आज वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो एक उबाल, एक ताप-सा दिखता है-विभिन्न मतों, मूल्यों और संस्कृतियों पर चल रहे देशों में। माहौल में तनाव और अशांति का बोलबाला अधिक है बजाय प्रगति, सुख-शांति और मेल-मिलाप के! रूस-यूक्रेन, इस्राएल-हमास, चीन-ताइवान, अमेरिका-ईरान, यूएई-सऊदी अरब में दिख रहे संघर्ष के मूल में अगर देखें तो पाएंगे कि उनमें सम्मिलित अधिकांश पक्षों के जीवन मूल्यों में उन सूत्रों, मानवता के आधार तत्वों का नितांत अभाव है, जो हमारे हिंदू धर्म में हैं।
धर्म के इन मूल्यों की आज विश्व में गूंज सुनाई देती है। इसी गूंज का प्रतिनिधित्व करते 71 से अधिक देशों से आए 1,610 स्वयंसेवकों ने भाग्यनगर में 25-29 दिसंबर को संपन्न सातवें विश्व संघ शिविर में संघ संस्कारों का चिरंतन पाथेय पुन: अपने अंतस में उतारा। संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि की गरिमामयी उपस्थिति में स्वयंसेवकों-सेविकाओं ने विभिन्न सत्रों में उत्साह से सहभागिता करते हुए अपने-अपने देशों में संघ कार्य की तीव्र गति से हो रही प्रगति की चर्चा की और बताया कि कैसे धर्म मार्ग पर चलते हुए वे वहां संघ के संस्कारों का प्रसार देख रहे हैं। और उन संस्कारों से संपर्क में आने वाले स्थानीय समाजों में एक सकारात्मक परिवर्तन का अनुभव कर रहे हैं।
सरसंघचालक ने शिविर में अपने उद्बोधन में कहा भी कि विश्व में शांति और संपन्नता का मार्ग संघ के संस्कारों में गुंथे हिंदू धर्म के सूत्रों से ही निकलता है। इसीलिए विश्व के अनेक देश अब हिंदुत्व के मूल्यों को गर्व के साथ आत्मसात करते दिख रहे हैं। इस शिविर की संपूर्ण रिपोर्ट इसीलिए इस अंक की आवरण कथा के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसमें संदेह नहीं है कि संघ के आरंभ से ही अनेक निहित स्वार्थी तत्व, विशेषकर कम्युनिस्ट और लीगी मानसिकता वाले समय-समय पर इसका विरोध करते आए हैं, लेकिन हर चुनौती से और प्रखर होकर निकला संघ आज विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन के नाते अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है।
संघ के मूल्यों, शाखा में मिलने वाले संस्कारों, संघ कार्यक्रमों, तपस्वी सम प्रचारकों, संघ विरोधियों द्वारा किए जाते रहे दुष्प्रचारों के सटीक-स्पष्ट जवाब देते हुए संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री राममाधव का साक्षात्कार भी इस अंक में दिया जा रहा है। श्री राममाधव का साफ कहना है कि संघ देश को एक समाज के रूप में देखता है, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के रूप में नहीं। हिंदुत्व के इन्हीं मूल्यों में से एक है प्रकृति की पूजा, उसका यथोचित मान-सम्मान।
भारत के जन जीवन, पर्यावरण को प्रत्यक्षत: प्रभावित करती, सदियों से उसे हर प्रकार से आपूरित रखती आई चार राज्यों से गुजरती अरावली पर्वतशृंखला पर उभरते संकट को लेकर जन-मन का व्यथित होना स्वाभाविक ही है। जीवंत पर्वतशृंखला मानी जाने वाली अरावली का खनन माफिया के हाथों क्षरण होते कौन देख सकता है! सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह विषय है और इस पर जनभावनाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा, ऐसा सबको विश्वास है। इस पर्वत शृंखला के प्रति भावनाओं और इसके महत्व को रेखांकित करने वाला आलेख अनेक बिंदुओं को स्पर्श करता है।
अयोध्या में गत वर्ष श्रीराम मंदिर में भगवान श्रीराम के बाल रूप विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन एक वैश्विक उत्सव ही था। दुनिया के विभिन्न देशों में बसे हिंदू उस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन खुद को धन्य अनुभव कर रहे थे। उसी प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूर्ण होने का उत्सव 31 दिसंबर को मनाया गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में संपन्न हुए भव्य कार्यक्रम की रिपोर्ट उस पल को पाठकों के समक्ष सजीवता के साथ प्रस्तुत करती है।
















