भारतीय सभ्यता की आत्मा किसी एक रंग, एक स्वर या एक स्वाद में सीमित नहीं रही; वह सदैव विविधताओं के सह-अस्तित्व से निर्मित हुई है। इस सभ्यता ने जहाँ अनेकता को स्वीकार किया, वहीं उसे एकात्मता में रूपांतरित करने की विलक्षण क्षमता भी विकसित की। भारतीय जीवन में भोजन और संगठन दोनों ही केवल उपयोगिता तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीकों के रूप में विकसित हुए।
खिचड़ी भारतीय रसोई की वह मौन कविता है, जिसमें भिन्न-भिन्न अन्नकण अपनी अस्मिता खोए बिना एक साझा स्वाद में ढल जाते हैं। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय समाज का वह सांस्कृतिक संगठन है, जिसमें विविध सामाजिक इकाइयाँ अपने वैयक्तिक स्वर को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रधर्म के सामूहिक राग में संलग्न होती हैं।
खिचड़ी : लोकजीवन की सात्त्विक लय
खिचड़ी किसी एक वर्ग, क्षेत्र या अवसर का भोजन नहीं; वह भारतीय लोकजीवन की साझा थाती है। इसमें न वैभव का प्रदर्शन है, न भेद का आग्रह केवल संतुलन, सहजता और पोषण की सात्त्विक चेतना है। चावल और दाल, जल और अग्नि के स्पर्श से, जब एकरस होते हैं, तब एक ऐसा स्वाद जन्म लेता है जो संगति से उत्पन्न होता है, आधिपत्य से नहीं।
खिचड़ी का इतिहास केवल एक व्यंजन का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की दीर्घ, सात्त्विक और लोकमूलक यात्रा का इतिहास है। इसकी जड़ें हजारों वर्ष पूर्व प्राचीन भारत के आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलती हैं, जहाँ इसे सुपाच्य, संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में वर्णित किया गया है। आयुर्वेद में खिचड़ी को त्रिदोष-शामक आहार माना गया, जिसे रोग, उपवास और साधना तीनों स्थितियों में उपयुक्त समझा गया। यह वही भोजन है, जो शरीर को श्रम नहीं देता, बल्कि उसे विश्राम प्रदान करता है। भारतीय महाकाव्य परंपरा में भी खिचड़ी की उपस्थिति उल्लेखनीय है। महाभारत में द्रौपदी द्वारा पांडवों को खिचड़ी खिलाने की कथा तथा सुदामा–कृष्ण प्रसंग में सादे भोजन की महिमा, खिचड़ी को केवल आहार नहीं, बल्कि भक्ति, स्नेह और समानता का प्रतीक बना देती है।
मध्यकाल में खिचड़ी भारतीय रसोई से निकलकर ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का हिस्सा बनती है। मोरक्को के प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता (14वीं शताब्दी) ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में भारत में प्रचलित इस सरल किंतु पौष्टिक भोजन का उल्लेख किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि खिचड़ी तत्कालीन जनजीवन में व्यापक रूप से स्वीकृत थी। मुगल काल में, विशेषतः अकबर के शासनकाल में, खिचड़ी को नया वैभव प्राप्त हुआ। आइन-ए-अकबरी में खिचड़ी की सात विधियों का विवरण मिलता है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह व्यंजन केवल श्रमिक वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि शाही रसोई में भी सम्मानित स्थान रखता था। मुगलों ने इसमें केसर, घी और मेवों का प्रयोग कर इसे शाही स्वरूप दिया, किंतु इसकी मूल सादगी बनी रही यही इसकी सांस्कृतिक शक्ति थी।
