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अन्याय से न दबेगा न्याय

जब न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह केवल विधि नहीं, राष्ट्र के विवेक की भी रक्षा करे, तब उस पर सबसे तीखे हमले होते हैं। आज न्यायिक स्वतंत्रता का प्रश्न केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि राष्ट्र-धर्म और सभ्यतागत नैतिकता की रक्षा का निर्णायक संघर्ष बन चुका है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 23, 2025, 01:11 pm IST
inभारत
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत

प्रो.(डॉ.) अंजू वली टिक्कू

भारतीय न्यायपालिका, जिसे लोकतंत्र का अंतिम दुर्ग माना जाता है, आज राजनीतिक अवसरवाद से उत्पन्न उथल-पुथल उस पर दबाव बनाने की फिराक में है। एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभर कर सामने आई है, जहां कुछ राजनीतिक दल न्यायपालिका पर वैचारिक अनुरूपता थोपने के लिए ‘न्यायिक प्रक्रिया में छेड़छाड़’ और ‘हथियार की तरह प्रयुक्त आलोचना’ का सहारा ले रहे हैं, जिससे शक्तियों के पृथक्करण का संवैधानिक सिद्धांत कमजोर हो रहा है।

न्यायपालिका को कमजोर करने प्रयास

एक चिंताजनक परंपरा स्थापित की जा रही है, जिसमें न्यायिक व्याख्या को कदाचार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महाभियोग, जो संविधान द्वारा प्रदत्त एक सुरक्षा-कवच है, उसे अब राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप निर्णय न आने पर दबाव बनाने और प्रतिशोध का उपकरण बनाया जा रहा है। वर्तमान परिदृश्य किसी सिद्धांत-आधारित आलोचना का नहीं, बल्कि डराने-धमकाने के माध्यमों द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आत्मा को कमजोर करने का एक संगठित प्रयास प्रतीत होता है।

आपातकाल का ‘अंधकारमय काल’ इतिहास की वह कठोर चेतावनी है, जब केशवानंद भारती बनाम राज्य (1973) और एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) प्रकरण के निर्णय के बाद ‘सरकारी लाइन पर न चलने’ वाले न्यायाधीशों को दंडित किया गया। किंतु आज का हमला और भी अधिक स्थायी, प्रणालीगत और बढ़ता हुआ है। वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध प्रयास से लेकर, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एस. ए. बोबडे तथा डॉ. डी. वाई. चंद्रचूड़ तक, जब भी निर्णय किसी विशेष राजनीतिक वर्ग को असहज करते रहे, तब-तब उन्हें लक्षित अभियान का सामना करना पड़ा।

न्यायिक स्वायत्तता का यह प्रणालीगत क्षरण अब एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है, जिसका प्रमाण वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर किए जा रहे दुष्प्रचार के हमलों तथा मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध लाए गए महाभियोग प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इन हमलों की गंभीरता एक गहरे वैचारिक संघर्ष को विशेष रूप से तब उजागर करती है, जब न्यायपालिका अमूर्त अंतरराष्ट्रीय मानकों की अपेक्षा राष्ट्र की ठोस वास्तविकताओं को प्राथमिकता देती है।

