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रक्षा की रास स्वदेशी के हाथ

भारत की रक्षा शक्ति अब केवल आयातित हथियारों की संख्या से नहीं मापी जाती। स्वदेशी अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता के दम पर हमारी ताकत बढ़ी है, साथ ही खर्चे में भी कमी आई है

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Dec 25, 2025, 12:38 pm IST
inभारत, विश्लेषण, विज्ञान और तकनीक

पिछले पांच वर्ष में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक के चलते लगभग 2,64,156 करोड़ रुपए की बचत हुई। रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने पिछले दिनों संसद में पेश की अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी। केंद्र सरकार की रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण नीति के चलते यह संभव हो पाया है। इसके चलते भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता के रूप में स्वीकार किया। पाकिस्तान के साथ हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारत की स्वदेशी तकनीक को पूरी दुनिया ने देखा। इससे पहले भारत लंबे समय तक विदेशी हथियार प्रणालियों पर निर्भर था, इसके चलते रक्षा क्षेत्र में भारत को भारी रकम खर्च करनी पड़ती थी। डीआरडीओ की स्वदेशी पहल ने इस स्थिति को बदलने का कार्य किया है।

आयात निर्भरता का दौर

लगभग एक दशक पहले तक रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत दूसरे देशों पर पूरी तरह निर्भर था। युद्धक विमान, मिसाइल प्रणाली, रडार, वायु रक्षा उपकरण और संचार तकनीक-लगभग हर क्षेत्र में आयात पर निर्भरता बनी रही। इसके परिणामस्वरूप रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा के रूप में बाहर जाता रहा। कई बार संकट की परिस्थितियों में हथियारों की आपूर्ति, उनके स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता राजनीतिक शर्तों से बंधी रहती थी, मसलन यदि किसी चीज की जरूरत पड़ी तो उनके विशेषज्ञों को ही बुलाना पड़ता था। विदेशों से युद्धक विमान, मिसाइल तो मिलती थी लेकिन तकनीक नहीं मिलती थी। इसके चलते रखरखाव में भी काफी खर्चा आता था।

अग्नि मिसाइल श्रृंखला का विस्तार

डीआरडीओ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में अग्नि मिसाइल श्रृंखला का निरंतर विकास शामिल है। बीते पांच वर्षों में इस श्रृंखला को अधिक सटीक, अधिक विश्वसनीय और अधिक सक्षम बनाया गया। बहु-लक्ष्य प्रहार क्षमता के सफल परीक्षणों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब जटिल सामरिक तकनीकों में आत्मनिर्भर हो चुका है। इस तकनीक के माध्यम से एक ही प्रक्षेपास्त्र से अलग-अलग लक्ष्यों पर प्रहार संभव होता है। यदि यह क्षमता विदेश से प्राप्त की जाती, तो इसके लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते। साथ ही तकनीकी नियंत्रण भी बाहरी शक्तियों के हाथ में ही रहता। अब ऐसा नहीं है। स्वदेशी तकनीक से इस श्रृंखला की मिसाइलों को बनाया गया है।

अत्याधुनिक प्रक्षेपास्त्र तकनीक

डीआरडीओ द्वारा विकसित हाइपरसोनिक (तीव्रगामी) मिसाइल तकनीक यानी ऐसे प्रक्षेपास्त्र जो अत्यंत तेज गति से अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं। सामान्य रूप से कहें तो ये प्रक्षेपास्त्र ध्वनि की गति से कई गुना तेज चलते हैं और सटीक जगह वार करते हैं। इससे शत्रु को संभलने का मौका भी नहीं मिलता। यह प्रक्षेपास्त्र दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को भी चकमा देते हैं। इनकी गति और दिशा में अचानक बदलाव करने की क्षमता इन्हें और अधिक प्रभावी बनाती है। इसके चलते यह दुश्मन की रडार में भी आसानी से नहीं आ पाते।

स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली

आधुनिक युद्ध में आकाश की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। छोटे ड्रोन, कम ऊंचाई से आने वाले हवाई हमले और तेज गति वाले लक्ष्य नई चुनौतियां बनकर उभरे हैं। डीआरडीओ ने इन खतरों को ध्यान में रखते हुए स्वदेशी वायु रक्षा प्रणालियां विकसित की हैं। ये दुश्मन के हथियारों को हवा में मार गिराने में सक्षम होते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ऐसा ही हुआ था। इन प्रणालियों के देश में ही विकसित होने के चलते विदेशी उपकरणों के आयात की आवश्यकता को काफी कम किया है। साथ ही, इनके रखरखाव, मरम्मत और प्रशिक्षण की व्यवस्था देश के भीतर उपलब्ध है। इसके चलते खर्च में भारी कमी आई। यह बचत रक्षा बजट पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में सहायक बनी है।

स्वदेशी टैंक-रोधी तकनीक

डीआरडीओ ने सैनिकों की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए स्वदेशी टैंक-रोधी मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं। ये प्रणालियां दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों के विरुद्ध प्रभावी हैं और आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।पहले इन प्रणालियों के लिए भारत को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। स्वदेशी उत्पादन से न केवल आयात पर होने वाला खर्च बचा, बल्कि संकट के समय आपूर्ति बाधित होने की आशंका भी समाप्त हुई। यह बचत प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है। इसके अलावा डीआरडीओ ने अलग-अलग विकसित स्वदेशी रडार, मिसाइल और नियंत्रण प्रणालियों को जोड़कर एक समेकित वायु सुरक्षा ढांचा तैयार किया है। इस ढांचे ने विदेशी मिश्रित प्रणालियों की आवश्यकता को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। एक ही स्वदेशी ढांचे में विकसित प्रणालियों के चलते इनका संचालन सरल हुआ है। रखरखाव की लागत में कमी आई है। दीर्घकाल में यह समन्वय रक्षा व्यय को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

संचार तकनीक और निगरानी

आधुनिक युद्ध केवल हथियारों का नहीं, बल्कि सूचना और संचार का भी युद्ध है। डीआरडीओ ने इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, निगरानी और संचार के क्षेत्र में भी स्वदेशी तकनीकों का विकास किया है। इन प्रणालियों के माध्यम से दुश्मन की संचार व्यवस्था को बाधित करना और अपनी सूचनाओं को सुरक्षित रखना संभव हुआ है। स्वदेशी तकनीक होने के कारण न केवल लागत में कमी आई, बल्कि संवेदनशील जानकारी के संरक्षण में भी वृद्धि हुई।

डीआरडीओ की तकनीकों का लाभ केवल सेना तक सीमित नहीं है। स्वदेशी अनुसंधान ने देश के रक्षा उद्योग को भी सशक्त किया है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को उत्पादन में भागीदारी मिली, जिससे रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए हैं। जब हथियार और तकनीक देश में बनती है, तो उसका आर्थिक लाभ देश को ही होता है।

Topics: DRDOबहु-लक्ष्य प्रहार क्षमतास्वदेशी तकनीकहाइपरसोनिक मिसाइल तकनीकआत्मनिर्भरतापाञ्चजन्य विशेषवायु रक्षा प्रणालीरक्षा आत्मनिर्भरताआयात निर्भरतास्वदेशीकरण नीतिरक्षा बजट की बचततकनीकी एवं सामरिकअग्नि मिसाइल श्रृंखला
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