इस्लामी आतंकवाद : कब तक नकारोगे!
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होम विश्व

इस्लामी आतंकवाद : कब तक नकारोगे !

जो ऑस्ट्रेलिया में हुआ, वही पहलगाम में हुआ था। केवल नाम अलग हैं। विश्व शांति के लिए आवश्यक है कि आतंकवाद के मूल पर प्रहार हो, न कि शाखाओं पर।क्रूर जिहादी हमले पर दुनिया भर से जैसी प्रतिक्रिया आई, वह चौंकाने वाली है। यूरोप के सभी देशों ने रस्म अदायगी वाले बयान जारी किए। वैसे ही, जैसे भारत में पहलगाम या पठानकोट आतंकी हमले के समय सुने गए

Written byनीरज अत्रीनीरज अत्री
Dec 22, 2025, 10:47 am IST
inविश्व, विश्लेषण
ऑस्ट्रेलिया में बाॅन्डी तट पर जिहादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देते लोग। (प्रकोष्ठ में) जिहादी बाप-बेटा

ऑस्ट्रेलिया में बाॅन्डी तट पर जिहादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देते लोग। (प्रकोष्ठ में) जिहादी बाप-बेटा

सीजर बराजा, अमनदीप सिंह और अहमद। ये तीन नाम हैं। तीनों अलग-अलग स्थानों से आते हैं, लेकिन 14 दिसंबर को तीनों में एक समानता होने वाली थी। तीनों ने वीरता का परिचय देते हुए ऑस्ट्रेलिया के सागर तट पर दो में से एक आतंकी को पकड़ने और दूसरे को मारने में अहम भूमिका निभाई। लगभग सभी प्रिंट मीडिया और टीवी चैनल यह बताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर एक मुसलमान ने वीरता का प्रदर्शन करते हुए एक आतंकी के हाथ से बंदूक छीन कर उसे निहत्था कर दिया। यह उचित भी है। उस व्यक्ति ने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया और संभवतः कुछ लोगों की जान बचाने का सराहनीय कार्य भी किया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसका नाम अहमद है। भारतीय मूल के अमनदीप सिंह ने भी वीरता का परिचय दिया था, किंतु उसका उल्लेख बहुत कम किया जा रहा है। एक पुलिसकर्मी सीजर बराजा ने एक आतंकी को मार गिराया, परंतु उसकी भी प्रशंसा कम ही हो रही है।

दो प्रश्न

यहां दो बहुत ही मौलिक व महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े होते हैं। पहला, मीडिया को अगर बचाने वाले का मजहब पता लग गया है, तो मारने वाले इस्लामी आतंकियों का मजहब बताने में संकोच क्यों कर रहा है? दूसरा, बचाने वाले के नाम से क्या यह निर्धारित हो सकता है कि वह मुसलमान ही है? पहला प्रश्न इसलिए कि मीडिया के कुछ वर्गों में इस्लामी आतंकवाद के अस्तित्व को स्वीकार करने का या तो साहस नहीं होता या मंशा नहीं होती। यही कारण है कि कल तक जो ‘स्टार पत्रकार’ माने जाते थे, सोशल मीडिया के आने के बाद अप्रासंगिक हो गए हैं। आज जब सारी जानकारी फोन के माध्यम से घर-घर में सुलभ है, सच को छिपाना संभव नहीं है।

दूसरा प्रश्न अटपटा लग सकता है, क्योंकि नाम अहमद है तो वह निःसंदेह मुसलमान ही होगा। इसमें तो कोई संशय होना ही नहीं चाहिए। किंतु संशय का एक बहुत बड़ा कारण है-मुसलमानों का इस्लाम से मोह भंग होना। आज ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका जन्म तो मुसलमान घर में हुआ है इसलिए नाम से मुसलमान लगते हैं, परंतु वे इस्लाम को छोड़ चुके हैं। इन्हें इस्लाम की शब्दावली में ‘मुल्हिद’ या ‘मुर्तद’ कहा जाता है। अब आकलन पड़ेगा कि मारने वाले और बचाने वाले में से कौन इस्लाम के अनुसार आचरण कर रहा था।

जिहादी सोच

ऑस्ट्रेलिया के पुलिस कमिश्नर क्रिसी बैरेट के शब्दों में, “यह आतंकी हमला इस्लामिक स्टेट के प्रभाव में आकर किया गया है।” जिस समय दोनों बाप-बेटे अपनी कार से बंदूकों सहित निकल रहे थे, उनके हाथ में आईएसआईएस का झंडा भी था। आईएसआईएस ने हमले की प्रशंसा की है। इन सभी तथ्यों को देखते हुए इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि 14 दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी तट पर जो आतंकी हमला हुआ, वह इस्लामी उग्रता से प्रेरित है।

