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होम भारत

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान से बदलेगा शिक्षा का परिदृश्य

मोदी सरकार शिक्षा क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों के लिए प्रयत्नशील है। हालांकि, इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि पहले कार्यकाल में ही तैयार होने लगी थी। इस क्रम में भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की समाप्ति) विधेयक–2018 के मसौदे को विभिन्न हितधारकों से परामर्श और प्रतिक्रिया लेने के लिए सार्वजनिक किया गया था।

Written byप्रो. रसाल सिंहप्रो. रसाल सिंह
Dec 23, 2025, 09:58 pm IST
in भारत, शिक्षा

अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ से ही मोदी सरकार शिक्षा क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों के लिए प्रयत्नशील है। हालांकि, इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि पहले कार्यकाल में ही तैयार होने लगी थी। इस क्रम में भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की समाप्ति) विधेयक–2018 के मसौदे को विभिन्न हितधारकों से परामर्श और प्रतिक्रिया लेने के लिए सार्वजनिक किया गया था। व्यापक विचार-विमर्श और जनभागीदारी से निर्मित राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार का अगला महत्वपूर्ण कदम था।

मैकॉले और मैकॉले-पुत्रों द्वारा निर्मित-विकसित भारत का शिक्षा-तंत्र भारत और भारतीयों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहा है। इसलिए इस औपनिवेशिक तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए उसे भारत केंद्रित बनाने और उसके भारतीयकरण पर जोर दिया जाता रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनराविष्कार और प्रतिष्ठा राष्ट्रीय शिक्षा नीति की केंद्रीय चिंता रही है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाकर और उसकी पहुँच सर्वसाधारण तक सुनिश्चित करके ही भारत में अंतर्निहित अपरिमित संसाधनों और भारतवासियों की असीम क्षमताओं का पूर्ण विकास संभव है। गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ शिक्षा, समाजोपयोगी नवाचारी शोध तथा युवा पीढ़ी के कौशल विकास द्वारा ही राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने उपरोक्त विधेयक में आंशिक परिवर्तन करते हुए उसके कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक–2025” को संयुक्त संसदीय समिति को विचारार्थ प्रेषित किया गया है। यह सम्पूर्ण उच्च शिक्षा क्षेत्र का एकमात्र नियामक तंत्र होगा। हालांकि, चिकित्सा शिक्षा,फार्मेसी और विधि की शिक्षा इसके दायरे में नहीं होगी।

अभी उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनेक नियामक संस्थाएँ कार्यरत हैं। उनके अपने–अपने मानदंड व मापदंड हैं। यूजीसी, ए आई सी टी ई,एन सी टी ई, वास्तु परिषद, कृषि विज्ञान अनुसंधान परिषद, दूरस्थ और मुक्त शिक्षा, ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा तंत्र, आईसीएसएसआर, आईसीएआर, नैक, एनआईआरएफ जैसी एक दर्जन से अधिक नियामक संस्थाएँ देश के कला, विज्ञान, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, शिक्षा, प्रबंधन, कृषि शिक्षा आदि अनुशासनों से सम्बंधित उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों की संबद्धता, मूल्याङ्कन, प्रत्यायन, रैंकिंग, वित्तपोषण और नियंत्रण आदि काम करती हैं। इन अलग-अलग नियामक संस्थाओं के अधीन उच्च शिक्षा पृथक्करण और बहुपरतीय नियंत्रण का शिकार थी। देश भर में ऐसे अनेक उच्च शिक्षण संस्थान व शोध-संस्थान हैं, जहाँ एक साथ कई प्रकार के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं एवं इनसे सम्बद्ध शोध-कार्य किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी संस्थानों को क्रमशः बहु-अनुशासनिक बनाने पर जोर दिया गया है। विभिन्न पेशेवर और परम्परागत संस्थानों की आपसी दूरी और अलगाव के ‘स्टील फ्रेम’ की क्रमिक समाप्ति की जा रही है।

इन बहु-अनुशासनिक उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों को अपनी मान्यता, मूल्याङ्कन, प्रत्यायन, रैंकिंग एवं वित्तपोषण आदि के लिए अलग-अलग नियामक संस्थाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ता था। इस प्रक्रिया में ये संस्थान अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करते रहे हैं। कई बार इन नियामक संस्थाओं में अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का दोषारोपण भी होता रहा है। पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं उनके कार्यान्वयन में भी ये नियामक संस्थाएँ दोषमुक्त नहीं रही हैं। ये स्वायत्त नियामक संस्थाएं आपसी टकराव और अंतर्विरोध का भी शिकार रही हैं। इससे संबंधित संस्थानों को अनावश्यक अड़चन और अवरोध का सामना करना पड़ता है।

