इतिहास के झरोखे से सच का दर्शन
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होम कला-साहित्य पुस्तकें

इतिहास के झरोखे से सच का दर्शन

एनसीईआरटी पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाते हुए भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा से विद्यार्थियों को जोड़ रही है। इसी क्रम में सामाजिक विज्ञान, गणित व विज्ञान में क्षेत्रीय इतिहास और प्राचीन योगदान जोड़े गए हैं। ये संशोधन ऐतिहासिक चेतना की पुनर्स्थापना करते हैं और नई पीढ़ी को यथार्थ से अवगत कराते हैं

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार
Dec 31, 2025, 02:06 pm IST
inपुस्तकें, शिक्षा

एनसीईआरटी ने कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान, गणित और विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। ये बदलाव नई शिक्षा नीति 2020 और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ-एसई 2023) के अनुरूप किए गए हैं। नई सामाजिक पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटीज : इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 2’ में मध्यकालीन आक्रमणों की वास्तविकता को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें उपेक्षित भारतीय राजवंशों को प्रमुखता देने के साथ इतिहास को विचारधारा से मुक्त रखते हुए तथ्यपरक बनाया गया है।

भारतीय राजवंशों एवं क्षेत्रीय स्थापत्य को महत्व

लंबे समय से भारतीय इतिहास की पुस्तकों में मध्यकालीन आक्रमणों को अस्पष्ट या केवल आर्थिक-राजनीतिक अभियानों तक सीमित रखा गया, जिससे विद्यार्थियों से इतिहास का बड़ा पक्ष छिपा रहा। नई पुस्तक में पहली बार उत्तर भारत केंद्रित दृष्टि से हटकर पूरे देश के क्षेत्रीय इतिहास, साहित्य, दर्शन, मंदिर स्थापत्य एवं वास्तुकला को विशेष महत्व दिया गया है। इसमें हन्नमकोंडा के हजार स्तंभ वाले मंदिर को काकतीय काल की उत्कृष्ट स्थापत्य कला का प्रतीक बताने के साथ काकतीय वंश को तेलुगु साहित्य संरक्षण, उन्नत सिंचाई परियोजनाओं, ग्राम स्वशासन और सुदृढ़ राजस्व व्यवस्था के लिए सराहा गया है। साथ ही, कल्याणी के चालुक्य राजा सोमेश्वर तृतीय की प्रसिद्ध रचना ‘मनसोल्लास’ को खगोल, संगीत, चिकित्सा, भोजन और खेलों जैसे विविध विषयों के व्यापक वर्णन के कारण विशेष महत्व दिया गया है।

पल्लवों की गुफा मंदिर परंपरा तथा महाबलीपुरम् तट मंदिर (यूनेस्को धरोहर), अलवार-नयनार संतों के माध्यम से भक्ति आंदोलन की जड़ों को भी स्पष्ट रूप से समझाया गया है, जो इस काल की आध्यात्मिक चेतना को दर्शाता है। पश्चिम भारत में होयसल राजवंश द्वारा बनवाए गए बारीक नक्काशी वाले बेलूर-हलेबीडु मंदिरों को क्षेत्रीय कला के श्रेष्ठ उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इसके अलावा, नई पुस्तक में पूर्व भारत के पूर्वी गंग वंश को पुरी के जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसे भव्य स्थापत्य को विशेष स्थान देने के साथ अपेक्षाकृत कम उल्लेखित राजवंशों, जैसे-ब्रह्मपाल, भंजा, चापा, गुहिल, कलचुरी आदि के योगदान को शामिल किया गया है। पाठ्यपुस्तक में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, बसवेश्वर जैसे सुधारकों के साथ मंदिर स्थापत्य पर विशेष ध्यान दिया गया है। इनमें एलोरा के कैलाशनाथ, चोल कालीन बसवेश्वर एवं चंदेल कालीन लक्ष्मण मंदिर को स्थापत्य सौंदर्य एवं वास्तुकला कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण बताया गया है। पहले पाठ्यपुस्तकों में उत्तर भारत और दिल्ली सल्तनत की इमारतों के बारे अधिक पढ़ाया जाता था, लेकिन नई पुस्तक में क्षेत्रीय कला, परंपराओं, राजवंशों और धार्मिक विरासत को केंद्र में रखा गया है।

