पवित्र अरावली पृथ्वी माता की प्राचीनतम भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है, जो भारत की पर्यावरणीय, सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। गुजरात से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक विस्तृत यह पर्वत शृंखला वनों, नदियों, वन्यजीवों, जलवायु संतुलन व मानव समाज को जीवन प्रदान करती है। आज उसी अरावली को खनन, पर्यावरण और विकास की बहस का केंद्र बनाया जा रहा है। अदालतों में घसीटा जा रहा है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर्वत शृंखला से संबंधित पिछले निर्णय पर स्वत: ही रोक लगा दी है। इससे इसे पूज्य मानने वाले समाज को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन देश के वृहत् समाज को अरावली की महत्ता का उतना ज्ञान नहीं है।
अरावली मात्र भौतिक दृश्य नहीं, बल्कि इसे प्रकृति का पवित्र तीर्थ कहा जा सकता है, जहां पर्यावरण और अध्यात्म अविभाज्य हैं। यहां के निवासी प्रकृति को पूजते हैं, गवरी जैसा अनुष्ठान करते हैं, जिसकी प्रधान देवी स्वयं प्रकृति है। सवा महीने तक साधक हरे भोजन से परहेज करते हैं तथा मातृदेवी गौरज्य और बूढ़िया शिव का मानवीय भाव से परिपालन करते हैं। शिव का नटेश रूप होने रूप के कारण यह अनुष्ठान नाट्य के रूप में होता है। इस प्रकार अरावली अपनी उपत्यका सहित प्रकृति को बीज से विशाल भौतिक रूप तक अंगीकार करती है।
अरावली पर्वतमाला प्रकृति की दिव्यता का प्रकटीकरण है। भारतीय दृष्टिकोण में पर्वत निर्जीव संरचनाएं नहीं, बल्कि जाग्रत देव होते हैं। मान्यता है कि अरावली की तलहटी में भगवान शिव और चोटियों पर माता शक्ति का वास है। आज भी कई शिवालय और शक्तिपीठ अरावली के भीतर आस्था के केंद्र हैं। शिव से शक्ति तक का विस्तार ही अरावली की ऊंचाई है, जिसे मीटरों में नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति श्रद्धा, उत्तरदायित्व व सेवा भाव में मापा जाता है।
अरावली की परिभाषा
अरावली की अपनी भाषा है। ऐसी भाषा जो उसकी संस्कृति, सृजनात्मकता, पारिस्थितिकी, पर्यावरण, इतिहास, जल-विज्ञान, पुरातत्वीय और भू-वैज्ञानिक धरोहर से परिपूर्ण है। यही भाषा उसकी परिभाषा भी है। वरिष्ठ इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, बृहस्पति के नीति-शास्त्र में जिसे पारियात्र कहा गया है और जिसकी महत्ता जम्बू द्वीप के कुल पर्वतों, अर्थात् जिनका अपना कुल और क्रम विस्तार के लिए होता है, वह आज का अरावली है। इसे ‘आडावल’ कहा गया, मानो समुद्र सूखा और रेगिस्तान ने अपने प्रेत-रूप से पूर्वी भारत की ओर कदम बढ़ाए हों। तब भूमि ने अपने अवरोध के वलय के रूप में अपनी भौगोलिक प्रत्यंचा दिखाई और यही आड़-अवला कहलाई। यह इसकी कथा है, जिसमें भूमि अपने गोद में पलने वालों के प्रति वात्सल्य और मातृभाव के बीज दिखाती है।
