दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजित ‘शब्दोत्सव’ अपने स्वरूप और संवेदना, दोनों ही स्तरों पर देश में होने वाले प्रचलित ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ से अलग दिखाई दिया। यह केवल पुस्तकों, लेखकों या विमर्शों तक सीमित आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीयता के आत्मबोध का एक व्यापक और सजीव उत्सव था। शब्दोत्सव में युवाओं ने बिना किसी हिचक के अपने विचार रखे और देश, संस्कृति व पहचान से जुड़े मुद्दों पर तार्किक दृष्टि प्रस्तुत की। उनकी भागीदारी केवल श्रोता के रूप में नहीं, बल्कि प्रश्नकर्ता, संवादकर्ता और विचारक के रूप में दिखाई दी। आयोजन स्थल पर ‘भारत माता की जय’ और ‘छत्रपति शिवाजी महाराज की जय’ जैसे नारों की गूंज यह संकेत दे रही थी कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट नहीं रही, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, स्पष्टता और गर्व के साथ आगे बढ़ा रही है। भजनों पर युवाओं का झूमना इस बात का प्रमाण था कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। कुल मिलाकर, शब्दोत्सव एक ऐसा मंच बनकर उभरा, जहां विचार, संस्कृति और राष्ट्रबोध एक साथ संवाद करते नजर आए।
‘शब्द साधकों को सात्विक रहना चाहिए’ दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में गत 2 जनवरी को ‘दिल्ली शब्दोत्सव’ का शुभारम्भ हुआ।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि शब्द ब्रह्म है। इसीलिए उनके साधकों को सात्विक रहना चाहिए। शब्दों को सही अर्थ में प्रस्तुत करना आवश्यक है। उन्होंने शब्दोत्सव के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह गर्व की बात है कि हम एआई के युग में है। लेकिन इसको संस्कृति से जोड़ना बहुत जरूरी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि वैज्ञानिक उन्नति के साथ साथ संस्कारिक उन्नति भी आवश्यक है, क्योंकि हमारी जड़ें इतनी मजबूत हैं कि आज इतने आक्रमणों के बावजूद हम यथावत बने हुए हैं। दिल्ली सरकार में संस्कृति और पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली की संस्कृति देशविरोधी और धर्म विरोधी हो रही थी जिसे रोकने का काम दिल्ली सरकार और शब्दोत्सव ने किया है।

‘शक्तिशाली बनने के लिए आत्मनिर्भर होना जरूरी’
‘स्वावलंबन से शौर्य’ सत्र का संचालन इंडिया फाउंडेशन के निदेशक कैप्टन आलोक बंसल ने किया। चर्चा के दौरान वॉइस एडमिरल (सेनि.) शेखर सिन्हा ने नौसना में तमाम नई तकनीकों और हथियारों के बारे में जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशन में देश में रक्षा अनुसंधान और विकास में काफी प्रगति हुई है। एयर चीफ मार्शल (सेनि.) राकेश भदौरिया ने कहा कि अगर हम अपनी खुद की एआई जैसी नई तकनीकी विकसित नहीं करेंगे तो पीछे छूट जाएंगे क्योंकि इस समय इन्हीं का प्रचलन है। उन्होंने अत्याधुनिक एयरोस्पेस इंडस्ट्री में प्रयोग होने वाली तकनीक से अवगत कराया। लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि.) दुष्यन्त सिंह ने बताया कि आईआईटी चेन्नई द्वारा बनाए मोबाइल कम्युनिकेशन तंत्र के जरिए ही ऑपरेशन सिंदूर सफल हुआ। यह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। हमें रक्षा बजट में सुधार लाना होगा। रक्षा विशेषज्ञ प्रो. राजीव नयन ने कहा कि अगर आप एक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहते हैं तो दूसरे देशों पर निर्भरता नहीं रखनी चाहिए। इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनना होगा।

‘आतंकी विचारधारा को समाप्त करना जरूरी’