हमला करने वाले 50 वर्षीय साजिद अकरम और उसके 24 वर्षीय बेटे नावेद अकरम ने 15 लोगों की निर्ममता से हत्या कर दी और कम से कम 40 लोगों को घायल कर दिया। बाप-बेटे की जोड़ी ने यहूदियों के एक समूह पर हमला किया, जो शांति से अपना त्योहार ‘हनुक्का’ मनाने के लिए सागर तट पर एकत्रित हुए थे। यहूदियों को निशाना बनाना इस बात का निश्चित प्रमाण है कि यह हमला इस्लाम से प्रेरित है, क्योंकि कुरान व हदीस के अनुसार यहूदियों को मारना बहुत ‘सवाब’ का काम है। कुरान के अनुसार, अल्लाह इस काम के लिए मुसलमानों को सबसे ऊंचे दर्जे की जन्नत में, जिसे जन्नत-उल-फिरदौस कहा जाता है, दाखिल करेगा।

18 दिसंबर को ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने 5 मुसलमानों को गिरफ्तार किया जो नावेद-साजिद से प्रभावित होकर वैसा ही एक और हमला करने के लिए सागर तट पर जा रहे थे। दूसरी ओर, फिलिस्तीन की समाचार वेबसाइट ‘रामल्ला न्यूज’ पर हमले के समाचार पर प्रतिक्रिया देने वालों में से 75 प्रतिशत अहमद की निंदा कर रहे हैं। वे लिख रहे हैं कि यहूदियों को बचाने वाला व्यक्ति कौम का गद्दार है। वे अल्लाह से दुआ मांग रहे हैं कि अहमद, जो घायल हो गया है, कभी ठीक न हो।

पूरे सभ्य समाज को, विशेषकर भारत को स्वयं से प्रश्न पूछना चाहिए-हमें अपने देश में अहमद चाहिए या नावेद-साजिद की जोड़ी? हमें वह नागरिक चाहिए, जो मानवता के नैतिक मूल्यों के अनुसार जीवन जीने में सक्षम है या वे जो सातवीं सदी के अंध-विश्वास और मदरसों में पढ़ाई जा रही नफरत को सच मानकर निर्दोष लोगों की हत्या करने को लालायित हैं?

आज यह निष्कर्ष बौद्धिक मंचों पर उभरने लगा है कि कोई भी राष्ट्र या समाज, जो इस इस्लामी आतंकवाद को केवल ‘कानून व्यवस्था’ की समस्या समझकर निपटने का प्रयास करेगा, वह इससे छुटकारा नहीं पा सकता।

आखिर कब तक?

हमारा देश इस्लामी आक्रांताओं की बर्बरता को 1200 वर्ष से सहन कर रहा है। हम और हमारे पूर्वज इस रक्त-रंजित संघर्ष का बहुत मूल्य चुका चुके हैं। इतिहासकारों के अनुसार, इन सदियों में 8-10 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया। यह विश्व इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला संघर्ष है। हम अपनी मातृभूमि का बहुत बड़ा भू-भाग भी 1947 में इस विचारधारा को दे चुके हैं। 20वीं सदी में ही, मोपला हिंदू-नरसंहार, डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखली दंगे, विभाजन की विभीषिका, कश्मीर में हिंदू नरसंहार झेल चुके हैं।
कुछ माह पहले पहलगाम में देख चुके हैं कि इस्लामी आतंकवाद से परंपरागत ढंग से नहीं निपटा जा सकता। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, अल-कायदा, आईएसआईएस, बोको हराम, हमास, इंडियन मुजाहिदीन, जेकेएलएफ-केवल नाम अलग हैं, विचारधारा एक ही है। अंधविश्वास से भरी हुई।

कानून जरूरी

महाराष्ट्र में मकोका जैसे कानून की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि संगठित अपराध साधारण नहीं होते। ये ठंडे दिमाग से, सोच-समझकर बहुत से संसाधनों का उपयोग करके किए जाते हैं। साधारण कानून और पुलिस इनसे लड़ने में सक्षम नहीं होती। इन्हें पराजित करने के लिए विशेष कानून चाहिए। वही स्थिति आतंकवाद की है। जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, तो टाडा की सहायता से पंजाब में शांति स्थापित की गई थी। उसके बाद पोटा भी लाया गया था, किंतु राजनीतिक दलों ने अपनी क्षुद्र राजनीति और तुष्टीकरण के चलते उसे निरस्त कर दिया था। आज हमें ऐसी ही व्यवस्था की आवश्यकता है। किंतु यह अकेला उपाय पर्याप्त नहीं होगा। विचारधारा को बौद्धिक रूप स्तर पर भी पराजित किया जाता है। सवाल उठने लगे हैं-जिन मदरसों में बच्चों की मासूमियत छीनकर उन्हें अपने ही देशवासियों से नफरत करना सिखाया जाता है, उन पर तुरंत ताला लगना चाहिए।