अरावली का भौतिक स्वरूप मगरमाल की तरह माना गया है, इसीलिए इसके पर्वत ‘मगरा’ कहे जाते हैं। इसे भू-परि मगर कहा भी गया है, क्योंकि यह भारतीय उपमहाद्वीप के वक्षस्थल पर मगर के समान लेटा हुआ है। एक मगर, जो नदी-सागर में रहता है और दूसरा, जो धरती पर अचल है। ये अरावली पहाड़ियों की माला बनाते हैं। इस क्षेत्र में पहाड़ी, पहाड़ा और पहाड़िया नाम की बस्तियां हैं। यहां डूंगर और डूंगरिया नाम के गांव-शहर हैं। भूधर जैसे नाम संस्कृत व मेवाड़ी में समान रूप से उपलब्ध हैं और इन नामों की बस्तियां भी अस्तित्व में हैं। इन सभी शब्दों का अपना विशिष्ट अर्थ है। इनमें से किसी भी शब्द का अर्थ महापहाड़ या पर्वत राज नहीं है, बल्कि पर्वतपुत्र हैं और स्वयं को उसी रूप में परिभाषित करते हैं।
आबू और जरगा की ऊंचाई की एक कहावत भी प्रचलित है-आबू ऊंचा, तो जरगा कई नीचा। इसका मतलब स्पष्ट है कि आबू और गोगुंदा के निकट जरगा भी ऊंचे हैं, लेकिन शेष को नीचा कहना भी ठीक नहीं है। लोक-जीवन ने यह ज्ञान कहां से पाया और उसका प्रमाण क्या है, यह सोचने वाली बात है। मेवाड़, वागड़, गोड़वाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ आदि के लोग जानते हैं कि मगरा बड़ा नहीं, बल्कि मजबूत होता है। जलागार और धातु-रत्न या उपलागार (पत्थरों का भंडार) होता है। पहाड़ महत्व उसके गिरिकूप से है। पूरा क्षेत्र जानता है कि गिरिकूप का मतलब है-मगरिया खाड़ या खदान। अभिलेखों में गिरिकूप इसी अर्थ में लिए जाते हैं। पहाड़ियां गांव, खेत और अधिकृत भूमि की पहचान के चिह्न होती हैं। ये गोर यानी सीमा या मर्यादा की प्रतीक हैं। इसी आधार पर गोरधन और गोवर्धन नाम पड़े। हरिवंश, महाभारत, वायु पुराण, एक लिंग महात्म्य-सभी इस अरावली के महत्व को स्थापित करते हैं। डॉ. जुगनू की व्याख्या स्थापित करती है कि संपूर्ण अरावली एक पवित्र तीर्थ-मार्ग है, जो वनों, जलस्रोतों, पवित्र उपवनों, मंदिरों, आश्रमों और मानव बस्तियों को जीवंत तंत्र के रूप में जोड़ता व परस्पर पोषित करता है। इस तंत्र की रक्षा मात्र पर्यावरणीय कार्य नहीं, बल्कि सेवा, साधना और समर्पण है।

ज्ञान परंपरा में अरावली
अरावली के संबंध में प्रताप गौरव केंद्र, उदयपुर के शोध निदेशक डॉ. विवेक भटनागर महामहोपाध्याय कविराज श्यामलदास द्वारा 1886 ई. में रचित ‘वीर विनोद’ का संदर्भ देते हैं। इसमें मेवाड़ का भूगोल वर्णित है। श्यामलदास अरावली को वलक्ष या तहछट के आधार पर विभाजित नहीं करते, बल्कि इसे एक समग्र पर्वत शृंखला के रूप में प्रस्तुत करते हैं। करनबेल (जबलपुर) के शिलालेख का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि इस अभिलेख में मेवाड़ के रावल हंसपाल, वैरिसिंह और विजय सिंह का वर्णन है। लेकिन इसमें मेवाड़ को ‘प्राग्वाट’ (पूर्व क्षेत्र के पर्वतीय वन) कहा गया है। चूंकि अरावली मरु प्रदेश के पूर्व में स्थित है, इसलिए इसे ‘प्राग्वाट’ नाम से अलंकृत किया गया। यहां प्राग्वाट का विभाजन पर्वत के रूप में नहीं, बल्कि एक इकाई के रूप में किया गया है। श्यामलदास इसे ‘अर्वली’ या ‘आड़ावळा’ कहा और पूरी पर्वत शृंखला को एकल इकाई माना।