‘भीतर का रण : आंतरिक मोर्चे की चुनौतियां’ सत्र का संचालन श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के निदेशक बिनय सिंह ने किया। सत्र में देश की आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद, वैचारिक संघर्ष एवं प्रशासनिक चुनौतियों पर गंभीर और तथ्यपरक विमर्श हुआ। इस सत्र में प्रतिष्ठित वक्ताओं के रूप में आदित्य राज कौल (वरिष्ठ पत्रकार), जैकब थॉमस (पूर्व पुलिस महानिदेशक, केरल) और एस. पी. वैद (पूर्व पुलिस महानिदेशक, जम्मू-कश्मीर) उपस्थित रहे। सत्र की शुरुआत जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से पूर्व और पश्चात की स्थिति पर प्रश्न से हुई। इस प्रश्न के उत्तर में वक्ताओं द्वारा बताया गया कि अनुच्छेद 370 हटने से पहले जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की घटनाएं अधिक थीं। इसे हटाए जाने के बाद स्थिति में व्यापक परिवर्तन देखने को मिला है।

जैकब थॉमस ने बताया कि केरल में दो प्रमुख बंदरगाह हैं, जहां से बड़े पैमाने पर आयात-निर्यात होता है। इन बंदरगाहों के माध्यम से केवल वैध वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि हथियारों, मादक पदार्थों और अन्य अवैध सामग्री की आवाजाही भी होती है, जिससे आतंकवाद को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन मिलने की आशंका बनी रहती है। इस संदर्भ में भूमि, धन और अवैध गतिविधियों के आपसी संबंधों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। आदित्य राज कौल ने कहा कि आतंकवाद की विचारधारा को समाप्त करना अत्यंत कठिन है। आतंकवाद केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से संचालित होता है।
‘कुतुब मीनार ही थी वेदशाला’
‘हिंदू इतिहास’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार राकेश शुक्ला ने किया। चर्चा के दौरान अयोध्या हनुमंत पीठ के पीठाधीश्वर मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि वेद कहते हैं, सत्य चरित रहें, सत्यनिष्ठ रहें और ये सभी सिद्धांत वर्तमान ब्रह्मांड में जीवित हैं। हमें झूठ पढ़ाया गया कि हमारा इतिहास नहीं है। यह एक दुष्प्रचार है। हमारे वेद, पुराण, उपनिषद्,महाकाव्य इतिहास ही तो हैं। हमारी प्राचीन पुस्तकों में राजपरिवारों की 40-50 पीढ़ियों को वंशावली मिलती है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है तो और क्या है। जिन्हें वेद और संस्कृत का भी ज्ञान नहीं है, वे भी हमारे धर्म ग्रंथों की व्याख्या करने लगते हैं जो कि अज्ञानता को परिलक्षित करता है।
योग प्रशिक्षक और संस्कृत तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों की अध्येता अमी गणात्रा ने कहा कि हमारे प्राचीन ग्रंथ वैज्ञानिक हैं और सामाजिक दृष्टिकोण को साथ लेकर चलते हैं। आज के दौर में जब इन ग्रंथों की प्रामाणिकता सबके सामने आ रही है तो लोगों को थोड़ा कष्ट हो रहा है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा ने बताया कि पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि कुतुब मीनार वेदशाला रही है। कुतुब मीनार के चारों तरफ 27 मंदिर थे। इन्हें तोड़कर मीनार बनाई गई। आप जब भी कुतुब मीनार के ऊपर से उसकी छाया की तस्वीर लेंगे तो वह कमल की आकृति में दिखती है।
युवाओं ने जमाया रंग

दिल्ली शब्दोत्सव 2026 ने साहित्य, संस्कृति और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है। ‘भारत अभ्युदय’ की थीम पर आधारित इस उत्सव में देश के प्रखर विचारकों ने हिस्सा लिया। दिल्ली एनसीआर के लगभग 46 विश्वविद्यालयों ने इसमें हिस्सा लिया। शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता युवाओं की सक्रिय भागीदारी रही। विशेष रूप से हरियाणा के पंडित लखमी चंद राजकीय प्रदर्शनकारी एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय, रोहतक के छात्रों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी। सुपवा के दृश्य