पड़ोसी देशों को देखने का नजरिया

इसी पुस्तक में विद्यार्थियों को अब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, यानी पूरा विश्व एक परिवार है, की अवधारणा से भी परिचित कराया गया है। इसके माध्यम से विद्यार्थी न केवल भारत की सांस्कृतिक परंपरा और वैश्विक दृष्टि को समझेंगे, बल्कि उसे आगे बढ़ाने की चेतना भी विकसित करेंगे। ‘इंडिया : ए होम टू मेनी’ शीर्षक वाले इस अध्याय में यहूदी-पारसी समुदायों की सुरक्षा-समृद्धि पर जोर देकर भारत की समावेशी परंपरा को जीवंत करता है। ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटीज : इंडिया एंड बियॉन्ड, पार्ट-2’ के एक अध्याय ‘इंडिया एंड हर नेबर्स’ में भारत और उसके पड़ोसी देशों के संबंधों को ऐतिहासिक, सभ्यतागत और समकालीन दृष्टि से समझाया गया है, जिससे छात्रों में भूगोल और राजनीति के साथ-साथ साझा विरासत की भी समझ विकसित हो।

इसमें बताया गया है कि विभाजन से पहले पाकिस्तान का क्षेत्र भारत का हिस्सा था और उसका गठन मुख्यतः मजहब के आधार पर हुआ। साथ ही, भारत-पाकिस्तान सीमा को केवल एक भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि साझा विरासत और विभाजन से जुड़े दुखद इतिहास की प्रतीक बताया गया है। लेकिन विभाजन, चार युद्धों और सेना-समर्थित आतंकी हमलों ने दोनों देशों के संबंधों को जटिल बना दिया। इस अध्याय में करतारपुर गलियारे को सकारात्मक पहल के रूप में दिखाया गया है, जिसे 2019 में गुरु नानकदेव के 550वें प्रकाशोत्सव के अवसर पर खोला गया था।

इसके अलावा, चीन के संदर्भ में दोनों देशों के बीच प्राचीन सभ्यतागत संबंधों, जैसे बौद्ध धर्म, समुद्री व्यापार को सांस्कृतिक सेतु के रूप में रेखांकित करते हुए हालिया सीमा विवादों के बावजूद जारी संवाद और व्यापार पर जोर दिया गया है। ‘डोंट मिस आउट’ खंड में चीन के बंदरगाह शहर क्वांझोउ में हिंदू व्यापारियों द्वारा निर्मित मंदिरों का उल्लेख है, खासकर कैयुआन मंदिर के उन स्तंभों के बारे में बताया गया है, जिन पर विष्णु, शिव तथा रामायण-पुराणों की कथाएं उत्कीर्ण हैं। वहीं, भारत-बांग्लादेश संबंधों को साझा इतिहास, संस्कृति और नदियों पर आधारित गहरे रिश्ते के रूप में, जबकि नेपाल से खुले सीमा, पारिवारिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

भूटान के साथ संबंधों में जलविद्युत सहयोग व साझा बौद्ध विरासत तथा श्रीलंका और मालदीव के साथ प्राचीन सांस्कृतिक मेल के आधुनिक रणनीतिक सहयोग का उल्लेख है। यह अध्याय दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों-थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया में भारतीय प्रभाव को समुद्री व्यापार, बौद्ध धर्म, संस्कृत और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रसार के माध्यम से स्पष्ट करता है। अफगानिस्तान के बारे में बताया गया है कि दोनों देशों के बीच पहले सीधी जमीनी सीमा थी, जो पाकिस्तान के अलग होने के बाद बाधित तो हुई, लेकिन दोनों देशों के संबंध साझा इतिहास, संस्कृति और रणनीतिक हितों पर आधारित रहे हैं।

7वीं सदी में इस्लाम के प्रसार से पहले बौद्ध और हिंदू केंद्र के रूप में अफगानिस्तान के अतीत, कपिशा और जाबुल जैसे राज्यों में भारतीय प्रभाव तथा हाल के दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में भारत के सहयोग को रेखांकित कर यह निष्कर्ष दिया गया है कि भारत-पड़ोसी संबंध सिर्फ आज की राजनीति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यतागत और सांस्कृतिक धाराओं से निर्मित हुए हैं।

