नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय से दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करने के आदेश को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह फैसला सुनाया।
पांच जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि कथित साजिश में दोनों की भूमिका दूसरे आरोपितों से अलग है। दोनों की भूमिका साजिश रचने के मामले में आर्किटेक्ट की तरह है।
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह एक साल के अंदर सभी गवाहों के बयान दर्ज कराए। सभी गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम जमानत के लिए दोबारा अर्जी दे सकते हैं। दोनों आरोपितों की इस साजिश में केंद्रीय भूमिका है। दोनों भले ही लंबे समय से हिरासत में हैं लेकिन इससे किसी भी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं होता है। देश की सुरक्षा और अखंडता के आरोप वाले मामलों में ट्रायल में देरी को तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है। ट्रायल से पहले हिरासत को सजा नहीं माना जा सकता। यूएपीए की धारा 15 के तहत सुरक्षा को खतरा पहुंचाने के इरादे से और आतंक फैलाने के इरादे से किया गया कार्य आतंकी गतिविधि के तहत आता है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि हर आरोपित एक ही स्थिति में नहीं है। कोर्ट को प्रत्येक याचिकाकर्ता का व्यक्तिगत रूप से मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। अनुच्छेद 21 के तहत राज्य को लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत को सही ठहराना होगा।
