ब्रिटिश काल में खिचड़ी ने एक नई सांस्कृतिक यात्रा आरंभ की। उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज़ों ने भारतीय खिचड़ी को अपने स्वादानुसार ढालकर ‘केडगेरी’ (Kedgeree) के रूप में अपनाया, जिसमें मछली और अंडे जोड़े गए। यह व्यंजन इंग्लैंड में नाश्ते का हिस्सा बन गया और इस प्रकार खिचड़ी ने औपनिवेशिक सीमाओं को लांघकर वैश्विक पहचान प्राप्त की। आधुनिक भारत में खिचड़ी आज भी अपनी जीवंतता बनाए हुए है उत्तर भारत की सादी खिचड़ी से लेकर दक्षिण भारत की बिसी बेले भात, पूर्वी भारत की भुनी खिचड़ी और पश्चिम भारत की विविध स्थानीय शैलियों तक, यह व्यंजन भारत की सांस्कृतिक विविधता का स्वाद बन चुका है। इसी सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हुए 2017 में भारत सरकार द्वारा खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन के रूप में प्रतिष्ठित किए जाने की घोषणा ने इसे एक प्रतीकात्मक राष्ट्रीय पहचान प्रदान की।
खिचड़ी का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा। वैश्विक स्तर पर इसके सांस्कृतिक प्रतिरूप देखने को मिलते हैं। मिस्र का राष्ट्रीय व्यंजन ‘कोशारी’, जिसमें चावल, दाल और पास्ता का संयोजन है, को अनेक विद्वान भारतीय खिचड़ी से प्रेरित मानते हैं। इसी प्रकार मध्य पूर्व का ‘मुजद्दरा’ (चावल और दाल से बना व्यंजन) भी खिचड़ी की वैश्विक समरस परंपरा की ओर संकेत करता है। नाम की दृष्टि से भी खिचड़ी की जड़ें भारतीय भाषिक परंपरा में गहराई से धँसी हैं इसका शब्द-उद्गम संस्कृत के ‘खिच्चा’ से माना जाता है, जो मिश्रण और संयोजन के भाव को व्यक्त करता है।
इस प्रकार खिचड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का इतिहास, दर्शन और वैश्विक संवाद है एक ऐसा स्वाद, जो समय, सत्ता और सीमाओं से परे जाकर आज भी मानव समाज को सरलता, समरसता और संतुलन का संदेश देता है।
खिचड़ी हमें यह सिखाती है कि समरसता समानता नहीं, बल्कि संतुलित सह-अस्तित्व का नाम है जहाँ हर घटक आवश्यक है, पर कोई सर्वशक्तिमान नहीं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : समाज की अनुशासित साधना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय समाज की उस साधना का प्रतिरूप है, जो व्यक्ति को उसके संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठाकर सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर उन्मुख करती है। संघ की शाखा केवल अभ्यास-स्थल नहीं, बल्कि संस्कार-पीठ है जहाँ स्वयंसेवक अपना अहं नहीं, बल्कि कर्तव्य साधता है।
संघ की संरचना में नायक नहीं, कार्य प्रधान है; प्रचार नहीं, प्रेरणा प्रमुख है; और सत्ता नहीं, सेवा केंद्रीय मूल्य है। यही कारण है कि संघ भारतीय समाज में एक मौन, निरंतर और अनुशासित सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में कार्य करता रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास भी, किसी अर्थ में, खिचड़ी की भाँति ही है जहाँ विविध तत्व, समय और परिस्थितियाँ मिलकर एक दीर्घकालिक सामाजिक संरचना का निर्माण करती हैं। 