चीन और यूरोपीय संघ के बीच चल रहा टैरिफ युद्ध अब रोजमर्रा की चीजों तक पहुंच गया है। पहले इलेक्ट्रिक व्हीकल्स से शुरू हुआ विवाद अब दूध, चीज और क्रीम जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स पर आ गया है। चीन ने यूरोपीय संघ से आने वाले डेयरी आयात पर 21.9% से लेकर 42.7% तक के नए अस्थायी टैरिफ लगा दिए हैं। यह फैसला अगस्त 2024 में शुरू हुई एंटी-सब्सिडी जांच के आधार पर लिया गया है। जांच में पाया गया कि यूरोपीय संघ की सब्सिडी से वहां के डेयरी प्रोडक्ट्स चीन में सस्ते दाम पर बिक रहे थे, जिससे चीनी कंपनियों को नुकसान हो रहा था। ये टैरिफ 23 दिसंबर 2025 से लागू हो रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
ये शुल्क कंपनी के हिसाब से अलग-अलग हैं। जांच में सहयोग करने वाली कंपनियों पर औसतन 28.6% टैरिफ लगेगा, जबकि सहयोग न करने वालों पर सबसे ज्यादा 42.7%। ये टैरिफ ताजा और प्रोसेस्ड चीज, कुछ तरह के दूध और क्रीम पर लागू होंगे। चीन का कहना है कि यूरोपीय संघ की सब्सिडी से उनके घरेलू डेयरी इंडस्ट्री को काफी नुकसान पहुंचा है। चीन दुनिया का बड़ा डेयरी मार्केट है, इसलिए यूरोपीय कंपनियों के लिए यह झटका है – उनकी बिक्री कम हो सकती है और मुनाफा घट सकता है।
इस युद्ध की शुरुआत और बैकग्राउंड
सब कुछ अक्टूबर में शुरू हुआ जब यूरोपीय संघ ने चीनी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स पर 45% तक टैरिफ लगा दिया। इसके जवाब में चीन ने एक के बाद एक कदम उठाए। पहले ब्रांडी पर शुल्क लगाया, फिर पोर्क पर एंटी-डंपिंग टैरिफ (62.4% तक प्रोविजनल)। हाल ही में पोर्क और उसके प्रोडक्ट्स पर शुल्क थोड़ा कम करके 4.9% से 19.8% कर दिया। नवंबर में यूरोपीय संघ ने चीनी ब्रांडी टैरिफ को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन में चुनौती दी। अब डेयरी की बारी है। दोनों तरफ से ये कदम जवाबी हैं और कई सेक्टर्स में फैल रहे हैं।
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भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
इस झगड़े से भारत को कुछ फायदे की गुंजाइश दिख रही है। डेयरी में अगर यूरोपीय संघ का आयात चीन में कम होता है, तो भारत दूध पाउडर या प्रोसेस्ड डेयरी प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट कर सकता है। भारत दुनिया का बड़ा दूध उत्पादक है। इसी तरह, चीनी ईवी पर यूरोपीय टैरिफ से यूरोपीय कंपनियां चीन पर कम निर्भर हो सकती हैं और भारत में मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट कर सकती हैं – मेक इन इंडिया और ईवी पॉलिसी से मदद मिलेगी।
हालांकि रिस्क भी हैं। लंबे टैरिफ युद्ध से ग्लोबल कमोडिटी प्राइस में उतार-चढ़ाव आएगा, जो भारत में फूड इन्फ्लेशन या इंपोर्ट कॉस्ट प्रभावित कर सकता है। कुछ चीजें सस्ती हो सकती हैं, कुछ महंगी। अगर बड़ा ट्रेड स्लोडाउन हुआ तो भारत के आईटी, टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट पर भी असर पड़ सकता है।

















