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संतुलन से सधेगा हित

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाए रखना होगा। ऐसे ही कार्यपालिका के अधिकारों को भी सम्मान देना होगा। इन दोनों के बीच आवश्यक संतुलन ही आम लोगों के हित को सुनिश्चित कर सकता है

Written byन्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईकेन्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
Dec 24, 2025, 08:57 am IST
inभारत, मत अभिमत

भारतीय संविधान शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार, “संसद या राज्य विधानसभाएं न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकतीं, सिवाय महाभियोग के मामलों के।” जबकि अनुच्छेद 212 विधायिका की कार्यवाही पर न्यायालयों के हस्तक्षेप को सीमित करता है। फिर भी, न्यायिक इतिहास में राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं, जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति, फैसले और सेवानिवृत्ति के बाद की भूमिकाएं शामिल हैं। न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए महाभियोग एक अंतिम उपाय है, लेकिन इसका दुरुपयोग न्यायपालिका पर दबाव बनाने का माध्यम बन सकता है।

इसके ताजा उदाहरण हैं न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ विपक्षी दलों (मुख्यतः डी.एम.के., कांग्रेस और अन्य दलों) के 100 से अधिक सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव दायर किया। आरोप है कि उनके फैसले राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हैं और पक्षपातपूर्ण हैं। मुख्य विवाद मदुरै के सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर मामले से जुड़ा है, जहां न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कार्तिगई दीपम् उत्सव के दौरान मंदिर के पास एक स्तंभ पर दीप जलाने की अनुमति दी, जो एक दरगाह के निकट है। विपक्ष ने इसे सांप्रदायिक पक्षपात बताया। प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा गया, लेकिन 56 से अधिक सेवानिवृत्त न्यायाधीशों (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों सहित) ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया, इसे ‘राजनीतिक दबाव की कोशिश’ बताया। उनका कहना है कि फैसलों से असहमति के आधार पर महाभियोग का दुरुपयोग न्यायपालिका की गरिमा को क्षति पहुंचाता है।

इससे पहले न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा (दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद स्थानांतरण) का मामला भी सामने आया था। 14 मार्च, 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के आउटहाउस में आग लगने की घटना हुई। आग बुझाने के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी (आंशिक रूप से जली हुई) मिलने की सूचना मिली। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसमें न्यायमूर्ति शील नागू (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश), न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया (हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति अनु सिवरमन (कर्नाटक उच्च न्यायालय) शामिल थे।

न्यायमूर्ति वर्मा को न्यायिक कार्य से हटा दिया गया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय (उनकी मूल अदालत) स्थानांतरित कर दिया गया। समिति की रपट में उन्हें प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया। न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफे की सलाह नहीं मानी। इसके बाद रपट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई। यह मामला न्यायिक जवाबदेही का उदाहरण है, लेकिन इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप का सीधा आरोप नहीं लगा। इससे पता चलता हैं कि न्यायपालिका और राजनीति के बीच संतुलन नाजुक है। राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले न्यायाधीशों की नियुक्ति या फैसलों पर असहमति से महाभियोग की धमकी न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकती है।

विशेषज्ञों का मत है कि महाभियोग केवल गंभीर कदाचार के लिए अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि वैचारिक मतभेदों को दबाने का माध्यम। संविधान न्यायपालिका को विधायी कार्यवाही पर समीक्षा का अधिकार देता है, जबकि विधायिका को न्यायाधीशों पर सीमित नियंत्रण। इस संतुलन को बनाए रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है, ताकि न्यायपालिका निष्पक्ष और स्वतंत्र रहे।

Topics: न्यायपालिकाविधायिकाभारतीय संविधानकार्यपालिकान्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरणमहाभियोगन्यायमूर्ति वर्माप्रधानमंत्रीराष्ट्रपति
न्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
न्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
अध्यक्ष, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, नई दिल्ली [Read more]
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