, थानों-न्यायालयों, सरकारी कार्यालयों आदि जगहों पर बेहिसाब भीड़ रहती है। प्रत्येक स्थान पर लम्बी-लम्बी लाइनें रोजमर्रा का दृश्य है। छोटी-छोटी सुविधाओं और जरूरतों के लिए लम्बी प्रतीक्षा स्थायी जीवन-स्थिति है। कुछ परंपरागत अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था की गतिशीलता और विकास का सूचक मानते और बताते हैं परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि जनसंख्या और मानव संसाधन में अंतर होता है। कमाने वाले हाथों और खाने वाले मुंह में पारस्परिक अनुपात होना आवश्यक हैI वर्तमान युग तो मशीन और तकनीक का हैI इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्यधिक विकसित तकनीकी उपकरणों वाले कलयुग में तो कमाने वाले हाथों को सोचने वाले मस्तिष्क ने काफी हद तक प्रतिस्थापित कर दिया हैI गौरतलब है कि जनसंख्या को मानव संसाधन बनाने के लिए आधारभूत ढांचे, साधन-संसाधन और सुविधाओं की आवश्यकता होती हैI अनिवार्य पौष्टिक आहार, पेयजल, समुचित स्वास्थ्य, स्तरीय शिक्षा और कौशल विकास की व्यवस्थाओं/सुविधाओं द्वारा ही जनसंख्या को मानव संसाधन बनाया जा सकता हैI भारत जैसे विकासशील देश की तो खैर बिसात ही क्या पर किसी विकसित देश में भी ये संसाधन और सुविधाएं असीमित नहीं हो सकती हैंI कृषि भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता, अन्यान्य प्राकृतिक संसाधन; यहाँ तक कि शुद्ध जल और वायु भी असीमित नहीं हैंI साधन-सुविधाओं के अभाव और बढ़ते अपराध के अंतर्संबंध को भी नज़रन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।
मानव कर रहा प्रकृति का अति-दोहन
जनसंख्या, अशिक्षा, गरीबी, अस्वास्थ्य, पर्यावरण असंतुलन/ प्राकृतिक क्षरण के दुश्चक्र से हम सब अनभिज्ञ नहीं हैंI इन सभी सुविधाओं के अभाव और संसाधनों पर निरंतर बढ़ते दबाव ने न सिर्फ मानव-स्वभाव और चरित्र को विकृत किया है, बल्कि प्रकृति के स्वरूप को भी बदरंग और विध्वसंक बना डाला हैI प्रकृति मनुष्य की सबसे निकटस्थ मित्र और सहचरी होती है, किन्तु अत्यधिक दोहन और शोषण ने उसे शत्रु और संहारक बना दिया हैI इसलिए लगातार प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैंI मानव द्वारा प्रकृति के अति-दोहन से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन इन आपदाओं का आदिस्रोत हैI प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण और प्राकृतिक आपदाओं के अंतर्संबंध की विस्तृत विवेचना की ही है I
भारत देश में बढ़ी हुई जनसंख्या एक बड़ी समस्या हैI आज भारत की कुल जनसंख्या 146 करोड़ से भी अधिक हैI आज भारत जनसंख्या की दृष्टि से चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पहले स्थान पर हैI उल्लेखनीय यह भी है कि भारत का जनसंख्या घनत्व चीन से लगभग तीन गुना अधिक हैI लेकिन अब समय आ गया है कि समस्त भारतवासी इस विकराल बन चुकी समस्या के बारे में सोचें और उसके समाधान की दिशा में सक्रिय होंI
भौगोलिक क्षेत्रफल और अन्यान्य संसाधनों-सुविधाओं और जनसंख्या में आनुपातिक संतुलन स्थापित करके ही राज्य अपने नागरिकों को स्वास्थ्य,शिक्षा,आवास,रोजगार और सामजिक सुरक्षा आदि सुविधाएं प्रदान कर सकता हैI कल्याणकारी राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को उपरोक्त आधारभूत सुविधाएं प्रदान करेI ये सुविधाएं प्राप्त होने से ही नागरिकों की मानवीय गरिमा भी बहाल हो सकेगी। मानव जीवन का महत्व और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए “हम दो हमारे दो” वाली समेकित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति लागू करना ही समस्या का समाधान है। (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैंI)
