संतुलित न्याय की अवधारणा

हाल का विवाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की रोहिंग्या मुद्दे पर की गई टिप्पणियों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जो एक मौलिक प्रश्न के केंद्र में पहुंचता है- क्या भारतीय संविधान राष्ट्रीय सुरक्षा की तुलना में मानवाधिकार कानून को प्राथमिकता देता है? यह ‘अमूर्तता’ और ‘ठोस यथार्थ’ के बीच का एक शास्त्रीय द्वंद्व है, जिसे न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अत्यंत सावधानी से संबोधित किया है। उनके अनुसार उत्तर केवल विधि-पाठ में नहीं, बल्कि राष्ट्र-धर्म की आत्मा में निहित है। 2 दिसंबर 2025 को, अवैध रोहिंग्या प्रवासियों की हिरासत से संबंधित एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रश्न किया- ‘यदि कोई घुसपैठिया आए, तो क्या हम उसका रेड-कार्पेट बिछाकर स्वागत करें?’ यह प्रश्न ‘संतुलित न्याय’ की अवधारणा को प्रतिध्वनित करता है। यह कोई दुर्भावना नहीं, बल्कि विधिक यथार्थवाद की अभिव्यक्ति थी। भारत न तो 1951 के शरणार्थी सम्मेलन का और न ही उसके 1967 प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता है। अतः पश्चिमी सिद्धांत ‘नॉन-रिफाउलमेंट’-जिसके अनुसार शरणार्थियों को खतरे की ओर वापस नहीं भेजा जा सकता, भारत पर बाध्यकारी नहीं है। भारत को अपनी संप्रभुता की रक्षा करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी भी खतरे को विफल करने का अधिकार है।

उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर केवल यह बुनियादी प्रश्न उठाने के लिए हमला किया गया-‘कानून में वह दर्जा किसने प्रदान किया है, जिसकी मांग न्यायालय के समक्ष की जा रही है?’

किसी भी अधिकार या पात्रता पर निर्णय तब तक संभव नहीं है, जब तक यह प्रारंभिक सीमा प्रश्न स्पष्ट न हो। इसके अतिरिक्त, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने Polis (नागरिक समुदाय) और Peregrinus (विदेशी/गैर-नागरिक) की अवधारणा को पुनः प्रतिपादित किया-जहां नागरिक के अधिकार, गैर-नागरिक से ज्यादा होते हैं। विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत राज्य को अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन की शक्ति प्राप्त है। जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ‘अवैध प्रवेश करने वाले पूर्ण अधिकारों का दावा नहीं कर सकते,’ तब उन्होंने उसी प्राचीन सत्य को दोहराया, जिसे भारतीय न्यायशास्त्र सदैव से मान्यता देता आया है। 1.4 अरब की जनसंख्या वाले राष्ट्र में, जहां नागरिक मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत हैं, यदि राज्य घुसपैठियों को देश के नागरिकों के हितों की उपेक्षा कर प्राथमिकता दे तो यह न केवल राज्य के प्राथमिक कर्तव्य का उल्लंघन होगा, बल्कि राष्ट्र-धर्म का भी हनन होगा।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत के आलोचकों ने उन्हें केवल व्यक्तिगत मानवाधिकारों के संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा, किंतु उन्होंने राष्ट्र के सामूहिक अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा की उपेक्षा की।

धर्मो रक्षति रक्षितः

न्यायपालिका का कर्तव्य नागरिकों के कल्याण और राज्य की संरचनात्मक सुरक्षा को मजबूत करना है। यदि अवैध प्रवासियों को नागरिकों के समान अधिकार दिए जाएंगे, तो संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा होगा। वैसे भी भारतीय खुफिया एजेंसियां सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से हो रही रोहिंग्या घुसपैठ के चलते उत्पन्न सुरक्षा जोखिमों के बारे में कई बार आगाह कर चुकी हैं। न्यायमूर्ति ने कुछ घुसपैठियों के हितों की बजाए “राष्ट्रीय सुरक्षा” को वरीयता देकर राष्ट्र रक्षा की बात की है। यह भारतीय सिद्धांत ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’(धर्म उसकी रक्षा करता है, जो धर्म की रक्षा करता है) को पूर्णतः अभिव्यक्त करता है।

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के 44 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के समर्थन में सामूहिक वक्तव्य जारी किया, जिसमें उनके विरुद्ध की गई आलोचनाओं को प्रेरित विकृति और राजनीतिक रूप से संचालित अभियान बताया गया। दीर्घकाल में इस प्रकार का दुष्प्रचार न्यायपालिका के प्रति विश्वास को क्षीण करता है और उसके प्रति आस्था को कमजोर करता है।

