हम सब जानते हैं कि फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ा कथित “बड़ी साजिश” प्रकरण लंबे समय से भारतीय न्यायिक और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में रहा है। यह मामला केवल दंगों की आपराधिक जाँच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967) , UAPAके अंतर्गत जमानत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और न्यायिक विवेक के बीच संतुलन जैसे बुनियादी प्रश्नों को सामने रखा।
दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, जबकि 200 से अधिक घायल हुए, ये आंकड़े राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और विभिन्न रिपोर्ट्स से लिए गए हैं, जो अक्सर अनछुए रह जाते हैं।
ये दंगे नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ कुछ जेहादी तत्वों के सहयोग से दिल्ली के रास्ते जाम होने एवं महीनों चले विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़के, लेकिन पुलिस ने इसे एक संगठित साजिश के रूप में पेश किया। एक अनछुआ तथ्य यह भी है कि दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में 15,000 से अधिक पृष्ठ हैं, जिसमें व्हाट्सएप चैट्स, भाषणों और कॉल रिकॉर्ड्स को साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया गया।
अभी 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश इसी संदर्भ में निर्णायक महत्व रखता है, क्योंकि इसमें अदालत ने कुछ आरोपियों को जमानत दी और कुछ को नहीं, और ऐसा करते हुए अपने निर्णय के कारणों को केंद्र में रखा।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष : जमानत पर आरोपी-विशेष दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि अभियोजन की सामग्री से उनके विरुद्ध UAPA के तहत प्रथमदृष्टया मामला बनता है और उनकी भूमिका “केंद्रीय तथा निर्णायक” प्रतीत होती है।
एक अनछुआ संदर्भ यह है कि दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि “बुद्धिजीवी टेररिस्ट ज्यादा खतरनाक होते हैं,” जो शरजील इमाम के भाषणों पर आधारित था, जहां उन्होंने CAA विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की बात की। इसके साथ ही, अदालत ने इसी मामले के पाँच अन्य आरोपियों, जिनमें देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा जैसे कार्यकर्ता शामिल हैं, को कठोर शर्तों के साथ जमानत प्रदान की। इन लोगों को जमानत देते हुए न्यायालय का यह कहना कि हर आरोपी की भूमिका का स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया है और सामूहिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, इस निर्णय का केंद्रीय आधार है।
यह फैसला FIR 59/2020 के तहत आता है, जिसमें कुल 18 आरोपी हैं और ट्रायल अभी तक पूरा नहीं हुआ । सभी आरोपी पुलिस हिरासत में हैं ।
UAPA की कसौटी : प्रथमदृष्टया सत्य का परीक्षण
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) को लागू करते हुए स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर अदालत का दायित्व साक्ष्यों की गहन जांच करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि अभियोजन की सामग्री प्रथमदृष्टया विश्वसनीय प्रतीत होती है या नहीं। यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों के ही अनुरूप है और यह स्थापित करता है कि UAPA मामलों में सामान्य आपराधिक कानून की जमानत-नीति लागू नहीं होती।
UAPA, जो 1967 में आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया, 2004 और 2019 में संशोधित हुआ, इन संशोधनों ने UAPA के मामलों में जमानत मिलने के प्रावधानों को और अधिक कठोर बना दिया। इसी कारण 2020 से 2024 तक UAPA के तहत गिरफ्तार 80% से अधिक जघन्य अपराधों के आरोपियों को जमानत नहीं मिली, जैसा कि NCRB अर्थात राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के डेटा से पता चलता है।
बड़ी साजिश बनाम व्यक्तिगत भूमिका : न्यायिक द्वंद्व
जमानत के कठोर प्रावधानों के बाद भी जमानत होना , यहीं से इस निर्णय की सबसे गंभीर आलोचनात्मक कसौटी सामने आती है। जब अभियोजन यानी सरकारी पक्ष स्वयं पूरे घटनाक्रम को भारत के विरुद्ध “बड़ी साजिश” कहता है, जिसमें विरोध प्रदर्शनों को हिंसा में बदलने की योजना शामिल है, तब सुप्रीम कोर्ट का, जमानत के स्तर पर आरोपियों की भूमिका को इस प्रकार अलग-अलग काटकर देखना , क्या आपराधिक कानून की सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखता है?
