पश्चिम एशिया और भारत के हित: आवश्यकता से रणनीति तक
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पश्चिम एशिया और भारत के हित: आवश्यकता से रणनीति तक

भारत–पश्चिम एशिया संबंधों की जड़ें आधुनिक राष्ट्र से बहुत पहले की हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के समय मेसोपोटामिया से व्यापारिक संपर्क (मेलुहा) भारत की वैश्विक एकीकरण क्षमता का प्रमाण है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Dec 27, 2025, 06:42 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का पश्चिम एशिया का दौरा कई मायनों में है ऐतिहासिक।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का पश्चिम एशिया का दौरा कई मायनों में है ऐतिहासिक।

इतिहास अक्सर शांत गति से चलता है, पर जब वह दिशा बदलता है तो सदियों की धारा एक साथ दिखाई देने लगती है। भारत और पश्चिम एशिया के संबंध ऐसे ही हैं जो सिंधु घाटी के समुद्री व्यापार से आरम्भ होकर आज IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) , चाबहार, ऊर्जा सुरक्षा 2.0 और रणनीतिक डी-हाइफनेशन (वि-संयोजन) तक पहुँच चुके हैं। यह केवल विदेश नीति का अध्याय नहीं, बल्कि सभ्यतागत निरंतरता, भूगोल की अनिवार्यता और बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की परिपक़्व कूटनीति की कहानी है।

ऐतिहासिक अधिष्ठान से भूगोल की शक्ति तक

भारत–पश्चिम एशिया संबंधों की जड़ें आधुनिक राष्ट्र-राज्य से बहुत पहले की हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के समय मेसोपोटामिया से व्यापारिक संपर्क (मेलुहा) भारत की वैश्विक एकीकरण क्षमता का प्रमाण है। भारत से मसाले, मलमल, वस्त्र और आभूषण; खाड़ी से मोती और खजूर यह विनिमय केवल वस्तुओं का नहीं, ज्ञान और संस्कृति का भी था। अरब व्यापारियों ने भारतीय अंक प्रणाली और वैज्ञानिक विचारों को पश्चिम तक पहुँचाया। फारस की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर भारत–यूरोप व्यापार की जीवनरेखा बने। यह ऐतिहासिक स्मृति बताती है कि पश्चिम एशिया भारत के लिये बाहरी क्षेत्र नहीं, बल्कि सभ्यतागत पड़ोस है। पश्चिम एशिया एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला भूमि-पुल है। भूमध्य, लाल और अरब सागर ,तीनों से सटा यह क्षेत्र बोस्फोरस, डार्डानेल्स, हॉर्मुज़ और बाब-अल-मंदेब जैसे वैश्विक चोक-प्वाइंट्स को समेटे है। तेल की खोज ने इसके महत्त्व को कई गुना बढ़ाया, पर आज इसका मूल्य केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं, यह कनेक्टिविटी, समुद्री सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन का केंद्र है।

स्वतंत्रता के बाद से 2014 तक: सीमित सहभागिता का चरण

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात, और भारतीय श्रमिकों का खाड़ी देशों की ओर प्रवास, जिससे भारत को बड़े पैमाने पर धन-प्रेषण (रेमिटेंस) प्राप्त होने लगा। हालाँकि, इस अवधि में भारत–पश्चिम एशिया संबंध मुख्यतः ऊर्जा और धन-प्रेषण तक सीमित रहे। रणनीतिक, रक्षा या व्यापक कूटनीतिक सक्रियता अपेक्षाकृत कम थी। भारत पश्चिम एशिया में एक निष्क्रिय किंतु स्वीकार्य भागीदार की भूमिका में रहा। वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण के साथ भारत की विदेश नीति में एक बुनियादी परिवर्तन आया। वर्ष 1992 में भारत ने इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। ईरान के साथ रणनीतिक संवाद को नई दिशा मिली।

मोदी काल : तीव्रता, आत्मविश्वास और प्रभाव

वर्ष 2014 के बाद भारत पश्चिम एशिया संबंधों में केवल निरंतरता ही नहीं, बल्कि तेजी, स्पष्टता और प्रभावशीलता दिखाई देती है। इस काल में भारत ने पश्चिम एशिया के साथ अपने संबंधों को लेन-देन आधारित सहभागिता से आगे बढ़ाकर रणनीतिक प्रभाव में परिवर्तित कर दिया है। यह परिवर्तन एक व्यावहारिक पश्चिम की ओर देखो / पश्चिम से जोड़ो दृष्टिकोण के अंतर्गत हुआ है।वित्तीय वर्ष 2023–24 में संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 84 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा। सऊदी अरब के साथ यह व्यापार लगभग 43 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। अब ये संबंध केवल तेल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निवेश, वित्तीय प्रौद्योगिकी, नवाचार आधारित उद्यम (स्टार्टअप), अवसंरचना और डिजिटल सहयोग तक विस्तारित हो चुके हैं।