27 सितंबर 1925, विजयदशमी के पावन अवसर पर, नागपुर के मोहितेवाड़ा की एक साधारण-सी भूमि पर परमपूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन पाँच स्वयंसेवकों की छोटी-सी शाखा से आरंभ हुआ। यह आरंभ उसी प्रकार सादा और सात्त्विक था, जैसे खिचड़ी का पहला कौर न आडंबर, न प्रदर्शन; केवल उद्देश्य और साधना। संघ की स्थापना ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के उस दौर में हुई, जब भारतीय समाज आत्मविश्वास, सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के संकट से गुजर रहा था। ऐसे समय में संघ ने स्वयं को एक सांस्कृतिक स्वयंसेवी संगठन के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना, अनुशासन और सेवा के माध्यम से राष्ट्रबोध को जाग्रत करना था।
1926 में संगठन को ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम प्राप्त हुआ और नियमित दैनिक शाखाओं की परंपरा आरंभ हुई। इन शाखाओं में शारीरिक व्यायाम, बौद्धिक चर्चा और सांस्कृतिक संस्कार तीनों का ऐसा समन्वय दिखाई देता है, जो खिचड़ी के चावल और दाल के संतुलित मेल की स्मृति कराता है। डॉ. हेडगेवार के नेतृत्व में संघ ने यह विश्वास स्थापित किया कि राष्ट्र की शक्ति राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि समाज के चरित्र निर्माण से उपजती है। 1940 में हेडगेवार के निधन के पश्चात माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) के नेतृत्व में संघ का विस्तार हुआ और उसकी वैचारिक संरचना अधिक स्पष्ट हुई।
संघ का इतिहास सहज नहीं, बल्कि उतार-चढ़ावों से भरा रहा है जैसे खिचड़ी पकने की प्रक्रिया में अग्नि की तीव्रता भी सहनी पड़ती है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगाया गया प्रतिबंध, और फिर 1975 के आपातकाल में दूसरा प्रतिबंध ये दोनों कालखंड संघ के लिए कठोर परीक्षा की घड़ियाँ थीं। किंतु इन प्रतिबंधों के बीच भी संघ की सामाजिक जड़ें बनी रहीं। प्रतिबंध हटने के बाद संघ से प्रेरित राजनीतिक धारा जनसंघ और आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी भारतीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगी। इस प्रकार संघ, प्रत्यक्ष राजनीति में न रहते हुए भी, भारतीय लोकतंत्र के वैचारिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण घटक बन गया।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा का प्रमुख वाहक माना जाता है। इसकी दृष्टि में ‘हिंदू राष्ट्र’ कोई संकीर्ण राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सभ्यता-बोध है, जिसमें समाज की विविध इकाइयाँ अपनी पहचान बनाए रखते हुए एक साझा राष्ट्रीय चेतना में जुड़ती हैं ठीक उसी प्रकार जैसे खिचड़ी में विभिन्न घटक मिलकर एक समग्र और संतुलित भोजन बनाते हैं। संघ का ‘समरसता’ का विचार सामाजिक विभाजनों को मिटाने की नहीं, बल्कि उन्हें एक बड़े सांस्कृतिक ढाँचे में संयोजित करने की प्रक्रिया है।
इक्कीसवीं सदी में संघ भारत के साथ-साथ विदेशों में भी विस्तारित हुआ है और आज इसे विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में गिना जाता है। 2025 में अपने स्थापना के सौ वर्ष पूरे करना संघ की इस दीर्घ यात्रा का प्रतीक है एक छोटी-सी शाखा से आरंभ होकर वैश्विक उपस्थिति तक पहुँचना। इस यात्रा में संघ का स्वरूप बदला है, विस्तार हुआ है, पर उसका मूल आग्रह अनुशासन, सेवा और सांस्कृतिक एकात्मता अब भी बना हुआ है।