भारतीय न्याय संहिता में सामान्य आशय, सामान्य उद्देश्य और षड्यंत्र जैसे सिद्धान्त सामूहिकता की धारणा पर आधारित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी रूप से सही कहा कि जमानत के स्तर पर दोषसिद्धि नहीं होती, परंतु “केंद्रीय और निर्णायक भूमिका” जैसी भाषा ट्रायल से पहले ही एक आंशिक निष्कर्ष का आभास देती है। जबकि चार्जशीट में उल्लेखित अनुसार दंगों के पहले व्हाट्सएप ग्रुप्स में कई संदेशों का आदान प्रदान सामूहिक रूप से हुआ था , जो अपराध के पूर्व मस्तिष्क मिलन या सामान्य आशय बताता है , कोर्ट ने इस सन्दर्भ का संज्ञान या तो नहीं लिया या अनदेखा कर दिया ।
Watali बनाम Najeeb केस : स्वतंत्रता और सुरक्षा का टकराव
UAPA के अंतर्गत जमानत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक यात्रा दो चर्चित केस National Investigation Agency v. Zahoor Ahmad Shah Watali [(2019) 5 SCC 1] और Union of India v. K.A. Najeeb [(2021) 3 SCC 713] के बीच खिंची रेखा से समझी जाती है।
Watali केस के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UAPA में जमानत के लिए साक्ष्यों की गहन जांच नहीं की जाएगी; अगर अभियोजन की सामग्री प्रथम दृष्टया सत्य लगती है, तो जमानत अस्वीकार की जा सकती है, यह कश्मीर में फंडिंग से जुड़े मामले में स्थापित हुआ।
जबकि Najeeb केस के निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर ट्रायल में अत्यधिक देरी हो और हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को प्रभावित करे, तो जमानत दी जा सकती है, यह केरल में एक मामले में दिया गया, जहां आरोपी 5 साल से जेल में था।
वर्तमान दिल्ली दंगे केस के जमानत देने के निर्णय में अदालत का झुकाव Watali रेखा की ओर अधिक दिखाई देता है, जबकि Najeeb , रेखा का व्यावहारिक उपयोग सीमित प्रतीत होता है।
ट्रायल में देरी और संवैधानिक प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि UAPA मामलों में ट्रायल में देरी अपने-आप जमानत का आधार नहीं बनती, हालांकि ट्रायल कोर्ट को सुनवाई तेज़ करने का निर्देश दिया गया। यह दृष्टिकोण विधिक रूप से सुसंगत है, परंतु यह प्रश्न बना रहता है कि क्या संरक्षित गवाहों और जटिल साक्ष्य-प्रक्रिया वाले मामलों में यह निर्देश व्यवहारिक रूप से पर्याप्त है।
इस मामले में ट्रायल 2020 से लंबित है, और 2025 तक केवल 20% गवाहों की जांच हुई, यह देरी कई UAPA मामलों में सामान्य है, जो हिरासत को भी सजा जैसा बना देती है, इसी कारण आतंकी और गद्दारों में इस कानून का भय रहता है ।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं : निर्णय के बाद का नैरेटिव
निर्णय के बाद कुछ विपक्षी नेताओं द्वारा पाँच आरोपियों को जमानत मिलने को “न्याय की जीत” बताना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आंतरिक प्रक्रियाओं पर की गई टिप्पणियों की चर्चा फिर उभरना स्वाभाविक राजनीतिक घटनाक्रम है। विशेष रूप से, अमेरिकी कांग्रेस के 8 डेमोक्रेटिक सांसदों, जिनमें Ilhan Omar, Rashida Tlaib और Zohran Mamdani शामिल हैं, ने भारत के अमेरिकी राजदूत को पत्र लिखकर उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों के पक्ष में बयान दिया। उन्होंने कहा कि 5 साल से जेल में बिना ट्रायल रखना मानवाधिकारों का उल्लंघन है और भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करना चाहिए।
न्यायिक दृष्टि से ये प्रतिक्रियाएँ निर्णय को प्रभावित करने वाली नहीं हैं, किंतु यह अपेक्षा बनी रहती है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की तर्क-प्रक्रिया इतनी स्पष्ट हो कि किसी भी प्रकार के दबाव या प्रभाव की आशंका स्वतः समाप्त हो जाए।
राष्ट्रीय सुरक्षा का आयाम : ‘चिकन नेक’ संदर्भ की सीमा
इस मामले के साथ बांग्लादेश-आधारित कट्टरपंथी तत्वों द्वारा “चिकन नेक” जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्रों को लेकर दिए गए बयानों को जोड़कर भी देखा गया। शरजील इमाम ने अपने एक भाषण में “चिकन नेक” (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) को काटकर पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत से अलग करने की बात की, जिसका समर्थन बांग्लादेशी जेहादी नेताओं ने किया। उदाहरणस्वरूप, बांग्लादेशी टेरर ग्रुप के सदस्यों ने सोशल मीडिया और बयानों में इसे दोहराया, जैसे एक रिपोर्ट में उल्लेखित है कि एक बांग्लादेशी टेररिस्ट ने ममता बनर्जी को “बंगाल को मोदी के शासन से मुक्त करने” के लिए उकसाया और चाइना की मदद से “चिकन नेक” काटने की धमकी दी।
विधिक रूप से सुप्रीम कोर्ट ऐसे बयानों पर तब तक विचार नहीं कर सकता, जब तक अभियोजन उनका किसी अभियुक्त से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध सिद्ध न करे। फिर भी, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में न्यायिक आदेशों का एक व्यापक संदेशात्मक प्रभाव भी होता है। विदित हो कि शरजील के बयान में चाइनीज डाइमेंशन का उल्लेख है, इसी कारण सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इसे भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर हमले के रूप में देखा गया।
जमानत आदेश और ‘संदेश’ का प्रश्न
UAPA जैसे कानूनों के अंतर्गत पारित आदेश केवल आरोपी और अभियोजन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे समाज और राष्ट्र को भी एक संदेश देते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि अदालत अपनी भाषा और तर्क में यह स्पष्ट करे कि उसका आदेश किसी भी प्रकार के पृथकतावादी, कट्टरपंथी या राष्ट्र-विरोधी विचार को वैधता प्रदान नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का दीर्घकालिक महत्व
राष्ट्रीय महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय केवल कानूनी निष्कर्ष नहीं, बल्कि लोकतंत्र में न्याय के मानक भी निर्धारित करते हैं। इस फैसले का दीर्घकालिक मूल्यांकन ट्रायल की गति और निष्पक्षता पर निर्भर करेगा।
