मोदी काल की पश्चिम एशिया नीति की प्रमुख विशेषताएँ

आत्मविश्वासी और सक्रिय कूटनीति -इस काल में लगातार शीर्ष स्तरीय यात्राएँ, नेतृत्व के बीच सीधा संवाद और व्यक्तिगत विश्वास-निर्माण भारत की कूटनीति की पहचान बने।

रणनीतिक ‘डी-हाइफनेशन’ (विवादों से संबंधों को अलग रखना) – भारत ने इज़राइल–फिलिस्तीन और सऊदी अरब–ईरान जैसे क्षेत्रीय विवादों को अपने द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखा। इज़राइल–हमास संघर्ष के दौरान भारत ने एक ओर आतंकवाद का विरोध किया, तो दूसरी ओर मानवीय सहायता देकर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।
ऊर्जा सुरक्षा 2.0 – भारत ने पारंपरिक हाइड्रोकार्बन निर्भरता से आगे बढ़ते हुए ,कतर के साथ 20 वर्षों का तरलीकृत प्राकृतिक गैस आयात समझौता, हरित हाइड्रोजन तथा विद्युत ग्रिड सहयोग जैसे कदम उठाए। यह भारत की भविष्य-केंद्रित ऊर्जा रणनीति को दर्शाता है।

कनेक्टिविटी को रणनीति में बदलना – भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा , यह परियोजना भारत को खाड़ी देशों के माध्यम से यूरोप से जोड़ती है, जिससे परिवहन लागत में कमी, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती , वैश्विक व्यापार में प्रतिस्पर्धात्मकता सुनिश्चित होती है।चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा , यह एक बहु-माध्यमीय मार्ग (जहाज़, रेल और सड़क) है, जो भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया को जोड़ता है। इसका उद्देश्य भारत–रूस व्यापार को तेज़ और सस्ता बनाना है। यह परियोजना चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का एक पारदर्शी और संतुलित विकल्प भी प्रस्तुत करती है।

समुद्री और रक्षा सहयोग के तहत ओमान के डुक्म बंदरगाह तक भारत की लॉजिस्टिक पहुँच होगी एवं संयुक्त सैन्य अभ्यास से लाल सागर संकट के दौरान भारतीय नौसैनिक जहाज़ों की तैनाती करना , इन सबके बावजूद भारत ने किसी भी सैन्य गुटबंदी से दूरी बनाए रखी, जिससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता बनी रही।

हाल के समझौते: नीति का संस्थागत रूप

भारत–संयुक्त अरब अमीरात व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता से वर्ष 2030 तक गैर-तेल व्यापार 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य है, दिसंबर 2025: भारत–ओमान मुक्त व्यापार समझौता हुआ , जिसमे खाड़ी सहयोग परिषद के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और यह डुक्म बंदरगाह, व्यापार और रणनीति का संगम होगा। पश्चिम एशिया में 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिक रहते और कार्य करते हैं। धन-प्रेषण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आधार है। डिजिटल भुगतान प्रणाली का एकीकरण , कौशल विकास , अबू धाबी में हिंदू मंदिर का निर्माण ये सभी भारत की बहुलवादी पहचान, सांस्कृतिक स्वीकार्यता और सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करते हैं।
मोदी काल में भारत–पश्चिम एशिया संबंधों ने सीमित से रणनीतिक, प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय, और आर्थिक से बहुआयामी स्वरूप ग्रहण किया है। यही परिवर्तन भारत को बदलती वैश्विक व्यवस्था में एक संतुलनकारी, विश्वसनीय और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

चुनौतियां और समाधान

कल्पना कीजिए कि भारत पश्चिम एशिया के रेगिस्तान से गुज़रती एक कारवाँ यात्रा पर है। कारवाँ का लक्ष्य साफ़ है शांति, विकास और सुरक्षा। रास्ता पुराना है, सदियों से चला आ रहा, लेकिन आज उसमें नई आँधियाँ और नए मोड़ हैं। सवाल यह नहीं कि रास्ता कठिन क्यों है, सवाल यह है कि कारवाँ आगे कैसे बढ़े।