कला और फिल्म संकाय के छात्रों ने न केवल सत्रों में हिस्सा लिया, बल्कि अपनी रचनात्मक कलाकृतियों और लघु फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के आधुनिक पक्ष को भी प्रस्तुत किया। इन छात्रों की उपस्थिति ने यह दर्शाया कि नई पीढ़ी अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति को अपनी जड़ों के साथ जोड़ने के लिए कितनी तत्पर है। इस दौरान साहित्य मंच से 14 प्रकाशकों की 40 से अधिक पुस्तकों का विमोचन हुआ। शाम की सांस्कृतिक सभाओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कुल छह सांस्कृति संध्याएं हुईं। हर्षदीप कौर, हंसराज रघुवंशी, प्रहलाद सिंह टिपानिया के कार्यक्रम में युवाओं की भीड़ नजर आई। कार्यक्रम में आयोजित ‘जेन-जी संवाद’ और ‘ओपन माइक’ सत्रों ने युवाओं को अपनी बात खुलकर रखने का मौका दिया। तीन दिन के दौरान 1 लाख से ज्यादा लोग शब्दोत्सव में आए। दिल्ली सरकार ने इस पहल को भविष्य में और भी भव्य रूप देने का संकल्प लिया गया है।
‘माइथोलॉजी भारत का शब्द नहीं’
‘मिथक का सत्य’ सत्र का संचालन पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने किया। चर्चा के दौरान ‘भारत ज्ञान’ के संस्थापक प्रख्यात वक्ता और लेखक डीके हरि ने कहा कि माइथोलॉजी एक अंग्रेज़ी शब्द है, जिसका प्रयोग लगभग 700 वर्षों से पश्चिम में हो रहा है, जबकि इसका मूल ग्रीक शब्द मिथोस प्लेटो, अरस्तू और हेरोडोटस के समय (लगभग 2500 वर्ष पूर्व) से प्रचलन में था। यूरोप में 350 ईस्वीं के बाद जब ईसाईकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, तब उससे पूर्व की सभी स्थानीय, प्राकृतिक और दार्शनिक परंपराओं को एक झटके में काट दिया गया और उन्हें मिथोस कहकर अवैध ठहरा दिया गया। यही प्रवृत्ति बाद में माइथोलॉजी के रूप में स्थापित हुई। भारतीय भाषाओं में-चाहे संस्कृत हो, तमिल, कन्नड़, पंजाबी या असमिया, अपने ग्रंथों के लिए माइथोलॉजी शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। लेखिका आरती अग्रवाल ने कहा कि यदि कोई दो सार्वभौमिक तत्व हैं तो वे हैं-ॐ और गो। उन्होंने वैदिक और पौराणिक संदर्भों का उदाहरण देते हुए कहा कि कृषि, यज्ञ, गृहस्थ जीवन और सामाजिक संरचना-सभी में गो की केंद्रीय भूमिका रही है। छांदोग्य उपनिषद की सत्यकाम जाबाल कथा के माध्यम से उन्होंने गो-सेवा को आत्मिक शुद्धि और ब्रह्मज्ञान से जोड़ा।
‘विर्मश गढ़ने में सिनेमा की महत्वपूर्ण भूमिका’
‘सिनेमा में हिंदू’ सत्र संचालन फिल्म निर्माता एवं निर्देशक अतुल गंगवार ने किया। चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एवं धुरंधर फिल्म के अनुसंधान सलाहकार आदित्य राज कौल ने कहा कि इस फिल्म के आते ही कुछ फिल्म समीक्षकों ने इसका विरोध किया कि यह सांप्रदायिक माहौल खराब करने का काम करेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आदित्य ने कहा कि भारतीय विमर्श की फिल्मों को हमेशा से आलोचना झेलनी पड़ी है। फिर भी इस तरह की फिल्में बनना बंद नहीं हुई हैं जोकि एक सकारात्मक संदेश है। फिल्म निर्देशक अश्विनी कुमार ने बताया कि भारत में सिनेमा ने शुरू से ही विर्मश गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिल्म निर्माता और फिल्म महोत्सव आयोजक प्रशांत कश्यप ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश जितना ऊर्जावान रहेगा उतना हिन्दू भी ऊर्जावान रहेगा। इसीलिए हिंदुओं को संगठित करने का काम करना होगा।

‘वंदेमातरम् में है मां शक्ति की आराधना’