इसीलिए केंद्र सरकार ने इन सभी नियामक संस्थाओं की कार्यशैली का मूल्याङ्कन करते हुए इन्हें एक सर्वसक्षम निकाय के अधीन लाने का निर्णय लिया है। अब अलग-अलग नियामक संस्थाओं में बँटी-बिखरी हुई उच्च शिक्षा एक ही नियामक संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ विधेयक–2025, जो कि सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में काम करेगा। यह यूजीसी एक्ट–1956,ए आई सी टी ई एक्ट–1987 और एन सी सी टी एक्ट–1993 का स्थान लेगा। इस तरह के एकल और केंद्रीकृत निकाय की संस्तुति राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2009) और यशपाल समिति (2010) ने भी की थी। यह आयोग विभिन्न संस्थाओं के आपसी सामंजस्य,समन्वय और सक्रियता के अभाव और लालफीताशाही के प्रभाव की समाप्ति और जवाबदेही और पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

इस आयोग की विशेषता यह है कि यह एक साथ देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शीर्षस्थ उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी आदि का नियमन और नियंत्रण करते हुए उनके मूल्याङ्कन, प्रत्यायन एवं रैंकिंग आदि का काम करेगा। चेयरमैन के अलावा इसके 12 सदस्य और होंगे।

इस आयोग के विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, विकसित भारत मानक परिषद और विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद जैसे तीन आयाम (वर्टिकल) होंगे। यह आयाम नियमन, मान्यता और व्यावसायिक मानक निर्धारण का कार्य करेंगे। अब तक इन संस्थानों के वित्तपोषण का काम यूजीसी आदि कई एजेंसियां करती थीं। अब यह कार्य सीधे शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को मौजूदा अलग-अलग नियामक संस्थाओं के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी एवं ये शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में तत्पर हो सकेंगे।

यह आयोग भारत में उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ बनाने के लिए उत्तरदायी होगा। यह एकीकृत निकाय देशभर की उच्च शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम, अधिगम और मानकों में स्तरीकरण सुनिश्चित करेगा। संस्कारपूर्ण, कौशल संवर्द्धक और रोजगारपरक शिक्षा देने वाले सर्वसमावेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता, संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम भी यह आयोग करेगा। इसके अलावा निर्धारित मानकों,प्रक्रियाओं और गुणवत्ता का अनुपालन न करने वाले संस्थानों पर 10 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपए तक जुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया गया है।

यह आयोग उच्च शिक्षण संस्थानों के दोहरे-तिहरे नियमन की वर्तमान व्यवस्था का सरलीकरण और स्तरीकरण करेगा, ताकि शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में दोहरा/तिहरा हस्तक्षेप न हो। इस आयोग द्वारा उच्च शिक्षा में मानकों और गुणवत्ता के संबंध में पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण और योग्यता आधारित निर्णय के माध्यम से विनियमन किया जायेगा। इस आयोग को अधिगम परिणामों (लर्निंग आउटकम) पर विशेष ध्यान देने के अलावा शैक्षणिक मानकों में सुधार, संस्थानों के शैक्षणिक प्रदर्शन का मूल्यांकन, संस्थानों का परामर्श, शिक्षकों का प्रशिक्षण, अधुनातन शैक्षिक पद्धतियों और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने आदि का काम भी करना होगा। यह आयोग संस्थानों के नियमन और संचालन के लिए अनुकूलित वातावरण बनाते हुए अधिक लचीलेपन के साथ स्वायत्तता प्रदान करेगा। इस आयोग के पास उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने तथा स्तरहीन और कागजी संस्थानों को बंद कराने की शक्ति भी होगी।

औपनिवेशिक काल से ही जनसंख्या के अनुपात में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या एवं गुणवत्ता की दृष्टि से भारत की स्थिति सुखद नहीं है। भारत लगभग एक हजार विश्वविद्यालयों एवं चालीस हजार कॉलेजों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुपात में यह बहुत सीमित है। भारत में सार्वजनिक उच्च शिक्षा का स्तर भी चिंताजनक है। भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के स्तरीकरण, विस्तार और विकास की अत्यधिक आवश्यकता एवं असीम संभावनाएं हैं। उच्च शिक्षा की वर्तमान दशा स्वतंत्रता के बाद देश में अपनाई गयी उच्च शिक्षा नीति के मूलभूत दोषों को उजागर करती है। किंतु अब यह नव निर्मित आयोग उच्च शिक्षा की खामियों को चिह्नित करते हुए उन्हें दूर करने तथा शिक्षा के स्तरीकरण और भारतीयकरण का काम करेगा। यह शिक्षा तंत्र के विस्तार को भी सुनिश्चित करेगा।