पहली आँधी आती है इज़रायल–फ़िलिस्तीन संघर्ष की। भारत यहाँ तलवार लेकर नहीं उतरता, बल्कि पानी और मरहम लेकर पहुँचता है। जब गोलियों के शोर में भारत दवाइयाँ, भोजन और राहत भेजता है, तो लोगों को समझ आता है कि यह देश पक्ष नहीं, मानवता के साथ खड़ा है। यही लगातार मानवीय सहायता धीरे-धीरे अविश्वास की रेत को ठंडा करती है। आगे बढ़ते ही कारवाँ को ईरान और प्रतिबंधों का काँटेदार रास्ता मिलता है। भारत इसे छलाँग लगाकर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे क़दमों से पार करता है—पहले चाबहार में व्यापार, फिर परिवहन, फिर निवेश। साथ में रूस, मध्य एशिया और यूरोप को जोड़ देता है, ताकि यह रास्ता अकेले भारत का नहीं, सबका बन जाए। जब रास्ता सबका होता है, तो उसे रोकना मुश्किल हो जाता है।

फिर सामने आता है पाकिस्तान का शोर और ओआईसी की राजनीति। भारत यहाँ बहस नहीं बढ़ाता, बल्कि काम बढ़ाता है तेल के सौदे, निवेश, रोज़गार और तकनीक। जब खाड़ी देशों की तरक़्क़ी भारत से जुड़ती है, तो वे शोर को खुद ही अनसुना करने लगते हैं।

सबसे भारी बोझ है तेल पर निर्भरता। भारत इसका हल सूरज और हवा में खोजता है—हरित हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और बिजली ग्रिड। तेल की जगह भविष्य की ऊर्जा रिश्ता बन जाती है। और कारवाँ की ताक़त हैं प्रवासी भारतीय। उनकी सुरक्षा, कौशल और सम्मान ही असली पूँजी है। जब वे सुरक्षित हैं, तो कारवाँ निश्चिंत आगे बढ़ता है। यह चुनौती टकराव से नहीं, धैर्य, भरोसे और दूरदर्शिता से भारत इन चुनौतियों को पार होगी ।

क्या भारत में मुस्लिमों का विरोध है

भारत के भीतर अक्सर हिंदू–मुस्लिम द्वंद्व की चर्चा होती है, किंतु वैश्विक यथार्थ इससे भिन्न है। यदि भारत वास्तव में मुस्लिम-विरोधी होता, तो मुस्लिम बहुल देशों के साथ गहरी रणनीतिक साझेदारी, अरबों डॉलर का व्यापार और दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते संभव नहीं होते। जिस भूमि से इस्लाम का उदय हुआ, वहीं आज हिंदू मंदिरों का निर्माण होना सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान का प्रतीक है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की तथाकथित “मुस्लिम समस्या” सभ्यतागत नहीं, बल्कि आंतरिक राजनीतिक विमर्श से उपजी है। सिंधु घाटी से लेकर आज के भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे तक, भारत-पश्चिम एशिया संबंध सभ्यतागत निरंतरता हैं।

भारत का सभ्यतागत संवाद

भारत आज आतंकवाद, भू-राजनीति और सभ्यतागत संवाद के जटिल दौर में एक संतुलित और परिपक्व नीति अपना रहा है। भारत की स्पष्ट वैचारिक स्थिति है कि उसकी लड़ाई किसी धर्म से नहीं, बल्कि हिंसा और कट्टरपंथ से है। इसी कारण वह मुस्लिम बहुल देशों के साथ गहरे संबंध बनाए रखते हुए भी आतंकवाद के विरुद्ध शून्य-सहिष्णुता की नीति पर अडिग है। दीर्घकालिक रणनीति के तहत भारत इस्लामी देशों के साथ आतंकवाद-रोधी सहयोग, खुफिया सूचना साझा करना, धन-शोधन पर नियंत्रण और कट्टरपंथी नेटवर्क पर निगरानी जैसे उपायों को मज़बूत कर रहा है। इससे आतंकवाद की जड़—वित्त, विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय संपर्क—पर प्रहार संभव होता है। साथ ही भारत पश्चिमी देशों से तकनीक और सुरक्षा सहयोग लेते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है। यह संतुलित दृष्टिकोण पाकिस्तान को धीरे-धीरे अलग-थलग करता है और वैश्विक समुदाय को यह संदेश देता है कि भारत सहयोग, संवाद और संस्थागत कूटनीति के माध्यम से आतंकवाद को दीर्घकाल में कमजोर कर सकता है।

Topics: मुस्लिम देशपश्चिम एशिया और भारतभारत और मुस्लिम देशमोदी कालइस्लाममुस्लिमहिंदू
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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