न्यायिक संप्रभुता पर संगठित हमला

इसी प्रकार का एक समानांतर विवाद मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन पर भी देखा गया, जो तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी पर दीवाली दीपम् (कार्तिगई दीपम्) प्रज्ज्वलन से संबंधित उनके आदेश से जुड़ा है। यह भी न्यायिक संप्रभुता पर किया गया एक संगठित हमला प्रतीत होता है।

राजनीतिक आलोचकों ने इसे न्यायिक अतिक्रमण बताया, जबकि वास्तव में यह भारतीय संविधान की दार्शनिक आत्मा के भीतर सांस्कृतिक संरक्षण का कार्य था। 1 दिसंबर 2025 को दिए गए 49-पृष्ठ के निर्णय के पश्चात, 3 दिसंबर 2025 के आदेश में उन्होंने कानून-व्यवस्था की आड़ में लगाए गए प्रशासनिक प्रतिबंध को खारिज करते हुए दरगाह के समीप स्थित पारंपरिक दीपस्तंभ पर दीप प्रज्ज्वलन का निर्देश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया “रीति-रिवाज और परंपराएं हमारे पूर्वजों की दी हुई धरोहर हैं।” यह पितृ ऋ ण की अवधारणा का जीवंत उदाहरण है। किसी सभ्यता का अस्तित्व उसके प्रतीकों और अनुष्ठानों के संरक्षण पर निर्भर करता है। दीपम का तेजस वर्तमान पीढ़ी को उसके ऐतिहासिक गौरव और वीरता से जोड़ता है। इस परंपरा की रक्षा कर न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने भारत के उस सभ्यतागत संविधान को संरक्षित किया, जो लिखित संविधान से भी प्राचीन है।

संविधान के अनुच्छेद 124(4), 217 तथा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, महाभियोग केवल ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अयोग्यता’ के मामलों में ही प्रयोग किया जा सकता है। महाभियोग के आधार न्यायिक समिति द्वारा की गई जांच तथा संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से स्थापित किए जाते हैं। किसी निर्णय से असहमति इस मानक को पूरा नहीं करती। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन का आदेश संवैधानिक प्रावधानों और संवैधानिक दर्शन में गहराई से निहित है।

जेरमी वाल्ड्रन ने अपनी प्रसिद्ध कृति Thoughtfulness and Rule of Law में कहा है कि विधि का शासन यांत्रिक या एल्गोरिदमिक अनुप्रयोग नहीं, बल्कि नैतिक विवेक और संदर्भ-आधारित विवेचना की मांग करता है। इस प्रकरण में न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने संरक्षित न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए कठोर नौकरशाही दृष्टिकोण से परे जाकर सांस्कृतिक परंपरा की रक्षा की। अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धार्मिक अधिकारों की रक्षा न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है।

107 विपक्षी सांसदों द्वारा ‘न्यायिक अनुशासनहीनता’ और ‘सिद्ध कदाचार’ के आधार पर महाभियोग प्रस्ताव लाना, विधायिका द्वारा न्यायपालिका की आत्मा को लीलने का उदाहरण है। 56 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने इस प्रस्ताव की तीव्र आलोचना करते हुए इसे डराने की रणनीति बताया। उनके द्वारा जारी किया गया खुला पत्र इस बात का प्रतीकात्मक प्रतिबिंब है कि उनकी सामूहिक न्यायिक बुद्धि के अनुसार न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन का कृत्य संविधान और विधिक मर्यादाओं की परिधि के भीतर था। किसी न्यायाधीश द्वारा धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा की रक्षा करने के कारण उसके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत करना, न्यायिक अंतःकरण को विधायी भीड़ की इच्छाओं और सनकियों के अधीन कर देने जैसा है, जिसके परिणामस्वरूप शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर होता है।