इस प्रकार, यदि खिचड़ी भारतीय समाज की रसात्मक समरसता का प्रतीक है, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उसकी संगठनात्मक अभिव्यक्ति प्रतीत होता है। दोनों का लक्ष्य अलग होते हुए भी अंततः एक ही दिशा की ओर संकेत करता है विविधताओं के बीच संतुलन, सादगी के भीतर शक्ति और साधारण के माध्यम से असाधारण समाज-निर्माण।
सांकेतिक समरसता : खिचड़ी से संघ तक
खिचड़ी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच का साम्य न तो सतही है और न ही केवल रूपात्मक; यह साम्य गहरे स्तर पर सांकेतिक, आंतरिक और सांस्कृतिक है। खिचड़ी जिस प्रकार भिन्न-भिन्न अन्नकणों को एक पात्र में समाहित कर, बिना उनकी अस्मिता मिटाए, एक संतुलित और पोषक स्वरूप प्रदान करती है, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज की विविध इकाइयों को जोड़कर एक संगठित सांस्कृतिक चेतना का निर्माण करता है। खिचड़ी का स्वभाव विभाजन का नहीं, समावेशन का है वह किसी घटक को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि सभी को अपने भीतर स्थान देकर सामूहिक पूर्णता रचती है। संघ का समरसता-बोध भी इसी समावेशी दृष्टि पर आधारित है, जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की भिन्नताएँ टकराव का कारण नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संरचना के आवश्यक घटक मानी जाती हैं।
खिचड़ी में स्वाद का कोई अहं नहीं होता; न चावल स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करता है, न दाल अपनी प्रधानता जताती है। यही गुण संघ की संगठनात्मक चेतना में भी दृष्टिगोचर होता है, जहाँ व्यक्ति का अहं ‘कार्य’ और ‘कर्तव्य’ में विलीन हो जाता है। संघ की शाखा में नायक नहीं, सहभागिता है; नेतृत्व नहीं, अनुशासन है; और प्रचार नहीं, साधना है। खिचड़ी सादा होकर भी पूर्ण है उसकी पूर्णता वैभव में नहीं, संतुलन और सादगी में निहित है। इसी प्रकार संघ भी सादगी में शक्ति का विश्वास करता है; उसके लिए बाहरी प्रदर्शन से अधिक महत्त्व आंतरिक संस्कार, नियमित अभ्यास और दीर्घकालिक साधना का है। यदि खिचड़ी शरीर को पोषण देकर उसे स्वस्थ बनाती है, तो संघ समाज को संस्कार, चरित्र और राष्ट्रबोध का पोषण प्रदान करता है। यह समरसता किसी आदेश, घोषणा या वैचारिक दबाव से नहीं, बल्कि अनुभव, अभ्यास और समय की धीमी आँच पर पककर आकार लेती है।
भारतीय संस्कृति में खिचड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पूर्ण थाली का संस्कार है। वह अकेली नहीं आती; उसके साथ दही की शीतलता, घी की स्निग्धता, पापड़ की कुरकुराहट और अचार का तीखापन भी होता है। ये सभी तत्व परस्पर भिन्न होते हुए भी एक-दूसरे के विरोधी नहीं बनते, बल्कि अपने-अपने गुणों के साथ खिचड़ी की सरलता को पूर्णता प्रदान करते हैं। दही संतुलन और सौम्यता का प्रतीक है, घी सात्त्विक ऊर्जा और जीवन-शक्ति का, पापड़ अनुशासन और मर्यादा का, तथा अचार विविधता और लोकस्वाद का। यह पूरी थाली भारतीय जीवन-दृष्टि का सजीव रूपक बन जाती है जहाँ जीवन केवल एकरस नहीं, बल्कि विविध रसों से युक्त होकर भी समरस होता है।
