अरुणाचल प्रदेश में 60 किमी चीनी घुसपैठ का दावा कितना सच? किरेन रिजिजू ने कांग्रेस के मिथ्या प्रलाप की खोली पोल
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अरुणाचल प्रदेश में 60 किमी चीनी घुसपैठ का दावा कितना सच? किरेन रिजिजू ने कांग्रेस के मिथ्या प्रलाप की खोली पोल

भारत सरकार ने सीमा को लेकर स्थानीय ग्रामीणों की चिंता को गंभीरता से लिया है।

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Aug 20, 2026, 07:34 pm IST
inभारत, अरूणाचल प्रदेश
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने उन दावों को गलत बताया जिनमें कहा जा रहा है कि चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत की सीमा के अंदर 60 किलोमीटर तक घुस गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अरुणाचल प्रदेश सीमा पर सीमांकन स्पष्ट नहीं होने के कारण भ्रम की स्थिति है। किसी भी भारतीय गांव पर कब्जा करने का दावा पूरी तरह गलत है।

अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ सीमा पर कई जगहों पर स्पष्ट सीमांकन नहीं है। इस कारण दोनों पक्षों की सीमा को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। सीमांकन शुरुआती समय में ही नहीं हुआ था। भारत सरकार ने सीमा को लेकर स्थानीय ग्रामीणों की चिंता को गंभीरता से लिया है। रिजिजू के मुताबिक सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं होने के कारण कुछ जमीन को लेकर दोनों पक्षों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। भारत की तरफ के लोगों का मानना है कि देश की जमीन आगे तक है जबकि चीन की तरफ बसे तिब्बती और स्थानीय लोग भी अपने क्षेत्र के विस्तार को लेकर अलग दावा करते हैं। भारत और चीन की सीमा लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी है। इसमें अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत (चीन) के बीच की सीमा करीब 1,129 किलोमीटर है, जिसे मैकमोहन रेखा के रूप में जाना जाता है। यह सीमा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का पूर्वी हिस्सा है।

एलएसी की क्या है स्थिति

भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर कई स्थानों पर सीमा पर खम्भे नहीं हैं। इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच जमीन को लेकर गलतफहमी होने के कारण तनाव उत्पन्न हो जाता है। दोनों देश एलएसी की स्थिति को अपने-अपने तरीके और नजरिये से देखते हैं। अरुणाचल प्रदेश और चीन के बीच की सीमा (मैकमोहन रेखा) बेहद ऊंची पहाड़ियों, गहरी घाटियों और ऊबड़-खाबड़ इलाकों से बनी हुई है। यहां का कठिन भूगोल सैन्य गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के विकास को बहुत चुनौतीपूर्ण बनाता है। हिमालय की ऊंची चोटियां और बर्फीले दर्रे सीमा पर मौजूद हैं। नदियां, पहाड़ों को काटकर गहरी और संकीर्ण घाटियां बनाती हैं। भारी बर्फबारी और लगातार बारिश से रास्ते बंद हो जाते हैं। सड़क और पुल बनाना यहां बहुत मुश्किल काम है। दोनों देश ऊंची चोटियों पर अपनी चौकियां बनाते हैं। भारत सीमा के पास नई सड़कें और सुरंगें बना रहा है।

वर्ष 2013 में एके एंटनी ने किया था स्वीकार

भारत के लिए समस्या का असल कारण चीन द्वारा पहले से सीमा पर रास्ता बना लेना है। चीन ने इस इलाके में राजमार्ग और अन्य आधारभूत संरचना का बड़े पैमाने पर निर्माण कर रखा है। संसद में 2013 के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने स्वीकार किया था कि आजादी के बाद लंबी अवधि तक भारत की रणनीतिक नीति थी कि सीमावर्ती इलाकों को कम विकसित रखना ही अधिक सुरक्षित है क्योंकि पक्की सड़कों से दुश्मन सेना को आगे बढ़ने में आसानी हो सकती है। इस नीति के तहत अग्रिम इलाकों में भारी निर्माण कार्यों से बचा जाता था ताकि विपरीत परिस्थितियों में उसका सामरिक लाभ विरोधी देश को नहीं मिल जाए।

सितंबर 2013 में संसद के सत्र के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यह बात कही थी कि चीन ने अपनी तरफ सीमा पर ढांचागत विकास बहुत अधिक कर लिया है। जानकारों का मानना है कि इससे भारत सीमा प्रबंधन में पीछे रह गया है।  यह मुख्यतः जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी की चीन के पक्ष के नीतियों के कारण है। वर्ष 1952 के दौरान भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तिब्बत में तैनात चीनी सेना (पीएलए) के लिए लगभग 3,500 टन चावल भेजने की अनुमति दी थी। 21 जून 1952 को दिल्ली में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद नेहरू जी ने यह स्वीकार किया था कि चीन की मांग पर भारत से तिब्बत के दुर्गम रास्तों के जरिए सीमित मात्रा में चावल भेजा गया है।

सामरिक रणनीति पर दिया जा रहा है ध्यान

वर्तमान समय में सामरिक सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सड़कें, सुरंगें और हवाई पट्टी जैसी सामरिक संपत्तियों का विकास तेज गति से किया जा रहा है। सीमा सड़क संगठन ने कश्मीर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में बड़े पैमाने पर आधारभूत संरचना का विकास किया है। मोदी सरकार के इस रुख के कारण चीन अब तिलमिलाया हुआ है, जबकि कांग्रेस की सरकारों में चीन को इस प्रकार की कोई भी चुनौती नहीं मिलती थी।

अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में स्थित सामरिक और भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील तासिंग (ताकसिंग) क्षेत्र तक सड़क और संपर्क का विकास करना भारत सरकार की त्वरित सीमावर्ती बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) विकास नीति का एक मुख्य हिस्सा है। जिससे चीन अंदर ही अंदर काफी परेशान है। भारतीय सेना और आईटीबीपी ने पहले की तुलना में सीमा क्षेत्र में अपनी निगरानी को काफी मजबूत किया है। सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भारत पूर्व की सरकारों के अपेक्षा काफी मजबूत किया है। नदी और घाटी के संगम वाले विवादित क्षेत्र में चीनी पीएलए के द्वारा बनाए गए ढांचे नई घुसपैठ का हिस्सा नहीं हैं। चीन ने इस भूभाग पर वर्ष 1959 में कब्जा किया था और 1962 के युद्ध के बाद वहां अपनी स्थिति मजबूत की है। उस समय सरकार कांग्रेस की थी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे।

Topics: चीनी घुसपैठकांग्रेसजवाहरलाल नेहरूकिरेन रिजिजूमोदी सरकारIndia China BorderlacArunachal Pradesh
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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