राष्ट्र के प्रति सजग न्याय

यदि हम लॉर्ड एटकिन के उन प्रसिद्ध शब्दों को याद करें, जिसमें उन्होंने चेताया था कि-‘न्याय कोई एकांत में रहने वाला सद्गुण नहीं है’। न्याय को राष्ट्र की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़ा और उनके प्रति सजग होना चाहिए। इस विचार को संस्थागत उपयोगितावाद के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाना आवश्यक है, जो यह निर्देश देता है कि न्यायपालिका को भारत के संरक्षण हेतु कार्य करना चाहिए।
उपरोक्त दोनों मामलों में, दोनों न्यायाधीशों ने अंतिम और व्यापक हित को अधिकतम करने के उद्देश्य से कार्य किया। एक ओर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अवैध रोहिंग्या प्रवासियों को न्यायालय के समक्ष ‘लोकस स्टैंडी’ प्राप्त नहीं है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने हिंदुओं द्वारा दीपम प्रज्ज्वलन की परंपरा की रक्षा की, जिससे राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत प्रकाशित होती है। संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करते हुए, इन न्यायाधीशों ने कथित वैश्विक मानवतावादियों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की तात्कालिक सराहना की अपेक्षा राष्ट्र के दीर्घकालिक अस्तित्व को प्राथमिकता दी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति स्वामीनाथन पर किए गए राजनीतिक हमले केवल दो न्यायाधीशों पर नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका की संप्रभुता और स्वतंत्रता पर आघात हैं। एक ओर राष्ट्र की देह (सीमाएं) की रक्षा है, तो दूसरी ओर राष्ट्र की आत्मा (संस्कृति) की। लगभग 100 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सामूहिक बुद्धि इस तथ्य की पुष्टि करती है कि इन न्यायाधीशों ने संवैधानिकता के अनुरूप, निष्ठा और विवेक के साथ कार्य किया। भय से ग्रस्त न्यायपालिका कभी न्याय नहीं दे सकती। भारत की ‘संयुक्त उपयोगिता’ एक सशक्त, स्वतंत्र और विवेकशील न्यायपालिका में निहित है जो राष्ट्रप्रेम और विधि के शासन के बीच संतुलन स्थापित करे। तभी न्याय का दीप, संविधान का विवेक और कार्तिगई दीपम अनवरत प्रज्ज्वलित रहेगा और राजनीतिक अवसरवाद के अंधकार को दूर करता रहेगा।

कट्टरपंथ के खिलाफ न्यायालय की दृढ़ता

‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा’ जैसे नारे को न्यायालय द्वारा भारत की एकता, अखंडता और कानून-व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती बताना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका कट्टरपंथी दबावों और तुष्टीकरण की राजनीति के आगे झुकने को तैयार नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी को केवल एक जमानत याचिका की अस्वीकृति के रूप में देखना उसकी गंभीरता को कम करके आंकना होगा। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (आईएनसी) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर 26 मई, 2025 को बिहारीपुर में एकत्रित 500 लोगों की भीड़ द्वारा हिंसा के मामले में आरोपी रेहान नाम के युवक की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की थी। इस दौरान उक्त नारा लगाया गया था। न्यायालय ने न केवल इस नारे को बीएनएस की धारा 152 के अंतर्गत दंडनीय माना है। न्यायालय का यह रुख कार्तिगई दीपम जैसे मामलों से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है, जहां धार्मिक परंपराओं को लेकर प्रशासनिक हिचक, राजनीतिक दबाव और कथित तुष्टीकरण सामने आता रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी यह भरोसा दिलाती है कि चाहे हिंसक नारे हों या मजहब की की आड़ में की गई अराजकता, कानून का पैमाना एक ही रहेगा।

Topics: राष्ट्र धर्मकेशवानंद भारतीपाञ्चजन्य विशेषन्यायिक स्वतंत्रताप्रो.( डॉ.) अंजू वली टिक्कूधर्मो रक्षति रक्षितःन्यायिक संप्रभुतागुस्ताख-ए-नबीराष्ट्रीय सुरक्षान्यायपालिका
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