दिल्ली में वर्ष का आरंभ एक ऐसे समारोह से हुआ, जिसकी आज के समय में अत्यंत आवश्यकता है। दिल्ली शब्दोत्सव 2026 ने इस वर्ष दिल्ली में साहित्य को वह मंच दिया, जिसकी आवश्यकता का अनुभव कई वर्षों से किया जा रहा था। वर्षों से साहित्य और पुस्तकों का संसार मिशनरी के चंगुल में था। उसका चेहरा देखने के लिए वामपंथी या कहें कथित प्रगतिशील था, परंतु वह पूरी की पूरी तरह मिशनरी एजेंडे का ही भाग था।
कहने के लिए साहित्य का कथित वाम चेहरा 1936 में आरंभ हुआ था, परंतु उसकी जड़ों के लिए हमें और भी पीछे जाना होगा क्योंकि जो लोग इस साहित्य को लिख रहे थे, उन्हें गढ़ने के लिए प्रयास कब से आरंभ हुए, इसे भी देखना और समझना होगा।
इसे समझने के लिए हमें उन सीएफ एंड्रूज़ को पढ़ना होगा, जिन्हें दीनबंधु की उपाधि दी गई है। सीएफ एंड्रूज अपनी पुस्तक THE RENAISSANCE IN INDIA ITS MISSIONARY ASPECT में साहित्य और मिशनरी एजेंडे के संबंधों को बिना किसी शंका के लिखते हैं।
क्या लिखा था सीएफ एंड्रूज़ ने?
सीएफ एंड्रूज ने अपनी पुस्तक THE RENAISSANCE IN INDIA ITS MISSIONARY ASPECT में उन पहलुओं की बातें की हैं, जिनसे भारत से हिन्दू धर्म को समाप्त कर चर्च के एजेंडे को फैलाया जा सकता है। कैसे हिन्दू धर्म को लोगों के चित्त और मानस से हटाया जा सकता है। इसके लिए उसके मत पूरी तरह से स्पष्ट थे और उसने चरण बद्ध तरीके से लिखा भी है।
उसने साहित्य और महिलाओं को ही अपना माध्यम बनाया। इंडियन वुमनहुड में वह लिखता है कि हालांकि अभी महिलाएं राम चरित्र को गाती हैं, मगर मिशनरी को एज्यूकैटड वुमन चाहिए, जो इस बंधन से मुक्त होकर चर्च की शरण में आयें। उन्होनें तोरू दत्ता का उदाहरण दिया था। तोरू दत्ता ने हालांकि हिन्दू पौराणिक चरित्रों पर ही कविताएं लिखी थीं, परंतु तोरू के पिता ने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई पंथ का दामन थाम लिया था और इसलिए एक ईसाई लड़की का हिन्दू चरित्रों पर कविता लिखना सीएफ एंड्रूज को बहुत अच्छा लगा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि एक दिन इन संस्कृत चरित्रों पर चर्च की विजय होगी।
उसके बाद वह क्या लिखते हैं, उस पर गौर करना चाहिए। वे लिखते हैं कि ““मेरा विश्वास दिनों दिन बढ़ रहा है कि भारतीय स्थितियों में यदि ईसाई सन्देश को स्वाभाविक बनाना है तो यह कला, संगीत और कविता के माध्यम से ही होगा बजाय इसके कि हम विवाद करें और तर्क वितर्क करें। इंग्लैण्ड से भारत के लिए एक ऐसी मिशनरी जरूरी है जिसमें कल्पना रचने की क्षमता हो और जिसमें साहित्यिक या कलात्मक या संगीत की क्षमता हो और वह उच्च क्षमता प्राप्त लोगों के दिल में संवेदनात्मक रूप से प्रवेश कर सके।”
सीएफ एंड्रूज़ की इस बात से साहित्य की महत्ता को समझा जा सकता है और साथ ही इस बात को भी कि कैसे केवल और केवल साहित्य और कला के माध्यम से पूरी संस्कृति का ध्वंस किया जा सकता है।
वे आगे लिखते हैं कि हमें अभी तक यही लगता था कि हम अपने रिलीजियस उपदेशों और अत्यंत व्यवस्थित संस्थानों के माध्यम से भारत को जीत सकते हैं, परंतु इन्होनें कुछ काम ठीक किये हैं परंतु उन्होनें भारत की जमीन को नहीं छुआ है। जबकि दूसरी ओर जब कल्पना को पूर्व की जमीन के साथ जोड़ा जाता है तो भारत के साथ जुड़ाव और लगाव उत्पन्न होगा और तत्काल ही प्रभावी होगा।
तो एंड्रूज़ भारत से जुड़ाव की बात करते हैं परंतु वह जुड़ाव केवल और केवल चर्च के एजेंडे के लिए है।
किस प्रकार की महिला चाहते हैं?
वे कृपाबाई का उदाहरण देते हैं। कृपाबाई ने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई पंथ अपना लिया था। वह ऐसी ईसाई महिला है, जिनका नाम साहित्य में बहुत आदर से लिया जाता है। कृपाबाई के पिता ने परिवार सहित ईसाई पंथ अपना लिया था।
उनका उपन्यास कमला, हिन्दू जीवन और उसके आदर्शों की कहानी है। हाँ, कृपा खुद ईसाई हैं। कृपा की मृत्यु भी बहुत जल्द अर्थात 1894 में हो गई थी, क्योंकि वे अपने नवजात बेटे की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सकी थीं। कृपा के विषय में सीएफ एंड्रूज लिखते हैं कि
“She is the type of educated woman whom India is now producing cultured, refined, imaginative, the Christian product of the new Indian Renaissance. She is the type of educated woman whom India is now producing cultured, refined, imaginative, the Christian product of the new Indian Renaissance.
अर्थात
““वह उस प्रकार की एजुकेटेड वुमन है, जिन्हें भारत अब पैदा कर रहा है अर्थात कल्चर्ड, रिफाइन्ड, इमैजनटिव, एवं भारत के नवजागरण की ईसाई उत्पाद हैं!”
अर्थात कल्पना का प्रयोग भारत को ईसाई बनाने के लिए करने की बात सीएफ एंड्रूज करते हैं और वह भी लगभग दो सौ साल पहले तक से! वे साहित्य और कला का प्रयोग भारत के विनाश के लिए करने की योजना बना रहे हैं।
इसीलिए आवश्यक है शब्दोत्सव
भारत को बचाए रखने के लिए आवश्यक है शब्दोत्सव! आवश्यक है कि भारत की कला और साहित्य भारत की बात कहे और भारत के उदय का विमर्श गढ़े। दिल्ली शब्दोंत्सव में यही हुआ है। उन पुस्तकों पर चर्चाएं हुई हैं और विमोचन हुआ है, जो भारत की चेतना की बात करती हैं, जो भारत के उदय की बात करती हैं। फिर चाहे वे गौ माता पर आधारित पुस्तकें हों, या फिर विश्व हिन्दू परिषद पर! ऑपरेशन सिंदूर हो या फिर पंचपरिवर्तन! पुस्तकों के माध्यम से साहित्य और भारत की बात करता है शब्दोत्सव 2026!

