इसी सांस्कृतिक संरचना की संगठनात्मक अभिव्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में दिखाई देती है। संघ की समरसता भी किसी एक विचार, वर्ग या व्यक्ति की प्रधानता पर नहीं, बल्कि विविध सामाजिक गुणों के संतुलित समन्वय पर आधारित है। संघ का वार्षिक मकरसंक्रांति महापर्व और सामूहिक भोज इस समरसता का मूर्त और अनुभवजन्य उदाहरण है। उस दिन भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए स्वयंसेवक एक पंक्ति में बैठकर एक ही भोजन ग्रहण करते हैं। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक दूरी के विसर्जन और आत्मीय सहभागिता का संस्कार है। वहाँ ‘समानता’ की औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि सहभागिता की सहज अनुभूति होती है जहाँ ऊँच-नीच, भेद और भिन्नता अपने आप निरर्थक हो जाते हैं।
जैसे खिचड़ी की थाली में घी स्वाद को गहराई और स्थायित्व देता है, वैसे ही संघ में संस्कार संगठन को दीर्घजीवी बनाते हैं। जैसे दही तीखेपन को संतुलित कर देता है, वैसे ही संघ में अनुशासन उग्रता को संयम और मर्यादा में रूपांतरित करता है। पापड़ की भाँति संघ का नियमबद्ध ढाँचा सादा दिखते हुए भी संरचना को दृढ़ बनाता है, और अचार की तरह समाज की विविध परंपराएँ संघ की सांस्कृतिक चेतना को बहुरंगी और जीवंत बनाए रखती हैं। यहाँ व्यक्ति का अहं, खिचड़ी के अन्नकणों की भाँति, सामूहिक उद्देश्य में विलीन होकर अपनी सार्थकता प्राप्त करता है।
इस प्रकार संघ का मकरसंक्रांति भोज और खिचड़ी की पारंपरिक थाली दोनों मिलकर भारतीय संस्कृति के उस मौन सत्य को उद्घाटित करते हैं कि समाज का निर्माण घोषणाओं, नारों या तात्कालिक उत्तेजनाओं से नहीं, बल्कि साथ बैठने, साथ खाने, साथ जीने और साथ साधना करने से होता है। यही समरसता भारतीय समाज की स्थायी शक्ति रही है और यही उसका सांस्कृतिक भविष्य भी।
विखंडन के समय में समन्वय और संस्कार का स्वर
समकालीन समाज तीव्र परिवर्तन, पहचान-संघर्ष और वैचारिक ध्रुवीकरण के जटिल दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और डिजिटल संचार ने जहाँ भौतिक सुविधाओं और सूचना के विस्तार को संभव बनाया है, वहीं सामाजिक संबंधों में दूरी, असहिष्णुता और विखंडन की प्रवृत्तियों को भी तीव्र किया है। विचारों की भिन्नता अब संवाद का नहीं, टकराव का रूप लेती जा रही है, और त्वरित प्रतिक्रियाएँ दीर्घकालिक दृष्टि पर भारी पड़ने लगी हैं। ऐसे समय में खिचड़ी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों अपने-अपने क्षेत्र में भारतीय सांस्कृतिक चेतना के ऐसे प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो यह स्मरण कराते हैं कि इस सभ्यता का उत्तर संघर्ष या वर्चस्व नहीं, बल्कि समन्वय, संयम और सह-अस्तित्व रहा है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव यह स्वीकार किया है कि एकता का निर्माण विविधता को मिटाकर नहीं, बल्कि उसे संतुलित रूप में साधकर ही संभव है। खिचड़ी की थाली और संघ की शाखा दोनों इसी संतुलन का अभ्यास हैं। खिचड़ी धीमी आँच पर पकती है; उसमें उतावलापन नहीं, धैर्य है। उसी प्रकार संघ का चरित्र-निर्माण भी तात्कालिक उत्तेजना पर नहीं, दीर्घकालिक साधना और अनुशासन पर आधारित है। दोनों यह संदेश देते हैं कि वास्तविक शक्ति प्रदर्शन में नहीं, बल्कि साधना में निहित होती है; और स्थायित्व उग्र प्रतिक्रियाओं से नहीं, निरंतर अभ्यास और आत्मसंयम से प्राप्त होता है।