सोच बदलनी होगी

संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांत में कहा गया है कि देश के नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने के उपाय किए जाने चाहिए। अब समय आ गया है कि इन्हें केवल संविधान की शोभा बढ़ाने के स्थान पर वास्तविक जीवन में कार्यान्वित किया जाए। सभ्य समाज का दायित्व है कि मुसलमान घर में जन्मे बच्चों को भी वही खुलापन व ज्ञान अर्जन के अवसर मिलें, जो अन्य समुदाय के बच्चों को मिलते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से पांच प्रण का उल्लेख किया था, जिनमें एक है गुलामी की मानसिकता और उससे जुड़ी निशानियों से छुटकारा। कैसी विडंबना है कि जो काम हमें 1947 में ही कर लेना चाहिए था, उसे 78 वर्ष बाद करने की बात हो रही है। लगता है बीते 78 वर्ष में कुछ वर्गों में यह गुलाम मानसिकता और उससे जुड़ी निशानियां और सुदृढ़ हो गई हैं। उन निशानियों में एक तो मैकाले की शिक्षा प्रणाली है जिस पर अब काम हो रहा है। किंतु एक और मानसिकता है जिस पर सहज ध्यान नहीं जाता। इतिहास साक्षी है कि हमारे देश में अधिकतर हिंदुओं को जजिया के लिए विवश करके, प्रलोभन देकर, तलवार दिखाकर अथवा बलात्कार से मुसलमान बनाया गया है। मुसलमानों को घृणा सिखाने वाले विचारों से अलग, भारतीयता के समावेशी विचार को मुख्यधारा में लाना क्या सभ्य समाज का दायित्व नहीं है?

ऐसे कट्टर उद्धरण, आचरण या विचार, जो इनसानों में भेद करना सिखाते हैं और जो आलिम यह पाठ पढ़ाता है ‘काफिरों का कत्ल करने पर उन्हें जन्नत नसीब हो जाएगी। यहूदियों, सिखों, बौद्धों और हिंदुओं को मारोगे तो जन्नत मिलेगी।’ ऐसी जन्नत, जिसमें शराब की नदियां, सुंदर हूरें और मांस खाने को मिलेगा। ऐसे मानवताद्वेषी विचारों से अपने नागरिकों और समाज को बचाना, केवल प्रधानमंत्री मोदी या सरकार का प्रण नहीं होना चाहिए। यह हर व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है, पर यह सरल नहीं है। जिनकी दुकान ही नफरत की विचारधारा से चलती है, वे ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध करेंगे। इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति व आत्मबल की आवश्यकता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसके उदाहरण मिलते हैं।

जब युद्ध का अंत हुआ, तब विश्व को नाजियों द्वारा किए गए अमानवीय अत्याचारों का पता चला। नए जर्मनी का निर्माण होना था, पर बुद्धिजीवियों के दो गुट एक-दूसरे का विरोध कर रहे थे। एक का कहना था कि होलोकॉस्ट ऐसा कड़वा इतिहास है, जिसे भावी पीढ़ियों को बताने से विभिन्न वर्गों में कटुता आएगी। दूसरे गुट का मत था कि सच बताना हमारा दायित्व है, ताकि भावी पीढ़ियां सच को जानें और जो गलतियां पहले हो चुकी हैं, उन्हें दोहराया न जा सके। जर्मनी का सौभाग्य रहा कि दूसरा गुट प्रभावी हुआ और होलोकॉस्ट की वास्तविकता वहां के इतिहास पाठ्यक्रम में अनिवार्य कर दी गई। यही नहीं, होलोकॉस्ट को नकारने व छिपाने को दंडनीय अपराध बनाया गया। परिणाम सबके सामने है।

दुर्भाग्य से हमने जर्मनी से ठीक विपरीत काम किया। इस्लामी आक्रांताओं की दुष्टता और वास्तविकता को नकार कर इतिहास का एक ऐसा विकृत पाठ्यक्रम अपनी पीढ़ियों को पढ़ाया, जो सच से कोसों दूर था। यही काम फिल्मों और मीडिया ने किया। परिणाम यह हुआ कि राजनीतिक इस्लाम और उससे जुड़े आतंकवाद को फलने-फूलने का अवसर मिलता रहा। इसलिए हमें अपने नागरिकों को सच्चा इतिहास बताना ही होगा।

जो ऑस्ट्रेलिया में हुआ, वही पहलगाम में हुआ था। केवल नाम अलग हैं। विश्व शांति के लिए आवश्यक है कि आतंकवाद के मूल पर प्रहार हो, न कि शाखाओं पर।

Topics: मदरसा शिक्षाइस्लामी आक्रांतापहलगाम हमलाटाडा (TADA)पठानकोटपोटा (POTA)साजिद अकरमनावेद अकरमआतंकवाद और जिहादआतंकवाद का मूलजिहादी हमलाऑस्ट्रेलिया बॉन्डी हमलाहिंदू नरसंहारबॉन्डी तटइस्लामी आतंकवादयहूदी विरोधी हमलातुष्टीकरण की राजनीतिरस्म अदायगी
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