‘वंदे मातरम् और भारत’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने किया। चर्चा के दौरान सूचना प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने कहा कि भारतीय इतिहास हिंदुओं के प्रति निर्मम और क्रूर रहा है। इसी चीज को बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंदमठ में उद्धृत किया है। आनंदमठ में केवल मातृभूमि की वंदना की गई है और इससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार राज किशोर ने कहा कि वंदे मातरम् में मां शक्ति की आराधना है। ऐसे में क्या हम अपनी मां को ही खंडित करने की चेष्टा करेंगे! वंदे मातरम् हमारी सांस्कृतिक चेतना को संबोधित करता है। ऐसे में हम यदि उसकी आलोचना या विरोध करते हैं तो यह हमारी संकुचित मानसिकता को प्रदर्शित करता है। अधिवक्ता और लेखक शिवम रघुवंशी ने कहा कि उन्होंने बंगाल पर अपनी पुस्तक लिखते वक्त वहां हुए सामाजिक परिवर्तन को बहुत करीब से देखा है। वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए बंगाल को गर्त में धकेलने का काम किया है। लेखक दिगंता चक्रबर्ती ने कहा कि बंगाल की वर्तमान स्थित चिंताजनक है। वंदे मातरम् गीत कोई सांप्रदायिक गीत नहीं है। यह तो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह को और गति प्रदान करने के लिए लिखा गया था।
‘सबका साथ सबका विकास ही विजन’
‘दक्षिणपथ’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने किया। चर्चा के दौरान भाजपा के प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि आजादी के बाद से ही उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों को भाषा के नाम पर लड़ाने का काम किया गया है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी सरकार के नेतृत्व वाली सरकार ने काशी तमिल संगमम संवाद के माध्यम से यह दूरी पाटने का काम किया है। भाजपा नेता माधवी लता कहा कि मोदी सरकार सबका साथ सबका विकास के विजन को लेकर आगे बढ़ रही है। इसी कदम को और मजबूत करने के लिए उसने उत्तरपथ योजना बनाई है जिसमें दक्षिण और उत्तर की परिपाटी को एक साथ लाने की कोशिश है। भारत में ऐसे बहुत लोग हैं जिनका खून फिलिस्तीन के लिए तो खौलता है, लेकिन जब बात अपने देश की आती है तो उनकी जुबान सिल जाती है।
‘भारत को एकता के सूत्र में बांधना ही हिंदुत्व’
‘संघे शक्ति कलाैयुगे’ सत्र का संचालन सोशल मीडिया विशेषज्ञ राहुल कौशिक ने किया। चर्चा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि वंदे मातरम् बंगाल विभाजन के समय एक मंत्र बन गया था। इसके व्यापक विस्तार को देखते हुए अंग्रेजों ने इस गीत पर प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार का जीवन राष्ट्र को समर्पित था। डॉ. साहब ने संघ की स्थापना ही सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर सामाजिक सुधार के लिए की थी। उन्होंने संघ से जुड़ने की तीन प्रक्रिया बताई हैं- शाखा, विचार एवं कार्य। उन्होंने कहा कि समय चाहे जितना भी प्रतिकूल हो, संघ की शाखा निरंतर लगती है। उन्होंने हिंदुत्व के संदर्भ में कहा कि भारत को एकता के सूत्र में बांधना ही हिंदुत्व है। संघ को सबसे बड़ा संगठन कहलाने की लालसा नहीं है, बल्कि यह समाज में विलीन हो समरसता का भाव स्थापित करना चाहता है। उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन सामाजिक सुधार की दिशा में कार्य करता है और इसको समाज के सभी वर्गों के साथ समन्वय स्थापित कर किया जा सकता है। सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि को ध्यान में रखते हुए इसे अपनाया गया है। हम भारत को एक सूत्र या कहें तो एक शाखा में पिरोने का प्रयास कर रहे हैं, जिसको हिंदुत्व के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके।

‘न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता जरूरी’
‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’ सत्र का संचालन सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने किया। चर्चा के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता अमन लेखी ने कहा कि भारतीय न्यायप्रणाली में न्यायाधीश आधार स्तम्भ हैं। इसीलिए उनकी नियुक्ति में पारदर्शिता होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विक्रम जीत बनर्जी ने बताया कि संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत में स्पष्ट लिखा है कि प्रत्येक भारतीय के लिए समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। बाबासाहब आंबेडकर भी इसके हिमायती थे। लेकिन यह आज तक लागू नहीं हो पाई है। इसके पीछे न्यायतंत्र की कुछ कमियां भी हैं जोकि धीरे धीरे सुधार की ओर अग्रसर हैं। भारतीय न्यायप्रणाली के पास समस्याओं के भारतीय समाधान मौजूद हैं। इसके बावजूद औपनिवेशिक मानसिकता को अपनाना मानसिक गुलामी का प्रतीक है। इसका समाधान जल्द होना चाहिए। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश में नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन लागू होना चाहिए ताकि न्यायिक व्यवस्था में सुधार और विकास हो सके।
‘धर्म को लेकर ज्यादा जागरूक हैं युवा’
‘जेन-जी डायलॉग्स : विकसित भारत के सारथी’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मीनाक्षी कंडवाल ने किया। चर्चा के दौरान फिल्म निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि पुराने होने से कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं होती और न नवीन होने से कमतर। सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर विशाल चौरसिया ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने सबसे पहले युवाओं से भारत का सही अर्थ समझने का आह्वान किया था। फिल्म अभिनेत्री भाषा संबुली ने कहा कि बनारस में दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती देखकर उन्हें भारतीय संस्कृति की विराटता समझ आई। गायिका अभिलिप्सा पांडा ने कहा कि युवाओं को अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।
‘मदरसा बोर्ड को समाप्त किया’
‘धर्मरक्षक धामी’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने किया। चर्चा के दौरान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बताया कि उनकी सरकार ने उत्तराखंड में 600 से ज्यादा अवैध ढांचों को तोड़ने का काम किया है। यह लैंड जिहाद के ऊपर एक बड़ी कार्रवाई है। उनकी सरकार ने सबसे पहले संविधान सम्मत समान नागरिक संहिता को लागू करने का काम किया। यह शब्दोत्सव भारतीय संस्कृति का संवाहक बनेगा। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि हमने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। हमारी सरकार अपलसंख्यक शिक्षा में सुधार के लिए प्रयासरत है ताकि कोई भी देशविरोधी गतिविधियों में शामिल न हो सके।
‘भारत को समझना हमारे लिए आवश्यक’
‘भारत की भारतीय अवधारणा’ सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अरुण आनंद ने किया। चर्चा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि हर भारतीय को पहले यह समझना होगा कि हम क्या हैं। अमेरिकी राजनीतिज्ञ और लेखक सैमुअल हंटिंगटन की एक पुस्तक है, ‘हू आर वी।’ में लेखक ने कहा है कि राष्ट्र समाज के नाते हम कौन हैं, जब तब हम इसे तय नहीं करते तब तक हम अपनी प्राथमिकता और दिशा तय नहीं कर सकते। डॉ. वैद्य ने कहा कि आजादी के बाद भी हम लोग पश्चिम की नकल ही करते रहे हैं। 2014 के चुनाव के परिणामों के बाद इंग्लैंड के ‘द गार्डियन’ समाचार पत्र ने अपने संपादकीय में लिखा है कि 18 मई 2014 का दिन भारत के इतिहास में विशेष रूप से लिखा जाएगा कि आज भारत से अंग्रेज चले गए। ऐसे में अगर हमें भारत की दिशा तय करनी है तो दुनिया में हमारी भूमिका क्या है, हमें पहले इसे समझना होगा।

