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करते हुए भारत को ज्ञान अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को योग्य शिक्षक और सक्षम नेतृत्व प्रदान करने में भी इस आयोग द्वारा निर्मित नीतियों और मानकों की निर्णायक भूमिका होगी। इस एकीकृत और सर्वसक्षम आयोग के गठन से समय, श्रम–ऊर्जा, संसाधन और धन की भी बचत होगी। उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सरकार को उच्च शिक्षा तंत्र में भारी निवेश करने की भी आवश्यकता होगी।

भारत सरकार ने इस आयोग के साथ ही विगत 04 अगस्त, 2023 को ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन अधिनियम’ को भी संसद से पारित कराया है। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की भांति यह फाउंडेशन भी अनुसंधान की दशा व दिशा को बदलने की युगांतकारी पहल है। यह फाउंडेशन गणित, प्राकृतिक विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञान की अंतर्क्रिया और अभिक्रिया को संभव करेगा। यह अनुसंधान, नवाचार एवं उद्यमिता के लिए रणनीतिक दिशा एवं आवश्यक संसाधन और ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने वाला देश का सर्वोच्च निकाय होगा। आज भारत चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा लहरा रहा है। यह भारत के वैज्ञानिकों की गंभीर अनुसंधान-वृति का प्राप्य है। भारत की प्राचीनतम अनुसंधान-वृत्ति का पुनराविष्कार, प्रोत्साहन इस फाउंडेशन के ध्येय है।

संसाधनों की कमी और लालफीताशाही को समाप्त करके और अनुसंधान को समाज और उद्योग जगत से जोड़कर ही भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है। सन् 2021 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का दायित्व संभालने के बाद से ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भारत के विकास में शिक्षा क्षेत्र की भूमिका को पहचानते हुए उसमें आमूलचूल बदलाव की पहल की है। भारतीय शिक्षा तंत्र को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने की भी आवश्यकता है क्योंकि बहुत से प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर स्थापित कर रहे हैं। हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को इनके साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए इच्छाशक्ति,गुणवत्ता और साधन– संसाधनों की महती आवश्यकता होगी। उच्च शिक्षा फंडिंग एजेंसी को लेकर भी बौद्धिक जगत आशंकित और असुरक्षित हैं। जबकि यह योजना सार्वजनिक शिक्षा–तंत्र के आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने,भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाई गई है।

यह सच है कि शिक्षा तंत्र को सिर्फ सरकार का दायित्व न मानकर सभी हितधारकों को उसमें भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। नियुक्ति–प्रक्रिया में गुणवत्ता और पारदर्शिता, संचालन में दूरदर्शिता और सक्षमता, आधारभूत ढांचे के निर्माण में आंशिक और आनुपातिक भागीदारी और उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए सभी हितधारकों को अपना सर्वोत्तम योगदान देने के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। दायित्व–विमुख और अधिकार–सचेत बौद्धिक समाज उच्चशिक्षा तंत्र न तो सरकार से प्रश्न पूछने का नैतिक साहस रखता है, और न ही देश और समाज का कल्याण करने की सामर्थ्य रखता है। यह हास्यास्पद ही है कि कुछ विपक्षी और दक्षिण भारत के सांसदों ने इस अधिष्ठान के नाम पर तंज कसते हुए इसे हिंदी थोपने की कोशिश बताया है।

यह सकारात्मक सुधारों को स्वीकारते हुए उनके बेहतर कार्यान्वयन की दिशा में संगठित प्रयास करने का समय है, अन्यथा उच्चशिक्षा तंत्र भी स्कूली शिक्षा तंत्र की गति को प्राप्त हो जाएगा।

Topics: आईसीएआरनैकएनआईआरएफश्रम–ऊर्जामोदी सरकारसंसाधनराष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020प्रो. रसाल सिंहभारतीय उच्च शिक्षा आयोगविकसित भारत शिक्षा अधिष्ठानडिजिटल शिक्षा तंत्रआईसीएसएसआर
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