वहीं, महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अरावली को तीन भागों में वर्गीकृत किया-आबू श्रेणी, देवली कॉम्प्लेक्स और अजमेर-मेरवाड़ा कॉम्प्लेक्स-जिसे भूगर्भशास्त्री आज तक नहीं बदल पाए। मेवाड़ के संदर्भ में उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ से दीवर तक प्रथम भाग, देवली-विजौल्या से चित्तौड़गढ़ तक द्वितीय व देबारी से आबू तक तृतीय भाग बताया। ये तीनों मिलकर पूरे मेवाड़, मेदपाट, शिबि जनपद या प्राग्वाट का निर्माण करते हैं। अरावली में आध्यात्मिक पक्ष सांस्कृतिक स्वरूप के साथ पूर्णतः उपस्थित है।
अरावली की महत्ता
डॉ. विवेक भटनागर बताते हैं, “यहां सतयुग और त्रेता का तीर्थराज अजमेर स्थित ‘पुष्कर’, जयपुर स्थित रामानंदियों का तीर्थ ‘गलता’ और इस क्षेत्र का एक मात्र शक्तिपीठ ‘अम्बाजी’ अवस्थित हैं। यह तीर्थ इसकी धार्मिक मान्यता को भी पुष्ट करता है। अरावली को संचालक पर्वत शृंखला, सरस्वती नदी का संरक्षक माना गया है। अतः वेदों की लब्धि भी इसी पर्वत शृंखला पर हुई है। वहीं अर्बुद क्षेत्र में अरावली का दूसरा सबसे ऊंचा शिखर अचलेश्वर है। यह एक ज्वालामुखी का मुख है, जो अब पूर्णतः शांत हो चुका है। अचलेश्वर को शिव के पाद का अंगुष्ठ कहा गया है। शब्दिक अर्थों में यह अचल ईश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। अरावली विश्व की सबसे स्थिर और वलयित पर्वत शृंखला है। इस प्रकार अरावली अपने देव रूप में इस भूमि पर विद्यमान है।”

वर्तमान समस्याएं, विवाद एवं समाधान
विगत दशकों में वनों की कटाई, अवैध खनन, शहरी विस्तार, जलस्रोतों के क्षरण तथा पारंपरिक सामुदायिक चेतना व सहभागिता के क्षीण होने से इस प्राचीन पर्वतमाला को गंभीर क्षति पहुंची है। इसलिए इसकी रक्षा और पुनर्जीवन को केवल मीटर, मैप तथा माइनिंग जैसे तकनीकी मापदंडों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके लिए नागरिक-केंद्रित, ज्ञान-आधारित तथा आध्यात्मिक रूप से समन्वित जन-अभियान आवश्यक है। ‘देव अरावली अभियान’ ऐसा ही एक अभियान बने, जो नागरिकों, समाज, संस्थानों, युवाओं और आध्यात्मिक केंद्रों को जमीनी कार्य, जागरूकता तथा परस्पर समन्वय से अरावली की पारिस्थितिकी के पुनर्जीवन हेतु एकजुट करे। इस अभियान का उद्देश्य अरावली को जीवंत, पवित्र पारिस्थितिक तंत्र के रूप में पुन:स्थापित करने में निहित हो। इसका संरक्षण, पुनर्जीवन और सम्मान नागरिक सहभागिता, सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मूल्यों, पारंपरिक ज्ञान, शैक्षणिक जुड़ाव तथा आध्यात्मिक समन्वय से प्राप्त हो, ताकि इसकी निरंतरता वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए सुनिश्चित हो सके।
मीटर, मैप और माइनिंग तक सीमित न रहते हुए देव अरावली संरक्षण अभियान संकीर्ण दृष्टिकोण से आगे बढ़कर मोबिलाइजेशन (सक्रिय नागरिक सहभागिता), मेंटॉरशिप (मार्गदर्शन अर्थात् शैक्षणिक सहभागिता, शोध एवं ज्ञान-साझाकरण) तथा मीनिंग व मेकिंग (शाश्वत अर्थ निर्माण) पर केंद्रित हो, जो आध्यात्मिक जुड़ाव और सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करे।