प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान परंपरा

एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में किए जा रहे बदलाव आधुनिकता के साथ भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा से विद्यार्थियों को जोड़ते हैं। सातवीं कक्षा की गणित पुस्तक में बीजगणित, ज्यामिति और पूर्णांक जैसे अध्यायों में भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त और आर्यभट्ट जैसे प्राचीन गणितज्ञों और वैज्ञानिकों के योगदान जोड़े गए हैं। जैसे-ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में शून्य व धन-ऋ ण नियम, शुल्बसूत्रों में पाइथागोरस प्रमेय, आर्यभट्ट की दशमलव प्रणाली। इसमें कणाद का परमाणु सिद्धांत और आर्यभट्ट का सूर्यकेंद्रित मॉडल भी शामिल हैं। ये बदलाव विद्यार्थियों में वैज्ञानिक विरासत पर गर्व जगाते हैं और जांच-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देते हैं। लेकिन इन सार्थक पाठ्यक्रम बदलावों पर व्यापक रूप से चर्चा नहीं होती। विमर्श केवल उन पर केंद्रित रहता है जो कुछ पुराने मिथ्या आख्यानों को चुनौती देते हैं।

आक्रांताओं का वास्तविक विश्लेषण

सातवीं की नई सामाजिक अध्ययन पुस्तक में महमूद गजनवी के 17 आक्रमणों का विस्तृत, प्रामाणिक विवरण है। उसके अभियानों में लूट, मंदिर-विध्वंस, जनसंहार और दास-व्यापार से जुड़े प्रमाणों को स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इसमें सोमनाथ मंदिर विध्वंस, वहां से शिवलिंग हटाने की घटना का उल्लेख तो है ही, बिना लाग-लपेट के यह भी बताया गया है कि इस मंदिर का पुनर्निर्माण कब, कैसे और जनता के दान से हुआ। दान की राशि कैसे एकत्र की गई। अभ्यास प्रश्न इतिहास के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर विचार कराते हैं।

पुरानी पुस्तक महमूद गजनवी के बारे में सिर्फ एक पैराग्राफ था, नई पुस्तक में उसके आक्रमणों की प्रकृति, प्रभाव ओर दूरगामी परिमाणों का विश्लेषण 6 पन्नों में किया गया है। इसी क्रम में ‘टर्निंग टाइड्स : इलेवंथ एंड ट्वेल्थ सेंचुरीज’ अध्याय में मुहम्मद गोरी, कुतुबुद्दीन ऐबक और बख्तियार खिलजी के अभियानों का विस्तृत, प्रमाणिक विवरण दिया गया है। नालंदा-विक्रमशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों के विध्वंस, बौद्ध भिक्षुओं की हत्या, ग्रंथों का महीनों तक जलना और बौद्ध धर्म के क्षीण होने कारणों की जानकारी दी गई है। साथ ही, अरब आक्रमणों, मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर आक्रमण का वर्णन फारसी स्रोतों के आधार पर किया गया है। ये बदलाव गौरव एवं पीड़ा, दोनों को ईमानदारी से स्वीकार करते हुए इतिहास को पूर्णता देते हैं।

गजनवी के बाद मुहम्मद गोरी, तैमूरलंग (1398 का दिल्ली नरसंहार), नादिरशाह (1739)-सभी जिहादी मानसिकता से प्रेरित थे। गोरी ने केवल राज्य विस्तार नहीं किया, बल्कि मजहबी हुकूमत और प्रभुत्व को लक्ष्य बनाकर मंदिरों व संस्थानों को ‘काफिरों का केंद्र’ कहकर नष्ट किया। तैमूर ने तुजुक-ए-तैमूरी में साफ लिखा कि उसका अभियान ‘कुफ्र समाप्त करने’ की मजहबी भावना से प्रेरित था और दिल्ली में उसने एक ही दिन में हजारों गैर-मुसलमानों के कत्लेआम का आदेश दिया।

नादिरशाह का उद्देश्य भी सिर्फ धन-संपत्ति नहीं था। यदि उसे केवल कोहिनूर, मयूरसिंहासन और खजाना चाहिए था, तो वह धार्मिक पहचान के आधार पर इतने व्यापक नरसंहार, मंदिर अपमान और सांस्कृतिक केंद्रों की बर्बादी न करवाता। इन आक्रमणों को महज आर्थिक-राजनीतिक अभियान मानना इतिहास के साथ अन्याय है। ये सनातन भारतीय सभ्यता, उसकी बहुलता और उसकी सांस्कृतिक आत्मा पर इस्लामी कट्टरता और ‘कुफ्र-काफिर’ आधारित विचारधारा से वैध ठहराए गए लगातार आक्रमण थे। सल्तनत और मुगल कट्टर शासकों की नीतियों में मजहबी असहिष्णुता, गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार, नरसंहार और जजिया कर स्पष्ट दिखते हैं। यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं थी, बल्कि ‘एक पैगंबर, एक किताब, एक झंडा’ वाली एकरूपतावादी मानसिकता से प्रेरित थी, जो विविधता, बहुलता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता को नकारती है। यह दृष्टि दुनिया को मजहबी एकरूपता में ढालना ‘फर्ज’ मानती है, जिसमें बाधाओं को हटाने के लिए कत्लेआम भी जायज ठहराया जाता है।