आज जब समाज त्वरित समाधानों और तात्कालिक उत्तेजनाओं की ओर आकृष्ट है, तब खिचड़ी की समरस थाली और संघ की संस्कारपरंपरा हमें ठहरकर देखने, समझने और जोड़ने की दृष्टि प्रदान करती हैं। खिचड़ी के साथ परोसी गई दही, घी, पापड़ और अचार केवल स्वाद के घटक नहीं रह जाते, बल्कि जीवन के विविध रसों का संतुलित रूपक बन जाते हैं जहाँ शीतलता, ऊर्जा, अनुशासन और विविधता एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। इसी प्रकार संघ का सामूहिक भोज केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकात्मता की साधना है, जहाँ भिन्न पृष्ठभूमियों के लोग साथ बैठकर, साथ भोजन कर, साझा संस्कार का अनुभव करते हैं।
इस दृष्टि से खिचड़ी केवल भोजन नहीं रह जाती और संघ केवल संगठन नहीं दोनों भारतीय समाज की उस गहरी सांस्कृतिक स्मृति के वाहक बन जाते हैं, जो विखंडन के समय में भी समरसता का स्वर जीवित रखती है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई सूत्र समाज को जोड़कर रख सकता है, तो वह है संस्कृति से उपजा संयम और संस्कार से पोषित समन्वय जो भारतीय सभ्यता की मूल शक्ति रहा है और उसके भविष्य की भी आधारशिला है।
साधारण में असाधारण का बोध
खिचड़ी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों भारतीय जीवन-दर्शन की उस गहन परंपरा के सशक्त प्रतीक हैं, जिसमें साधारण प्रतीत होने वाली वस्तुएँ और संस्थाएँ असाधारण सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। एक ओर रसोई में धीमी आँच पर पकती खिचड़ी है, जो विविध अन्नकणों को समरस कर शरीर को पोषण देती है; दूसरी ओर शाखा में विकसित होती संघ-चेतना है, जो विविध सामाजिक इकाइयों को जोड़कर राष्ट्र-जीवन को संस्कारित करती है। दोनों की यात्रा सीमित स्थल से आरंभ होकर व्यापक समाज तक पहुँचती है और इसी विस्तार में उनकी सांकेतिक शक्ति निहित है।
स्पष्ट है कि खिचड़ी और संघ के बीच का साम्य मात्र रूपात्मक नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक और दार्शनिक स्तर पर स्थित है। खिचड़ी का समावेशी स्वभाव, उसका संतुलित स्वाद और सादगी में निहित पूर्णता संघ की समरसता-दृष्टि, अनुशासन और दीर्घकालिक साधना के समकक्ष प्रतीत होते हैं। जहाँ खिचड़ी किसी घटक को अस्वीकार नहीं करती, वहीं संघ भी समाज की विविधताओं को टकराव का कारण न मानकर सांस्कृतिक एकात्मता के सूत्र में पिरोने का प्रयास करता है।
समकालीन समाज में जब विखंडन, वैचारिक ध्रुवीकरण और तात्कालिक उत्तेजनाएँ सामाजिक संबंधों को कमजोर कर रही हैं, तब खिचड़ी की समरस थाली और संघ की संस्कारपरंपरा यह स्मरण कराती है कि भारतीय सभ्यता का उत्तर संघर्ष या वर्चस्व नहीं, बल्कि संयम, सह-अस्तित्व और निरंतर साधना रहा है। यह समरसता किसी घोषणापत्र से नहीं, बल्कि साथ बैठने, साथ खाने, साथ अभ्यास करने और समय की कसौटी पर तपकर विकसित होती है।
अतः खिचड़ी केवल भोजन नहीं रह जाती और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल संगठन नहीं दोनों भारतीय समाज की उस गहरी सांस्कृतिक स्मृति के वाहक बन जाते हैं, जहाँ साधारण में असाधारण का बोध निहित है। यही बोध भारतीय जीवन-दर्शन की आत्मा है और यही समरसता भविष्य के सामाजिक संतुलन की आधारशिला भी।
लेखक – डॉo मुंकेश कुमार शुक्ल, विषय विशेषज्ञ- पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ।

