सुझाव और समाधान
वन पुनर्स्थापना एवं जैव विविधता संरक्षण : अरावली के वन उत्तर-पश्चिम भारत के पारिस्थितिक आधारस्तंभ हैं। अभियान के अंतर्गत क्षतिग्रस्त भूमि पर देशज वृक्ष-झाड़ी प्रजातियों का पुनर्वनीकरण, पवित्र उपवनों का संरक्षण-पुनर्जीवन तथा आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण किया जाए। स्थानीय जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाली आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण किया जाए।
जल संरक्षण एवं पुनर्जीवन : अरावली असंख्य पारंपरिक जल प्रणालियों का स्रोत और संरक्षक है। बावड़ियों, तालाबों और स्टेपवेल्स जैसे जल स्रोतों का पुनर्स्थापन, अरावली क्षेत्र के गांवों-शहरों में वर्षा जल संचयन को बढ़ावा, पारंपरिक जल प्रबंधन ज्ञान का पुनरुद्धार तथा समुदाय-आधारित जल निगरानी प्रमुख कार्य बनें। इससे पारिस्थितिक सहनशीलता, कृषि एवं जलवायु अनुकूलन को बल मिलेगा।
सामाजिक सहभागिता एवं सांस्कृतिक संरक्षण : नागरिक व समाज ही अरावली के वास्तविक संरक्षक हैं। उनकी परंपराएं और आस्थाएं संरक्षण का मूल आधार हैं। नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को मान्यता व समर्थन तथा प्रकृति के प्रति सम्मान को सुदृढ़ करने वाले सांस्कृतिक अनुष्ठानों (जैसे मगरा बावजी पूजा) को प्रोत्साहन दिया जाए। स्थानीय बोलचाल में पहाड़ियों (मगरा) को देवस्वरूप (बावजी) कहा जाता है। अरावली के मंदिरों-आश्रमों से इसकी शुरुआत कर आध्यात्मिक स्थलों को पर्यावरणीय जागरूकता का केंद्र बनाया जाए।
जलवायु कार्यवाही एवं कार्बन अवशोषण : अरावली के वन प्राकृतिक कार्बन सिंक और जलवायु संतुलक के रूप में कार्य करते हैं। वन आवरण का संरक्षण-विस्तार, जलवायु-सहिष्णु देशज वनस्पतियों का संवर्धन तथा तापमान नियंत्रण, वायु शुद्धिकरण व वर्षा चक्र में अरावली की भूमिका पर नागरिक जागरुकता बढ़ाई जाए। इससे अरावली राष्ट्रीय जलवायु संरक्षक के रूप में स्थापित होगी।
शिक्षा, जागरुकता एवं युवा सहभागिता : जागरुकता संरक्षण को सामूहिक दायित्व बनाती है। विद्यालयों-महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान अरावली की पारिस्थितिकी, संस्कृति और इतिहास पर शोध, वायु गुणवत्ता, जल सुरक्षा व जैवविविधता में इसकी भूमिका पर जागरुकता कार्यक्रम चलाए जाएं। युवा अभियान के दूत बनें और स्थानीय स्तर पर देव अरावली यात्राएं आयोजित हों। यह प्रत्येक नागरिक, संस्था, आध्यात्मिक केंद्र व समाज की सहभागिता का आह्वान है। प्रत्यक्ष जमीनी कार्य, जागरुकता तथा समन्वय से मीटर-मैप-माइनिंग की बहस से आगे बढ़कर उस भविष्य की ओर अग्रसर होना है, जहां अरावली की रक्षा सिर्फ कानूनों से नहीं, बल्कि प्रेम, ज्ञान और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व से हो। इसी से यह प्राचीन प्रकृति-तीर्थ भावी पीढ़ियों के लिए जीवन, पोषण और संरक्षण का स्रोत बना रहेगा।

