इतिहासकारों का छल

इसके विपरीत, भारतीय सभ्यता बहुलतावादी, उदार और समन्वयकारी रही है, जहां विभिन्न विचारधाराएं, दर्शन और आस्थाएं सह-अस्तित्व में पनपीं। इसलिए इस्लामी कट्टरता के आक्रमण सैन्य-राजनीतिक से आगे सांस्कृतिक-आध्यात्मिक टकराव बने। मंदिर-विध्वंस केवल इमारतें नष्ट करना नहीं था, यह समाज की चेतना, स्मृति, परंपरा, ज्ञान, शिक्षा-कला केंद्रों पर आघात था। सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का हथियार था। इनके गहरे प्रभावों को नजरअंदाज कर मध्यकालीन इतिहास का सही मूल्यांकन असंभव है। दशकों तक वामपंथी और तथाकथित पंथनिरपेक्ष इतिहासकारों ने मंदिर-ध्वंस और हिंदू नरसंहारों के पीछे की मजहबी कट्टरता को दबाया।

उन्होंने इसे सैन्य रणनीति, आर्थिक लूट या साम्राज्य-विस्तार कहकर छिपाया, मानो मंदिर संयोग से टूटे या सिर्फ खजाने के साधन थे। लेकिन समकालीन फारसी-तुर्की स्रोत, आक्रमणकारियों की घोषणाएं और दरबारी विवरण साफ बताते हैं कि यह उनकी घोषित नीति और जिहाद का केंद्र था। विडंबना देखिए, ये इतिहासकार भारतीय गौरव को ‘मिथक’ कहकर खारिज करते रहे, जबकि विभाजक आख्यानों को बिना प्रमाण बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। आक्रांताओं के क्रूर वृत्तांतों को भी ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की आड़ में नकारा। इतिहास में तथ्य ही सर्वोपरि हैं, पूर्वाग्रह नहीं।

ऐसी मानसिकता अपने समाज के प्रति कृतघ्न हो जाती है, जो जिहाद को जायज ठहराती है और विदेशी आक्रांताओं पर सहानुभूति बरसाती है। ‘गंगा-जमुनी’ के नाम पर खलनायकों को नायक बनाना घाव भरना नहीं, उन्हें गहरा करना है। झूठ पर बनी एकता मजहबी नारों से ढह जाती है-देश बंटवारा इसका प्रमाण। सत्य की उपेक्षा ने हमारी ऐतिहासिक चेतना को भ्रमित-कमजोर किया।

एनसीईआरटी द्वारा किए जा रहे बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह इतिहास को न कटुता से लिखता है, न किसी समुदाय पर दोषारोपण करता है, बल्कि वास्तविक घटनाओं को सत्यनिष्ठ रूप से स्वीकार करता है। नई पीढ़ी को सच्चा इतिहास मिलेगा, तभी वह समझेगी कि भारत ने किन चुनौतियों का सामना किया, सांस्कृतिक पहचान कैसे सुरक्षित रखी और सदियों के संघर्षों के बाद भी सभ्यता कैसे जीवित रही। इतिहास का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि यथार्थ से अवगत कराना है-यही नई पुस्तक करती है। यह मात्र विषयवस्तु संशोधन नहीं, ऐतिहासिक चेतना की पुनर्स्थापना है। राष्ट्र जब इतिहास को बिना विकृति-संकोच स्वीकार करता है, तभी आत्मविश्वास से भविष्य की ओर बढ़ता है।

Topics: नई शिक्षा नीति 2020वसुधैव कुटुंबकम्प्रणय कुमारऐतिहासिक चेतनाएनसीईआरटी संशोधनतथ्यपरक इतिहासमध्यकालीन आक्रमणभारतीय राजवंशमंदिर स्थापत्यजिहादी मानसिकताप्राचीन ज्ञान परंपरासांस्कृतिक विरासतवैचारिक मुक्ति
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